Chabahar Port
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व्यापार

चाबहार बंदरगाह के लिए भारत को अमेरिकी राहत

“भारत के पश्चिमी तट से आसानी से पहुँचा जा सकने वाला चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के काउंटर के रूप में देखा जा रहा है जिसे पाकिस्तान में चीनी निवेश से विकसित किया जा रहा है।"

Neelesh Singh Thakur

हाइलाइट्स :

  • पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का जवाब है चाबहार

  • आधिकारिक चर्चा में विदेश मंत्री ने दिया जवाब

  • पोम्पिओ, एस्पर, जयशंकर, राजनाथ ने की चर्चा

राज एक्सप्रेस। अमेरिका ने ईरान के चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) पर प्रतिबंधों से भारत को एक दुर्लभ छूट प्रदान की है। ट्रम्प प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से जारी पीटीआई की खबर में जानकारी दी गई है कि, युद्ध त्रासदी को झेल रहे अफगानिस्तान में दोबारा जीवन पटरी पर लाने के लिए भारत से परिवहन संपर्क बढ़ाने की दिशा में ऐसा करना जरूरी है।

3 मुल्कों का संयुक्त कार्यक्रम :

चाबहार पोर्ट को भारत, ईरान और अफगानिस्तान देश मिलकर संयुक्त रूप से विकसित कर रहे हैं। इस योजना का उद्देश्य केंद्रीय एशियाई देशों से इन तीन देशों के व्यापारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूती देना है। यह पोर्ट हिंद महासागर में सिस्तान और ईरान के बलूचिस्तान प्रोविंस में डेवलप किया जा रहा है। चाबहार की डेवलप होने से एशियाई मुल्कों के लिए भारत, अफगानिस्तान और ईरान के रास्ते खुल सकेंगे और व्यापारिक-सामरिक रिश्ते भी मजबूत होंगे।

ग्वादर का तोड़ :

भारत के पश्चिमी तट से आसानी से पहुँचा जा सकने वाला यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के काउंटर के रूप में देखा जा रहा है जिसे चीनी निवेश से विकसित किया जा रहा है। वॉशिंगटन में विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संवाददाताओं को बताया कि "हमने चाबहार के विकास के लिए एक संकीर्ण छूट (भारत को) प्रदान की है।"

ये अनुमति मिली :

अमेरिकी राहत में अफगानिस्तान में रिफाइंड तेल उत्पादों के निर्यात के लिए भारत को बंदरगाह और रेल लाइन के निर्माण की अनुमति शामिल है। अधिकारी ने ट्रम्प प्रशासन की भारत के प्रति प्रतिबद्धता पर खास फोकस रखा। ये चर्चा आतंकमुक्त दुनिया और अफगानिस्तान में जीवन को फिर से पटरी पर लाने की दिशा में मूल रूप से फोकस रही।

अधिकारी ने कहा कि अमेरिका छूट को तब तक बढ़ाना जारी रखेगा जब तक कि ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) पोर्ट प्रोजेक्ट में भाग नहीं लेती। अधिकारी ने वाशिंगटन में मंत्रालय के टू प्लस टू कॉन्क्लूज़न में कहा,

"यह निर्णय आर्थिक गतिविधियों में आईआरजीसी की भागीदारी या उन गतिविधियों में शामिल होने वाले आईआरजीसी से संबंधित संस्थाओं में शामिल नहीं होने पर आकस्मिक है।"

कॉन्क्लूज़न

अमेरिकी-भारतीय दिग्गज :

यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पोम्पिओ ने रक्षा सचिव मार्क एस्पर के साथ भारतीय समकक्ष विदेश मंत्री एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह संग दो देशों के बीच कार्यक्रम की मेजबानी की। जिसमें सवाल पूछे गए और जवाब भी दिए गए।

ताकि भारत की राह हो आसान :

उन्होंने कहा कि, "हम मानते हैं कि चाबहार संभावित रूप से भारत के लिए मानवीय श्रम की पहुंच अफगानिस्तान में बढ़ाने और अफगानिस्तान देश में अपने निर्यात के अवसरों में विविधता लाने में सक्षम होने के लिए एक जीवन रेखा के रूप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।“

अधिकारी ने चाबहार बंदरगाह पर अमेरिकी छूट के लिए पोम्पिओ की प्रशंसा करते हुए जयशंकर के एक सवाल के जवाब में कहा, "यही कारण था कि चाबहार में छूट दी गई और हम इसका समर्थन करना जारी रखते हैं।"

ये बोले जयशंकर :

पोम्पिओ, सिंह और एस्पर के साथ एक संयुक्त समाचार सम्मेलन में, जयशंकर ने कहा है कि भारत चाबहार परियोजना के अमेरिकी सरकार के समर्थन को दोहराने के लिए सचिव पोम्पिओ के प्रति आभारी है। अफगानिस्तान की भी बेहतरी के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण कदम होगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, पोम्पियो ने एक सवाल के जवाब में कहा, कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में आंतरिक-अफगान वार्ता और शांति एवं मेल-मिलाप विकसित करने के उनके प्रयास को भारत के साथ साझा किया है।

नापाक आतंकवाद पर चिंता :

उन्होंने कहा कि "हमने अपने भारतीय समकक्षों के साथ साझा किया है कि हम किस रास्ते पर चल रहे हैं। हम बहुत पारदर्शी हैं। हम चिंताओं को समझते हैं, कि पाकिस्तान के रास्ते भारत में आतंकी गतिविधियों की घटनाओं से भारतीय कितने चिंतित हैं और हमने भारत को इसके बारे में आश्वासन दिया है जिसे हम ध्यान में रखेंगे।

तब लेंगे कदम वापस :

पोम्पिओ ने कहा कि अमेरिका को उम्मीद है कि तालिबान सहित सभी संबंधित पक्ष हिंसा रोकने की बात पर सहमत होंगे। ऐसा होने पर ही हम अफगानिस्तान से कदम वापस लेंगे।

जयशंकर ने कहा कि अमेरिका मुल्क अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर चिंतित है। "यही कारण है कि हमने वहां एक बड़ा विकास सहायता कार्यक्रम रखा है। जिसकी सतत निगरानी की जा रही है।" विदेश मंत्री ने कहा "हम मानते हैं कि अफगानिस्तान में सुलह प्रक्रिया अफगान के नेतृत्व वाली और अफगान के स्वामित्व वाली होनी चाहिए। हमें पूरा विश्वास है कि पिछले दो दशकों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जो लाभ हासिल किए हैं, वे उस प्रक्रिया में सुरक्षित और संरक्षित होंगे।"

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