सतर्क और आशावादी रहे तो 2022 में 5 कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को देंगे आकार
महामारी में सतर्क रहने से होगा आर्थिक विकास। - सांकेतिक चित्र.Neelesh Singh Thakur – RE

सतर्क और आशावादी रहे तो 2022 में 5 कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को देंगे आकार

आगामी आशंकित प्रतिबंध भी आपूर्ति-पक्ष में व्यवधान पैदा कर सकते हैं और 2022 के शुरुआती महीनों में मुद्रास्फीति के दबाव को भी बढ़ा सकते हैं।

हाइलाइट्स

  • 2022 में उम्मीद और सावधानी के संकेत

  • 5 कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को देंगे आकार

  • महामारी में सतर्क रहने से होगा आर्थिक विकास

राज एक्सप्रेस। भारत में कोविड-19 महामारी (Covid-19 pandemic) की तीसरी लहर की संकेत जनित आशंका के बीच यह उम्मीद भी है कि कोविड का नया वैरिएंट ओमिक्रॉन (Omicron) रौद्र रूप त्यागेगा और भारतीय अर्थव्यवस्था फिर से वही विकास गति अख्तियार करेगी जो पिछले कुछ महीनों में भारत में देखने को मिली।

इस दौरान साल 2022 में पांच प्रमुख व्यापक आर्थिक (macroeconomic) कारक हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था को आकार देंगे।

2022-23 में उच्च आर्थिक विकास -

वित्तीय वर्ष 2022-23 में ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (Gross Domestic Product- GDP/जीडीपी) यानी सकल घरेलू उत्पाद में अधिक वृद्धि होने की उम्मीद है। द प्रिंट के लेख में राष्ट्रीय वित्त और नीति संस्थान में अर्थशास्त्री और प्रोफेसर इला पटनाइक एवं एनआईपीएफपी में सलाहकार राधिका पांडे ने इन प्रमुख पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

आय और उत्पादन में वृद्धि न केवल निम्न आधार प्रभाव के कारण, बल्कि व्यावसायिक अपेक्षाओं में सुधार और वैश्विक और घरेलू मांग दोनों में प्रत्याशित सुधार के कारण भी होगी।

जैसा कि; इस वर्ष का पहला सप्ताह ओमिक्रॉन नामित कोरोना वायरस (Covid 19) की तीसरी लहर के कारण कठिन प्रतीत हुआ, वहीं आगामी महीनों में सुधार के संकेतों के साथ अर्थव्यवस्था फिर पटरी पर आने की उम्मीद है।

कोविड 19 (Covid 19) का नया अवतार यानी न्यू वैरिएंट ओमिक्रॉन (Omicron) अत्यधिक पारगम्य है लेकिन पिछले वैरिएंट की तुलना में इसे इसके प्रकाश में आने से अब तक कम गंभीर माना जा सकता है।

टीकाकरण दर, समूह प्रतिरक्षा और सामना करने की हमारी क्षमता में सुधार के संभव होने से अब जीवन और आजीविका संबंधी नुकसान सीमित होने की संभावना है।

मांग में सुधार का समर्थन - 2021 के अंत तक, 61 प्रतिशत से अधिक वयस्क आबादी को टीके की दोनों खुराक मिल गई थी और लगभग 90 प्रतिशत वयस्क आबादी को टीके की एक खुराक दी गई थी।

किशोरों का टीकाकरण शुरू हो गया है। स्वास्थ्य कर्मियों और सह-रुग्णता वाले 60 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए टीकाकरण की तीसरी खुराक शुरू की जा रही है। ऐसे में उच्च टीकाकरण दर अधिक गतिशीलता को सक्षम कर मांग में सुधार का समर्थन करेगी।

वायरस की अनिश्चित प्रकृति को देखते हुए, विकास के लिए कुछ नकारात्मक जोखिम हो सकते हैं, लेकिन इनके साल के पहले कुछ महीनों तक सीमित रहने की संभावना है।

उच्च पूंजीगत व्यय, नए संस्थागत ढांचे के माध्यम से बुनियादी ढांचे का निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा और उत्साहजनक निर्यात के विकास के प्रमुख चालक होने की संभावना है।

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उच्च मुद्रास्फीति (High inflation) –

उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (Advanced Economies) और उभरते बाजार (Emerging Market) वाली अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति (Inflation) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।

भारत में प्रक्षेपवक्र बढ़ी हुई कमोडिटी की कीमतों, ग्लोबल लॉजिस्टिक्स, आपूर्ति पक्ष की अड़चनों और औद्योगिक कच्चे माल की कीमतों जैसी वैश्विक विपरीत परिस्थितियों से प्रभावित होगा।

WPI आधारित मुद्रास्फीति – होलसेल प्राइज़ इंडेक्स (WPI/डब्ल्यूपीआई) यानी थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति, जो इन वैश्विक कारकों को पकड़ती है, नवंबर 2021 में 14.32 प्रतिशत के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई।

नवंबर के लिए कंज्यूमर प्राइज़ इंडेक्स (CPI/सीपीआई) यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति भी बढ़कर 4.91 प्रतिशत हो गई। लेकिन WPI और CPI के बीच व्यापक अंतर थोक पक्ष पर मूल्य दबाव को दर्शाता है, जिसके आने वाले महीनों में खुदरा स्तर पर पारित होने की संभावना है।

कीमत बढ़ने के कारण – उपभोक्ता वस्तु सेक्टर की कई फर्मों ने इनपुट लागत में वृद्धि के कारण अपने उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की है। आने वाले महीनों में मुख्य मुद्रास्फीति पर लागत दबाव का धक्का लगने की संभावना है।

आगामी आशंकित प्रतिबंध भी आपूर्ति-पक्ष में व्यवधान पैदा कर सकते हैं और 2022 के शुरुआती महीनों में मुद्रास्फीति के दबाव को भी बढ़ा सकते हैं। जैसे-जैसे आपूर्ति व्यवधान कम होने से मांग सामान्य होगी तो, मुद्रास्फीति में संतुलन नजर आ सकता है।

RBI का अनुमान – रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (The Reserve Bank of India - RBI/आरबीआई) यानी भारतीय रिज़र्व बैंक ने जनवरी-मार्च तिमाही के लिए CPI मुद्रास्फीति 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही में महंगाई दर 5 फीसदी रहने का अनुमान है।

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अस्थिर ब्याज दरें -

RBI ने महामारी के कारण संकट को कम करने के लिए मार्च 2020 से शुरू की गई आसान मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की शुरुआत की है। जबकि आरबीआई ने अपनी हालिया नीतिगत घोषणाओं में रेपो और रिवर्स रेपो दर को अपरिवर्तित रखा है।

वहीं अन्य उपायों जैसे कि परिवर्तनीय दर रिवर्स रेपो नीलामियों और सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री के माध्यम से नीति सामान्यीकरण शुरू हो गया है। इन कार्रवाइयों ने तरलता को अवशोषित कर अल्पकालिक दरों को 4 प्रतिशत के करीब ला दिया है।

आने वाले महीनों में अल्पकालिक दरों में और वृद्धि होने की उम्मीद है क्योंकि बढ़ी हुई मुद्रास्फीति के बीच आरबीआई नीति सामान्यीकरण के साथ आगे बढ़ेगा।

लंबी अवधि के बांडों पर दरें अमेरिकी बांडों पर उच्च प्रतिफल और उच्च घरेलू मुद्रास्फीति द्वारा संचालित ऊंचे स्तर पर हैं। लंबी अवधि के प्रतिफल का मार्ग आगे राजकोषीय स्थिति पर निर्भर करेगा। अगर सरकार अगले वित्त वर्ष के लिए अधिक उधारी कार्यक्रम का लक्ष्य रखती है तो 10-वर्षीय बॉन्ड पर प्रतिफल और चढ़ने की संभावना है।

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वित्तीय बाजार –

वर्ष 2021 में शेयर बाजार निवेशकों को बड़े पैमाने पर रिटर्न प्राप्त हुआ। कंपनियों की बेहतर लाभप्रदता, खुदरा निवेशकों द्वारा भागीदारी में वृद्धि, और इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (आईपीओ/IPO) यानी प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश की श्रृंखला ने बाजार में गतिशीलता बरकरार रखी।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के टेपर अनाउंसमेंट और ओमिक्रॉन संस्करण जैसे जोखिम के साथ ब्याज दर की वृद्धि संबंधी वैश्विक कारक बाजारों में अस्थिरता का कारण बन सकते हैं।

भारतीय संपत्तियों के लिए विदेशी निवेशकों का संपर्क और अमेरिकी डॉलर आंदोलन आने वाले महीनों में बाजार की दिशा को भी प्रभावित करेगा।

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बैंकिंग में NPA वृद्धि –

सितंबर 2021 में बैंकों में खराब ऋण 6.9 प्रतिशत के छह साल के निचले स्तर पर गिर गए। बैंकों की पूंजी स्थिति में भी काफी सुधार देखा गया है। हालांकि अनचाहे नीति समर्थन के साथ, बैंकों की बैलेंस-शीट संकट में आ सकती है। आर्थिक विश्लेषकों ने सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्यमों और व्यक्तिगत ऋण खंडों में तनाव के उभरते संकेत दिखाई देने की बात कही है।

रिपोर्ट में बेसलाइन परिदृश्य के तहत सितंबर तक गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में 8 फीसदी से ऊपर की वृद्धि हुई है।

राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों में खराब ऋण से जुड़े मामलों में तेज उछाल दिखने की संभावना है। उन्हें उधारकर्ताओं की कुछ श्रेणियों द्वारा सामना किए जाने वाले उभरते तनाव से निपटने के लिए उच्च पूंजी की भी आवश्यकता हो सकती है। यह बैंकों को अधिक सतर्क उधारदाता भी बना सकता है।

संक्षेप में, जीडीपी (GDP) और मुद्रास्फीति (inflation) में वृद्धि के साथ आरबीआई समेत दुनिया भर के केंद्रीय बैंक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के कारण ब्याज दरों में वृद्धि कर सकते हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था के लिहाज से नया साल उम्मीद रखने और सावधानी बरतने के संकेत दे रहा है।

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डिस्क्लेमर आर्टिकल मीडिया एवं एजेंसी रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसमें शीर्षक-उप शीर्षक और संबंधित अतिरिक्त जानकारी जोड़ी गई हैं। इसमें प्रकाशित तथ्यों की जिम्मेदारी राज एक्सप्रेस की नहीं होगी।

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