इस दिवाली लो सप्लाई से तमतमाया ग्रीन क्रैकर्स मार्केट
Green Crackers Market, बैन किए गए पटाखे नहीं बेचतेSocial Media

इस दिवाली लो सप्लाई से तमतमाया ग्रीन क्रैकर्स मार्केट

पारंपरिक पटाखों पर प्रतिबंध लगाए एक साल हो गया है। फायरवर्क निर्माताओं के पास पर्यावरण के अनुकूल पटाखे बनाने के लिए सीमित विकल्प हैं जिससे कारोबार की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।

हाइलाइट्स :

  • देश में मनपसंद क्रैकर्स का रहेगा टोटा

  • दिल्ली की दुकानों में सिर्फ अनार-फुलझड़ी

  • 200 वैराइटीज़ की जगह मात्र 2 ऑप्शन

राज एक्सप्रेस। इको फ्रैंडली ग्रीन क्रैकर्स की आपूर्ति में कमी होने के कारण पटाखा बाजार में रेड सिग्नल नज़र आ रहा है। इस कारण ग्रीन क्रैकर्स की कई वैराइटीज़ की मार्केट में जमकर कमी देखी जा रही है। इस बार दिवाली से पहले दिल्ली में बमुश्किल इक्का-दुक्का दुकानें ही बाजार में सजी दिख रहीं हैं।

दुकानों पर नोटिस चस्पा हैं कि, हम बैन किए गए पटाखे नहीं बेचते। बैन फ्री पटाखों के नाम पर हमारे पास मात्र अनार और फुलझड़ी मौजूद हैं। वो तो शुक्र है कि, ग्रीन क्रैकर्स में पटाखों के राजा अनार संग रानी फुलझड़ी की सप्लाई गड़बड़ नहीं हुई और बाजार में इसकी उपलब्धता बताई जा रही है वर्ना दिवाली की चमक फीकी पड़ सकती थी।

इनका टोटा :

बम-चकरी, रॉकेट और बमों की लड़ी को लेकर मार्केट में खासी लड़ाई देखी जा रही है। खरीदारों को दुकानदारों से यही जवाब मिल रहा है कि, ग्रीन पटाखों के नाम पर मार्केट में सिर्फ अनार-फुलझड़ी मौजूद हैं, चाहें तो दूसरे वैद्य लाइसेंसी दुकानदारों से पूछ सकते हैं। प्रदूषण की मार झेल रही राजधानी दिल्ली में ये नज़ारे और जुमले आम हो चले हैं।

आम तौर पर दिवाली पर व्यस्त नज़र आने वाले जामा मस्जिद इलाके में गिनी-चुनी दुकानों पर ही पटाखे खरीदे-बेचे जा रहे हैं।

‘’पारंपरिक पटाखों के विक्रय पर प्रतिबंध के पहले तक आम तौर पर बाजार में पटाखों की तकरीबन दो सैंकड़ा से अधिक वैराइटीज़ मिल जाती थीं। लेकिन इस बार इसके पीछे के दो ज़ीरो, कम सप्लाई और कार्रवाई के खौफ से गायब हो गए हैं। मार्केट में मात्र दो आइटम ही बेचने लिए मिल पा रहे हैं।”

प्रमोद मल्होत्रा, लाइसेंसी पटाखा विक्रेता, दिल्ली

दुकान विक्रेता दुखी स्वर में बताते हैं कि इस बार उनकी सेल में पिछले साल की तुलना में भारी गिरावट आई है। इस कारण सालों से पटाखा बेचने वाले पटाखा विक्रेताओं ने सजावटी सामग्री और लाइट जैसी चीजें बेचना शुरू कर दिया है। लेकिन बच्चों को तो पटाखे चाहिए फिर?

अनुमान के मुताबिक 1,800 करोड़ रूपये का पटाखा उद्योग इस साल नुकसान उठा सकता है।

प्रतिबंध के बाद :

प्रतिबंध के बाद पटाखों की मांग को पूरा करने के लिए सरकारों द्वारा संचालित प्रयोगशालाएं पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों के साथ आईं जिन्होंने ग्रीन पटाखों को हरी झंडी दिखाई। नए नियमों के अनुसार आतिशबाजी निर्माताओं को विनिर्माण लाइसेंस दिए गए। साथ ही पटाखों में धुआं उत्सर्जन एवं आवाज के मानक भी तय कर दिए गए।

“गौरतलब है कि ग्रीन क्रैकर्स बनाने के लिए अब प्रतिबंधित बेरियम नाइट्रेट की जगह पोटेशियम नाइट्रेट का प्रयोग किया जा रहा है। ग्रीन पटाखे 30% कम कण पदार्थ और ध्वनि उत्पन्न करते हैं।”

आरके शर्मा, पूर्व लैब इंचार्ज, शासकीय साइंस कॉलेज

आवाज नीची-कीमत ऊंची

नए फॉर्मूला के कारण ग्रीन क्रैकर्स की जहां आवाज कम हो गई है वहीं इसकी कीमतें पारंपरिक पटाखों की तुलना में 30-50% ज्यादा हैं। यह भी एक कारण है, जिससे पटाखों की सेल में कमी आई है।

“ग्राहक और विक्रेता उम्मीद कर रहे थे प्रतिबंध के बाद बाजार में इस दिवाली कम से कम दर्जन भर वैरायटी तो मिलेगी लेकिन मात्र दो आइटम्स ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पा रहे।”

दीपक गुप्ता, लाइसेंसी पटाखा विक्रेता, सदर बाजार

शिवाकाशी इफेक्ट :

भारतीय पटाखा कारोबार में शिवाकशी के पटाखा कारोबार का महत्व किसी से नहीं छिपा। लेकिन प्रतिबंध के बाद विरोध प्रदर्शनों और नियम-निर्देशों के फेर में उलझ कर वर्कस रोजगार के दूसरे साधनों से जुड़ गए। इससे भी इस साल पटाखा सप्लाई पर असर पड़ा।

समस्या ये भी :

जब पटाखा कारोबार में डिमांड चरम पर है तब पटाखा निर्माण जगत में लेबर की 30 से 40 फीसद नमी है। उम्मीद जताई जा रही है कि अगली दिवाली तक इको फ्रैंडली क्रैकर्स कारोबार को गति मिलेगी। हालांकि अगले साल भी वैराइटीज़ जरा कम ही रहने की आशंका भी अभी से पटाखा कारोबारियों ने जता दी है।

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