कोरोना बाद मरणासन्न उद्योगों का संकट, करोड़ों नौकरियों को भी खतरा

COVID-19 Lockdown के दौरान सरकार के समर्थन के बिना कपड़ा उद्योग में 1 करोड़ नौकरी जाने की आशंका। : CMAI
कोरोना बाद मरणासन्न उद्योगों का संकट, करोड़ों नौकरियों को भी खतरा
डूबती इकॉनमी और करोड़ों नौकरियांNeha Shrivastava - RE

हाइलाइट्स

  • उद्योग संगठनों ने जताई गहरी चिंता

  • कपड़ा, खुदरा, रेस्तरां इंडस्ट्री पर तगड़ी चोट

  • कोरोना के बाद मरणासन्न इंडस्ट्रीज़ का संकट

  • न मिली सरकारी मदद तो बंद होंगी इंडस्ट्रीज

राज एक्सप्रेस। कोविड 19 के कारण भारत में एहतियातन लागू 21 दिनों के देशव्यापी लॉकडाउन के कारण देश के कारोबारी जगत को तगड़ी चोट पहुंची है। फिलहाल लॉकडाउन बढ़ने से प्रभावित उद्योगों की परेशानी और बढ़ सकती है। उद्योग जगत से जुड़े तमाम संगठनों की एक राय है कि सरकारी मदद के बिना न केवल उद्योग धंधे चौपट होंगे बल्कि करोड़ों लोगों का रोजगार भी छिन सकता है। सभी पहलुओं को जानें विस्तार से...

हाल CMAI के :

परिधान उद्योग से जुड़ी निकाय क्लोथिंग मैन्युफेक्चर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI) के अनुसार अगर सरकार से कोई समर्थन और पुनरुद्धार पैकेज नहीं मिलता है तो लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित कपड़ा व्यवसाय में एक करोड़ नौकरियों पर संकट पैदा हो सकता है।

CMAI में 3,700 सदस्य हैं जिनसे लगभग 7 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। परिधान उद्योग में ज्यादातर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग का लगभग 80 प्रतिशत वर्ग प्रभावित हो रहा है।

"हमने अनुमान लगाया है कि; यदि मजदूरी सब्सिडी या पुनरुद्धार पैकेज के संदर्भ में सरकार से कोई सहायता नहीं मिलती है तो पूरी टेक्सटाइल चेन में लगभग एक करोड़ नौकरियों का नुकसान हो सकता है।"

राहुल मेहता, चीफ मेंटर, CMAI

समाचार एजेंसी (PTI) के मुताबिक उद्योग के लिए सरकार से वित्तीय पैकेज की मांग करते हुए मेहता ने कहा कि "वेतन, सब्सिडी जैसे कदमों को उठाया जाना चाहिए अन्यथा इंडस्ट्री के नौकरीपेशा वर्ग को भारी नुकसान होगा।" COVID-19 के दौरान और बाद में टेक्सटाइल उद्योग में ईंट और गारे का संकट गहराने से भी प्रतिकूल असर पड़ा। उद्योग के लिए सरकार से वित्तीय पैकेज की मांग करते हुए मेहता ने कहा कि; वेतन सब्सिडी जैसे हस्तक्षेपों को उठाया जाना चाहिए, अन्यथा नौकरी क्षेत्र को भारी नुकसान होगा।

उनके मुताबिक यदि कपड़ा उद्योग बंद होता है, तो यह फैब्रिकइंडस्ट्री आपूर्ति चेन को प्रभावित करेगा। इससे उद्योग के सहायक उद्योगों पर और लेबल जैसी इंडस्ट्री पर भी प्रभाव पड़ेगा।मेहता का मानना है कि; सरकार से मदद के अभाव में टेक्सटाइल इंडस्ट्री में अनुमानित तौर पर एक करोड़ लोगों की नौकरी को खतरा पैदा हो सकता है।

मंत्रालय के सार्थक कदम :

हालांकि, राहुल मेहता ने कपड़ा मंत्रालय के उठाए गए प्रयासों की सराहना भी की। बकौल मेहता सभी प्रमुख वैश्विक कंपनियों को भारतीय निर्यातकों के आदेशों को रद्द नहीं करने के लिए कहना और इस तरह के अन्य और कई कदम निर्माताओं को सकारात्मक सोच के लिए प्रेरित करते हैं। खासकर छोटे लोगों को इससे संबल मिलता है। मेहता ने कहा कि CMAI ने अपने सदस्यों के बीच एक सर्वेक्षण कर लगभग 1,500 प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण किया है।

उन्होंने कहा : "यदि आप रोजगार की संख्या के संदर्भ में देखते हैं तो प्रतिक्रियाएं काफी भयावह थीं। लगभग 20 फीसदी लोगों का कहना है; कि वे तालाबंदी के बाद कारोबार बंद करने की सोच रहे हैं। वहीं उनमें (विश्लेषित इकाइयों) से कम से कम 60 फीसदी ने राजस्व में 40 फीसदी की गिरावट की आशंका जताई, जो बड़े पैमाने पर है।"

मेहता ने कहा कि चीन में, COVID-19 संकट के बाद बाजार के खुलने के बाद पोशाक-परिधान की खुदरा बिक्री में 59 फीसदी की गिरावट देखी गई। इस बदलाव को वे भविष्य के लिए गंभीर चुनौती मानते हैं। उन्होंने भोजन और अन्य व्यवसायों के पुर्नजीवन की बात भी कही।

रेडिमेड गारमेंट्स कारोबार :

देश और मध्य प्रदेश की शान संस्कारधानी जबलपुर के रेडिमेड कपड़ा कारोबार पर पैंडेमिक COVID-19 की बड़ी मार पड़ी है। रेडिमेड कारोबार से जुड़े वर्ग की परेशानी है कि उनका चलन फैशन पर आधारित है। कोई खास डिजाइन या परिधान फैशन में चलन से गायब तो समझो तैयार माल भी तुलना में कौड़ी के भाव का रह जाता है।

प्रतिमाह 40 करोड़ की चपत :

तीन सप्ताह के दौरान पहले से तैयार माल जहां गोदामों में फंसा पड़ा है वहीं अगले ऑर्डर का क्या होगा इसको लेकर भी रेडिमेड कपड़ा इंडस्ट्री को चिंता है। सामान्यतः प्रचलित लेनदेन व्यवहारों के मान से जबलपुर रेडिमेड कपड़ा इंडस्ट्री को प्रतिमाह लगभग 30-40 करोड़ की चपत लग रही है।

रेडिमेड इंडस्ट्री में बहुदा सूक्ष्म एवं लघु उद्योग शामिल हैं। इनमें से अधिकांश लोन एवं कर्ज आधारित संचालित हैं। ऐसे में लॉकडाउन में धंधा बंद होने से आवक बंद है जबकि फैक्ट्री पर ब्याज का मीटर चालू है। उद्योगों में बिजली, लेबर आदि फिक्स्ड ओवरहैड का खर्चा भी तय है।

“केंद्र और राज्य सरकारों के सामने कोरोना संकट के बाद छोटे और मझौले उद्योगों को मरणासन्न स्थिति से उबारने का कठिन लक्ष्य होगा। विषम स्थिति से उबारने के लिए सरकार को उद्योग जगत का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे-बड़े संगठनों की राय लेना फायदेमंद होगा। क्योंकि तमाम संगठन अपने सदस्यों की जमीन से जुड़ी परेशानियों से न केवल अवगत होते हैं बल्कि उनके पास इनसे निपटने के सस्ते उपाय भी मिल सकते हैं।”

रवि गुप्ता, अध्यक्ष, महाकौशल चैंबर्स ऑफ कॉमर्स, जबलपुर, मध्य प्रदेश

RAI की राय :

इसी तरह रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (RAI) यानी भारतीय खुदरा संघ के आंतरिक सर्वेक्षण में भी मिलता-जुलता रुझान सामने आया है। संगठन के सर्वे में शामिल 25 फीसदी प्रतिभागियों ने कहा है कि अगर उन्हें सरकार से कोई समर्थन नहीं मिला, तो वे ठप्प हो सकते हैं। इसका गुणात्मक प्रभाव हो सकता है क्योंकि ऐसी स्थिति में सभी संबद्ध उद्योग भी प्रभावित हो सकते हैं।

"लगभग 50 प्रतिशत छोटे खुदरा विक्रेताओं की राय है कि यदि सीमांत और छोटे व्यवसाय बंद होते हैं? तो वे स्टोर खोलने में सक्षम नहीं हो पायेंगे। इसका वृहद असर पड़ेगा क्योंकि बाहर निकलने वाले कर्मचारियों की संख्या भी अधिक होगी।"

कुमार राजगोपालन, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, आरएआई

लड़ाई वजूद की...

नेशनल रेस्तरां एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) का भी कहना है कि रेस्तरां इंडस्ट्री को कोरोनोवायरस महामारी की "बुरी मार पड़ी" है।"हमारे व्यवसाय में, फिक्सड परिचालन लागत खर्च अनुपात बहुत अधिक है, मतलब जब आपकी रेवेन्यू जीरो हो तो फिर आपका बहुत अधिक नुकसान भी तय है।"

"हम अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम नहीं जानते कि इसका अंत कब तक होगा और इसका अंतिम परिणाम क्या होगा? हम भविष्य में कैसे आकार लेंगे?"

अनुराग कटियार, अध्यक्ष, NRAI

सरकार से उम्मीद: इसलिए संगठनों ने सरकार से सभी वैधानिक भुगतानों को स्थगित या फिर राहत प्रदान करते हुए विलंब करने के लिए कहा है। ताकि संगठन सदस्य वेतन और सीमांत आपूर्तिकर्ताओं का भुगतान कर सकें। जिससे गाड़ी पटरी पर लौटे। एनआरएआई ने तालाबंदी के बाद उद्योग परिचालन शुरू करने की स्थिति में पूंजी की उपलब्धता के संदर्भ में सरकार से समर्थन/सहयोग की बात भी कही है।

मंगलवार 14 अप्रैल को तीन सप्ताह के अभूतपूर्व पूर्ण लॉकडाउन की मियाद पूरी करने के बाद अब भारत हाल ही में लागू नई व्यवस्थाओं-चौकसी के बीच लॉकडाउन के दूसरे चरण प्रवेश कर गया है। ऐसे में रेड, ऑरेंज, ग्रीन जोन के नियमानुसार ही बंद पड़े कारखानों में कलपुर्जों को गति मिल पाएगी।

तीन सप्ताह के 21 दिन और अब 14 अप्रैल से फिर एक बार कुछ अतिरिक्त कड़की-नरमी के साथ एहतियातन विस्तारित लॉकडाउन दूरदर्शी योजनाओं, राहत, मदद के अभाव में भारत के उद्योग धंधों की कमर तोड़ कर रख सकता है। अपने विचार हमारे साथ जरूर साझा करें।

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