Gwalior : परिवहन विभाग में फर्जी शिकायतो का मामला ठंडा क्यों हुआ
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Gwalior : परिवहन विभाग में फर्जी शिकायतो का मामला ठंडा क्यों हुआ

ग्वालियर, मध्यप्रदेश : परिवहन विभाग में शिकायतो का जो खेल चल रहा है उससे विभाग बदनाम तो हो ही रहा है साथ ही आगे चलकर ऐसे मामले और भी सामने आ सकते है।

ग्वालियर, मध्यप्रदेश। परिवहन विभाग में शिकायतो का जो खेल चल रहा है उससे विभाग बदनाम तो हो ही रहा है साथ ही आगे चलकर ऐसे मामले और भी सामने आ सकते है। इस मामले का जब खुलासा हुआ तो तत्काल उसकी रिपोर्ट कराई गई और उसके बाद क्राइम ब्रांच ने पोस्ट ऑफिस से सीसीटीवी कैमरे से फुटेज भी लेकर परिवहन आयुक्त के पीए सत्यप्रकाश शर्मा के ड्राइवर को पकड़ पूछताछ की और जब मामला पीए सत्यप्रकाश पर आ टिका तो मामला एकाएक ठंडा हो गया। अब सवाल यह उठने लगा है कि आखिर किसके जवाब में इस मामले में आगे कार्यवाही होने में देरी हो रही है?

वैसे तो विभाग के अंदर काफी समय से आपस में एक दूसरे को लड़ाकर स्वंय मुनाफा कमाने का रास्ता खोजने का काम चल रहा था और इसी के चलते विभाग में करोड़ो की राशि का बंदरबांट की सूची बनाकर जब 9 स्थानो पर शिकायती पत्र भेजे गए तो एकाएक इस पर नजर दौड़ाई गई, क्योंकि मामला परिवहन विभाग के आयुक्त व परिवहन मंत्री से जुड़ा था। मामले की तहकीक ात की गई तो पता चला कि जिसके नाम से शिकायत की गई थी उसे बुलाकर पूछा तो उसने शिकायत करने से साफ इंकार कर दिया था। इसके बाद उक्त व्यक्ति से पुलिस मे एफआईआर दर्ज कराई गई और मामले की तहकीकात क्राइम ब्रांच ने की तो जिस पोस्ट ऑफिस से शिकायते पोस्ट हुई वहां के सीसीटीवी कैमरे खंगाल कर उस व्यक्ति की पहचान की गई तो लिफाफे लेकर शिकायत करने जा रहा था। इसकी जब क्राइम ब्रांच ने पड़ताल की तो वह व्यक्ति परिवहन आयुक्त के पीए सत्यप्रकाश शर्मा का ड्राइवर निकला। इसके बाद तत्काल क्राइम ब्रांच ने उस ड्राइवर को अपने कब्जे में लेकर जब उससे पूछताछ की तो उसने सत्यप्रकाश शर्मा द्वारा लिफाफे देना बताया था। इसके बाद मामले में सत्यप्रकाश शर्मा को नामजद किया गया था। परिवहन आयुक्त के पीए का नाम आते ही मामला हाई प्रोफाइल हो गया, क्योंकि उनको बचाने के लिए कई तरह के दवाब क्राइम ब्रांच तक आने लगे थे। इसके बाग सत्यप्रकाश शर्मा से पूछताछ कर उन्हे छोड़ दिया गया और अब मामले का एक तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है जिससे आगे की कड़ी क्या हो सकती थी उसका खुलासा होने से बच गया।

साधारण व्यक्ति होता तो क्या इसी तरह कार्यवाही होती :

अगर इस तरह के मामले में कोई साधारण व्यक्ति होता तो अभी तक पुलिस कई तरह की कार्यवाही कर चुकी होती, लेकिन परिवहन आयुक्त के पीए से जुडा मामला होने से उसमें क्राइम ब्रांच अब रुचि लेने से बच रही है। जबकि सत्यप्रकाश के साथ ही उसके ड्राइवर व फरियादी के साथ ही एक अन्य व्यक्ति के बयान हो चुके है उसके बाद भी मामले को ठंडे बस्ते में डालना संदेह पैदा करता है कि कार्यवाही करने से बचा जा रहा है। सूत्र का कहना है कि इस मामले में अगर कार्यवाही की जाती है तो विभाग के ही अधिकारी फंस सकते है, यही कारण है कि एक तरह से मामले को ठंडे बस्ते में डालने का काम किया गया है।

क्या मामले को लेकर समझौता कर लिया गया :

विभाग के सूत्र का कहना है कि इस मामले में अब जिस पर मामला दर्ज किया गया है और जिसने शिकायत की है उसके बीच एक तरह से समझौता हो गया है। अब समझौता किसने कराया इसको लेकर भी कई तरह की चर्चाएं विभाग के अंदर है। वैसे इस समझौते को कराने के लिए परिवहन आयुक्त के सबसे खास निरीक्षक ने अहम रोल निभाया है। बताया तो यहा तक गया है कि पहले परिवहन आयुक्त ने जिस तरह से फरियादी से शिकायत कराने का काम किया था उसके बाद उनके पास एक संदेश पहुंचाया गया था कि अगर मेरे खिलाफ कोई क ार्यवाही होती है तो फिर जो सूची मेरे पास है उसे सार्वजनिक कर दूंगा साथ ही उसे कोर्ट में भी पेश करूंगा। सूत्र का कहना है कि इसी संदेश के बाद से ही समझौते की रूपरेखा तैयार की गई और बीच का रास्ता निकालते हुए एक निरीक्षक के माध्यम से समझौता तय हुआ जिसके चलते मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया है।

अंदर की बाते सार्वजनिक तो हुई बदनामी :

परिवहन विभाग के अंदरखाने की बातो को सार्वजनिक रूप से दूसरे के नाम से सूची के साथ शिकायत करने का जो काम किया गया है वह शासकीय सेवक के रूप में गलत तो है ही साथ ही ऐसे व्यक्ति से भविष्य में कोई काम लेना पसंद नहीं करेगा। जिस तरह से करोड़ो की वसूली की सूची बनाकर परिवहन मंत्री व परिवहन आयुक्त की शिकायते एक नहीं बल्कि 9 स्थानो पर करने का काम परिवहन आयुक्त के पीए ने किया था उसकी पोल खुलने के बाद पीए पर एफआईआर तो दर्ज हो गई है, लेकिन अब उसी मामले में आगे कार्यवाही क्यों नहीं हो रही इसको लेकर कई तरह के सवाल क्राइम ब्रांच पर भी उठने लगे है।

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