तानसेन समारोह : 95 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा है तानसेन समारोह
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तानसेन समारोह : 95 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा है तानसेन समारोह

ग्वालियर, मध्य प्रदेश : तानसेन समारोह पर छाए काले बादल छंट चुके हैं और 26 से 30 दिसम्बर आयोजन की तिथि निर्धारित हो चुकी है। पिछले 95 वर्षों से ग्वालियर मेें तानसेन समारोह निरन्तर आयोजित हो रहा है।

ग्वालियर, मध्य प्रदेश। तानसेन समारोह पर छाए काले बादल छंट चुके हैं और 26 से 30 दिसम्बर आयोजन की तिथि निर्धारित हो चुकी है। पिछले 95 वर्षों से ग्वालियर मेें तानसेन समारोह निरन्तर आयोजित हो रहा है, जिसमें एक दो अवसरों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश बार समारोह का आयोजन हजीरा स्थित सुरसम्राट की समाधि पर ही आयोजित हुआ है। इस बार भी सुरसम्राट की समाधि सुरों से गुंजायमान होगी। 1980 से तानसेन सम्मान भी दिया जा रहा है, जो शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है।

कलाओं के महान आश्रयदाता बघेलखण्ड के राजा रामचन्द्र की राजसभा में संग्रीत सम्राट तानसेन को खूब सम्मान मिला। तानसेन ने एक तरह से वहां सदा के लिए रहने का मन बना लिया था। गान मनीषी तानसेन की मौजूदगी से राजसभा हमेशा संगीत कला से गुंजायमान रहती। इसी बीच जब जलाल खां कुची ने तानसेन को ले जाने का शाही फरमान सुनाया तो राजा रामचन्द्र बहुत दु:खी हुए। तानसेन के वियोग की आशंका से उनकी आंखों से बच्चों के समान अश्रुधारा बह उठी। मुगल बादशाह अकबर ने सेना के साथ जलाल खां कुची को तानसेन को लेने के लिये भेजा था। राजा रामचन्द्र तानसेन को सौंपने के लिये विवश हो गए। डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी ने अपनी पुस्तक तानसेन में तानसेन की मार्मिक विदाई के बारे में लिखा है। तानसेन को सौंपने की बात सुनकर राजा रामचन्द्र बच्चों के समान रो उठे। जैसे-तैसे समझा-बुझाकर तानसेन ने उन्हें शांत किया। राजा रामचन्द्र ने बहुमूल्य वस्त्र तथा मणि-माणिक्यों से जड़ित अलंकार भेंट कर तानसेन को एक चौडोल (विशेष प्रकार की पालकी) में बिठाया और पूरे नगर में विदाई जुलूस निकाला।

नगरवासी तानसेन को विदा करने काफी दूर तक जुलूस के अंदाज में साथ में चले। मार्ग में तानसेन को प्यास लगी और उन्होंने अपनी चौडोल रूकवाई। तानसेन देखते हैं कि स्वयं राजा रामचन्द्र उनके चौडोल की एक बल्ली को कंधा दिए हुए हैं। राजा के तन पर न वस्त्र हैं और न पैरों में जूते। यह दृश्य देखकर तानसेन भाव-विह्ल होकर रोने लगे। विदाई के ये मार्मिक क्षण देखकर साथ में मौजूद सैनिक भी अपनी आंखों के आंसू नहीं रोक सके।

राजा रामचन्द्र ने अपने दिल को कठोर कर तानसेन से कहा कि हमारे यहां ऐसी रीति है कि जब किसी स्व-जन की मृत्यु हो जाती है तो उसके परिजन अस्थि विमान को कंधा देते हैं। मुगल बादशाह ने आपको हमारे लिए मार ही डाला है। बमुश्किल अपनी आंखों से बह रही अश्रुधारा को रोकते हुए तानसेन बोले राजन आपने मेरे लिए क्या-क्या कष्ट नहीं सहे। मैं आपके इन उपकारों का बदला चाहकर भी नहीं चुका सकता। पर मैं आज एक वचन देता हूँ कि जिस दाहिने हाथ से आपको जुहार (प्रणाम) की है, उस दाहिने हाथ से मैं अब दूसरे किसी भी शख्सियत को जुहार नहीं करूंगा। यह सुनकर राजा रामचन्द्र ने तानसेन की ओर से नजरें फेर लीं और दु:खी हृदय से अपनी राजधानी की ओर गमन किया तो तानसेन ने आगरा की राह पकड़ी। अनुश्रुति है कि तानसेन ने अपने वचन को जीवन भर निभाया।

राजा रामचन्द्र का पड़ाव रूखसत हुआ, तब तानसेन ने राग बागेश्री चौताला में एक ध्रुपद रचना का गायन किया, जिसके बोल थे आज तो सखी री रामचन्द्र छत्रधारी, गज की सवारी लिए चले जात बाट हैं। कित्ते असवार सो हैं, कित्ते सवार जो हैं, कित्ते सौ हैं बरकदार अवर कित्ते आनंद के ठाठ।

ग्वालियर के महान कला पारखी एवं संगीत मर्मज्ञ राजा मानसिंह की मृत्यु होने और उनके उत्तराधिकारी विक्रमादित्य से ग्वालियर का राज्याधिकार छिन जाने के कारण वहां के संगीतज्ञों की मंडली बिखरने लगी। उस परिस्थिति में तानसेन ग्वालियर से वृंदावन चले गए और स्वामी हरीदास से संगीत की उचच शिक्षा प्राप्त की। आगरा के शासक इब्राहीम ने तानसेन को दरबार में आने का निमंत्रण भेजा। मगर तानसेन ने उस निमंत्रण को ठुकरा दिया। वे वैराग्य जैसा जीवन व्यतीत करने लगे। पर किसी अज्ञात कारण से तानसेन राजा रामचन्द्र की सभा की ओर आकर्षित हुए। राजा रामचन्द्र की राजसभा से वे पूरे हिंदुस्तान में विख्यात हो गए। उनकी ख्याति सुनकर मुगल बादशाह ने तानसेन को अपने दरबार में बुलाकर प्रतिष्ठित स्थान दिया। तानसेन जीवन पर्यंत सम्राट अकबर के नवरत्नों में शामिल रहे।

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