बहुसंख्यक होने का हवाला देते हुए पिछड़ों ने की मप्र में आरक्षण की वकालत
बहुसंख्यक होने का हवाला देते हुए पिछड़ों ने की मप्र में आरक्षण की वकालत|Syed Dabeer-RE
मध्य प्रदेश

बहुसंख्यक होने का हवाला देते हुए पिछड़ों ने की मप्र में आरक्षण की वकालत

भोपाल, मध्यप्रदेश : बहुसंख्यक होने का हवाला देते हुए पिछड़ी वर्ग ने एक बार फिर राज्य सरकार से तत्काल आरक्षण दिलाए जाने की मांग की है।

गौरीशंकर चौरसिया

भोपाल, मध्यप्रदेश। बहुसंख्यक होने का हवाला देते हुए पिछड़ी वर्ग ने एक बार फिर राज्य सरकार से तत्काल आरक्षण दिलाए जाने की मांग की है। इस बार के मोर्चा ने पिछड़ा वर्ग मंत्री को भी पूरी समस्या से अवगत कराया है। यह चेतावनी भी दी है कि यदि पिछड़ों की इसी तरह उपेक्षा होती रही तो सरकार को नुकसान उठाना पड़ेगा।

पिछड़ा वर्ग संघर्ष मोर्चा ने बिंदुवार समस्याएं गिनाई है। पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रामखेलावन पटेल को बताया गया कि, प्रदेश के बहुसंख्यक ओबीसी वर्ग की आबादी 52 प्रतिशत से अधिक है। ओबीसी समाज सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, व्यवसायिक, औद्योगिक दृष्टि से आज भी बहुत पीछे है। योजनाओं का सही क्रियान्वयन नही होने के कारण भी इस वर्ग को अपेक्षित लाभ नही मिल रहा है। विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के सम्बंध में यह व्यवस्था दी गयी है। इसके अनुसार आरक्षण के प्रतिशत का अनुपात किसी राज्य की सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों की जनसंख्या को आधार बनाकर ही तय किया जा सकता है। यदि वर्ष 2021 में होने वाली जनगणना भी जातिगत आधार पर नही होती है तो किसी राज्य में सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई जातियों की आबादी की जानकारी कैसे प्राप्त हो सकती है। आरक्षण व्यवस्था की बुनियाद ही जातिगत जनगणना है।

केबिनेट से पास किये गये प्रस्ताव अनुसार

ओबीसी को दिये गये 27 प्रतिशत आरक्षण के क्रियान्वयन में कोई न्यायिक बाधा नही आवे। इस हेतु शासन की ओर से विधि सम्वत सभी आवश्यक कार्यवाही तत्काल पूरी करा ली जाए। ओबीसी आरक्षण के सम्बंध मेे वर्तमान मे दो याचिकाएं माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। शासन का पक्ष मजबूती से रखने के लिए जरूरी है कि ओबीसी की विभिन्न जातियों का सामाजिक, आर्थिक सर्वेक्षण करा लिया जावे। साथ ही वर्तमान मे ओबीसी के कितने अधिकारी कर्मचारी सवंर्गवार कार्यरत है। इसके भी तत्काल आकड़े जुटा लिये जाएं। ताकि उच्च न्यायालय मे ठीक से पैरवी हो सके।

विधानसभा में तत्काल कराए जाए कानून पास

मंत्री को यह भी बताया गया कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार की पार्टी द्वारा विधान सभा चुनाव 2018 के अवसर पर अपने घोषणा पत्र के पैरा 27.2 मे  ओबीसी  को 27 प्रतिषत देने का वचन दिया गया है। तमिलनाडू में  दिये गये 68 प्रतिशत आरक्षण को वैद्य मानते हुए केन्द्र सरकार द्वारा कानून पारित कर संविधान की 9वीं अनूसूची में डाला गया है। हाॅलाकि मध्यप्रदेश मे अन्य पिछड़ा वर्ग की 52 प्रतिशत आबादी के लिए 52 प्रतिशत तक आरक्षण दिया जा सकता है, लेकिन वर्तमान में 27  प्रतिशत आरक्षण को लागू कराना ही श्रेयस्कर होगा। इस हेतु विधानसभा मे कानून पारित कराकर इसे केन्द्र सरकार से संविधान की 9वीं अनूसूची में शामिल कराया जावे।

मोर्चा ने बताया कि 11 या 6 की गई प्रस्तुत

मोर्चा के महासचिव राम विश्वास कुशवाहा के अनुसार ओबीसी को दिये गये 27 प्रतिशत आरक्षण के विरूद्व उच्च न्यायालय में 11 याचिकाऐं प्रस्तुत की गयी है, इनमें से अभी तक केवल एक याचिका में शासन की ओर से जबाब पेष किया गया है। कुशवाहा के मुताबिक उच्च न्यायालय द्वारा जबाब प्रस्तुत करने का समय एवं चेतावनी दिये जाने के बावजूद भी उच्चरदायी अधिकारियों द्वारा जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया। इस कारण 28 जनवरी 2020 को उच्च न्यायालय द्वारा मध्यप्रदेष पीएससी  द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं को ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण न देकर केवल 14 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने के सम्बंध में अतंरिम स्थगित आदेश जारी किया गया है।

उल्लेखनीय है कि पीएससी परीक्षा में डिप्टी कलेक्टर, नायब तहसीलदार, डीएसपी, सीईओ जनपद , आबाकारी अधिकारी आदि महत्वपूर्ण पदों के लिए हेतु चयन किया जाता है। यह अधिकारी शासन निर्णय तथा क्रियान्वयन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं । इस स्थगन कार्यवाही से ओबीसी के योग्य एवं सक्षम युवा चयन चयनित होने से बंचित हो जायेगें। इस स्थगन आदेश से ओबीसी वर्ग के युवाओं व आमजनता में निराषा एव आक्रोश का वातावरण बन रहा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि ओबीसी के हितों की निरंतर अनदेखी की जा रही है।

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