होली पर भद्रा का साया नहीं, सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि व अमृत योग में होगा दहन
होली पर भद्रा का साया नहीं, सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि व अमृत योग में होगा दहनसांकेतिक चित्र

होली पर भद्रा का साया नहीं, सर्वार्थसिद्धि, अमृतसिद्धि व अमृत योग में होगा दहन

इंदौर, मध्यप्रदेश : कण्डों से करें होलिका दहन, प्रदोष काल श्रेष्ठ। वैश्विक महामारी कोरोना की समाप्ति हेतु जलती होली में श्रीफल, सरसों व कालीमिर्च अवश्य डालें।

इंदौर, मध्यप्रदेश। होली 'नवाहन्नेष्टि यज्ञ' पर्व है। खेत में नवीन अन्न को अग्नि में सेक कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है, इस सेंके हुए प्रसाद को होला कहा जाता है। इसी से इस उत्सव का नाम होलिका उत्सव पढ़ा, जो आज तक चला आ रहा है। यह वैदिक सोमयज्ञ भी है। वैदिककाल में सोमलता का रस निचोड़कर यज्ञ सम्पन्न होते थे जो सोमयज्ञ के नाम से प्रसिद्ध है। इस उत्सव के बारे में अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित है। कुछ इस पर्व का सम्बंध काम दहन से तो कुछ हिरण्यकश्यप की बहन की स्मृति में बताते हैं।

आचार्य पंडित शर्मा वैदिक ने आगे बताया कि सही मायने में यह आनन्द व उल्लास का पर्व है, जिसका उद्देश्य आपसी भाई चारा, एकता व परस्पर सद्भाव से है। इस वर्ष होलीका पर्व सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि व अमृत योग में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा रविवार को प्रदोष काल मे मनेगा। रविवार को पूर्णिमा तिथि रात्रि 12 बजकर 18 मिनिट तक रहेगी। उत्तरा फाल्गुनी व हस्त नक्षत्र, वृद्धि योग, बुध प्रधान कन्या राशि का चन्द्रमा, गुरु प्रधान मीन राशि का सूर्य व शनि प्रधान मकर राशि के बृहस्पति में प्रदोष काल मे होलिका का दहन होगा। शाम 6:40 से रात्रि 9 बजे तक रहेगा प्रदोष काल। इस प्रकार होलीका पर्व विशेष ज्योतिषीय संयोगों में मनेगा।

आचार्य शर्मा वैदिक ने बताया कि 28 मार्च रविवार को भद्रा दोपहर 1 बजकर 51 मिनिट तक रहेगी। सामान्य: होलिका दहन प्रदोष काल में किया जाता है। धर्मशास्त्रों की स्पष्ट मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल मे होलिका दहन शुभ होता है। प्रदोष काल क्या है? सूर्यास्त के बाद कि छ: घड़ी अर्थात 2 घण्टा 24 मिनिट का काल प्रदोषकाल कहलाता है। होलिका दहन पूर्णत: विज्ञान सम्मत है। अग्नि से मानव शरीर व भूमण्डल पर परमाणुओं में स्तिथ कफजनक कीटाणुओं का विनाश होता है। यही कफ जनक कीटाणु ही वैश्विक महामारी कोरोना को बढ़ावा देते हैं व कारण भी। प्रदोषकाल में दहन के पूर्व विविध पूजा उपचारों से होलिका की सविधि पूजा अर्चना करना चाहिए। पूजा में साबुत नारियल, पीली सरसों व कालीमिर्च दहन के पश्चात अवश्य डालना चाहिए। इससे आरोग्यता बनी रहती है।

आचार्य पण्डित शर्मा वैदिक ने बताया कि संहिता ग्रन्थों व शकुन शास्त्रों की मानें तो होलिका दहन समय के वायु प्रवाह से भविष्य/शुभाशुभ भी जाना जा सकता है। होली दीपन के समय पूर्व दिशा का प्रभाव 'शुभ', आग्नेय कोण का आगजनी कारक, दक्षिण का दुर्भिक्ष व पीड़ाकारक, नैऋत्य का फसलों के लिए हानिकारक, पश्चिम का सामान्य, मिश्रित, वायव्य कोण का चक्रवार, पवनवेग व आंधी कारक, उत्तर व ईशान कोण का मेघ गर्जना सूचक। यदि होलिका दहन के समय वायु प्रवाह चतुष्कोणीय हो तो राष्ट्र संकट कारक होता है। इस प्रकार होलिका दहन के दिन वायु प्रवाह से शुभाशुभ की जानकारी भी प्राप्त होती है। दिन में होलिका दहन भूल कर भी नही करें।

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