ग्वालियर : दागियों को बचाने के फेर में नप गए निगमायुक्त
दागियों को बचाने के फेर में नप गए निगमायुक्तSocial Media

ग्वालियर : दागियों को बचाने के फेर में नप गए निगमायुक्त

नगर निगम में पदस्थ 70% अधिकारियों को है भ्रष्टाचार एवं लापरवाही की लत। 2016 में तत्कालीन निगमायुक्त ने एक दर्जन से अधिक अधिकारियों पर लिया था एक्शन। एक अपर आयुक्त की कारगुजारी ले डूबी निगमायुक्त को।

ग्वालियर, मध्यप्रदेश। नगर निगम में पदस्थ अधिकतर अधिकारियों को लापरवाही एवं भ्रष्टाचार की लत लगी हुई है। इन अधिकारियों को बचाने के फेर में निगमायुक्त संदीप माकिन बलि का बकरा बन गए। इस कार्य में एक अपर आयुक्त की भूमिका मुख्य रही। उनके द्वारा ठेकेदारों को भुगतान करने में जानबूझकर अड़ंगा लगाया जाता था। यही वजह थी कि न तो कर्मचारियों को समय पर भुगतान मिल रहा था और न सिक्योरिटी गार्ड एवं ठेकेदारों का पीएफ जमा हो रहा था। अपर आयुक्त की भ्रष्टाचार की लत ही निगमायुक्त को ले डूबी।

स्वच्छता अभियान में थ्री स्टार रेटिंग एवं देश में 13 वां नंबर मिलने पर प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने ग्वालियर की तारीफ की थी। उन्होंने दो दिन पहले ही सोशल मीडिया के जरिए यह संदेश दिया। लेकिन जिस तरह से अधिकारियों द्वारा ठेकेदार को परेशान किया जा रहा था उससे मामला बिगड़ गया। अधिकारी ठेकेदार का भुगतान नहीं कर रहे थे और जो भुगतान किया जा रहा था उसमें से ठेकेदार आधा अधूरा वेतन दे रहा था। साथ ही निर्माण कार्य सहित अन्य सभी कार्यों के बिल भी रोक दिए गए थे। इससे सभी ठेकेदार नाराज थे। वहीं दूसरी तरफ भवन निर्माण स्वीकृति में की जा रही मनमानी के चलते बिल्डर, नेता एवं व्यापारी परेशान हो गए थे। बिना पैसा लिए कोई भी मकान या इमारत का निर्माण संभव नहीं था। भले ही व्यक्ति 800 वर्गफीट के मकान की निर्माण स्वीकृति लेने का आवेदन करें लेकिन बिना रिश्वत लिए उसे स्वीकृति नहीं मिलती थी। फिर भले ही कोई भी सिफारिश करे उस व्यक्ति का काम नहीं होता था। यह सब एक अपर आयुक्त के दिशा निर्देश पर किया जा रहा था और सभी जगह निगमायुक्त का नाम लेकर काम किया जा रहा था। इससे निगमायुक्त सभी के निशाने पर आ गए थे। उक्त अपर आयुक्त के खिलाफ भी कार्यवाही की जानी थी लेकिन निगमायुक्त उन्हें बचाने में लगे थे। यही वजह रही कि वह दूसरे को बचाते हुए खुद शिकार बन गए।

मंत्री से लेकर आयुक्त एवं ईओडब्लू अधिकारियों की फाइल रोकी :

हालात यह हो गए थे कि भवन निर्माण शाखा में बिना पैसा दिए कोई काम होना संभव नहीं था। सूत्रों के अनुसार दो माह पहले तक भवन शाखा में हर फाईल को रोका जा रहा था। फिर भले ही नगरीय प्रशासन आयुक्त के रिश्तेदार की फाईल हो या मंत्री के रिश्तेदार की। सभी से पैसे की डिमांड की जा रही थी। इस बारे में भोपाल में हुई बैठक में स्वयं अधिकारियों ने चर्चा की थी और फटकार लगाई थी। लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। ईओडब्लू में पदस्थ एक अधिकारी के पति की निर्माण स्वीकृति में भी अपर आयुक्त ने अडंगा लगाया था।

निगम अधिकारी थे परेशान :

अपर आयुक्त नगर निगम अधिकारियों को भी नहीं बक्श रहे थे। जनकार्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी से लेकर मदाखलत एवं अन्य विभागों में पदस्थ अधिकारियों के रिश्तेदारों के निर्माण की स्वीकृति भी बिना पैसे के नहीं की जा रही थी। स्वयं अधिकारी भी इस बात की शिकायत निगमायुक्त से कर चुके थे लेकिन अपर आयुक्त के फेर में किसी ने कोई सुनवाई नहीं की।

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