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मुख्यमंत्री कमलनाथ
मुख्यमंत्री कमलनाथ|Social Media
मध्य प्रदेश

MPPSC में फीस वृद्धि युवाओं के हितों के साथ अन्याय है- मुख्यमंत्री

एमपीपीएससी के आवेदन शुल्क में बढ़ोत्तरी को लेकर युवाओं में नाराज़गी है। युवाओं की नाराज़गी को देखते हुए सीएम कमलनाथ ने दिए दिशा- निर्देश।

रवीना शशि मिंज

राज एक्सप्रेस। मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा एमपी- पीएससी की ऑनलाइन फीस वृद्धि का प्रदेशभर में विरोध हो रहा है, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने भी फीस वृद्धि पर नाराज़गी जताई है। मुख्यमंत्री का कहना है कि, बिना उन्हें जानकारी दिए ही पीएससी ने ऑनलाइन फीस में बढ़ोत्तरी कर दी। मुख्यमंत्री ने तत्काल प्रभाव से फीस बढ़ोत्तरी पर रोक लगाने को कहा है।

सीएम कमलनाथ ने नाराज़गी जताते हुए कहा - 'हमारी सरकार युवाओं को रोजगार देने का विज़न लेकर काम कर रही है। रोजगार बढ़ाने के लिए तमाम योजनाएं लेकर आ रही है। ऐसे में फीस वृद्धि का फैसला युवाओं के हितों के साथ न्याय नहीं है।'

आपको बता दें कि मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग ने बीते दिनों राज्य सेवा परीक्षा का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। परीक्षा का नोटिफिकेशन आने के बाद अभ्यर्थियों ने राहत की सांस ली है क्योंकि पीएससी और शासन की देरी से एक साल बाद परीक्षा घोषित हुई।

अभ्यार्थी समय के आभाव को लेकर परेशान तो हैं ही साथ ही परीक्षा आवेदन शुल्क की बढ़ी हुई फीस भी उन्हें परेशान कर रही है।

आयु सीमा के फॉर्मूले पर विवाद शुरू

प्रदेश में आयु सीमा की गणना के फॉर्मूले को लेकर विवाद शुरू हो गया है। परीक्षा में आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की आयु की गणना 1जनवरी, 2020 के आधार पर की जाएगी। आयु सीमा पर खड़े अभ्यार्थी आयुसीमा गणना के इस फॉर्मूले के चलते परीक्षा में भाग नहीं ले सकते।

अभ्यर्थियों का कहना है कि परीक्षा 2019 की है तो आयु की गिनती वर्ष 2020 के आधार पर क्यों की जा रही है?

इस फीस बढ़ोत्तरी के कारण अभ्यर्थियों में नाराज़गी देखी गई। लोगों से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री ने फीस पर रोक लगाने को कहा है।

आवेदन शुल्क को कम करने के लिए ग्वालियर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के विधायक प्रवीण पाठक ने मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखकर परीक्षा शुल्क कम करने का आग्रह किया था।

पत्रकार रवीश कुमार ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र -

एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर और टीवी जर्नलिस्ट रवीश कुमार ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखा। बढ़ी हुई फीस का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने लिखा - दो से तीन गुना फीस बढ़ोत्तरी की गई है तो क्या सरकार के पास राजस्व के साधन नहीं बचे?

फ़ीस बढ़ाने की जगह आप परीक्षा को ईमानदार और पारदर्शी बनाते तो स्वागत योग्य होता, परीक्षा का कैलेंडर बनाकर और उसके अनुसार ज्वाइनिंग देकर दिखाते, तो वाहवाही होती। वो आप अभी तक नहीं कर सके, लेकिन ढाई हज़ार फार्म के? वैसे 1200 भी अति है।

उम्र की गफलत से परीक्षाएं रूकी थी

असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में सरकार ने मप्र के मूल निवासियों को आयु सीमा में जहां 10 से 15 वर्ष की छूट दी थी, वहीं दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों की उम्र सीमा 28 रखी थी। इस मामले में उप्र के एक उम्मीदवार ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी।

याचिका पर हाईकोर्ट ने उम्र के आधार पर दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों के साथ भेदभाव को संविधान के अनुच्छेद 16,1 का उल्लंघन बताया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद मप्र सरकार ने एमपीपीएससी ने प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में दूसरे राज्यों के उम्मीदवारों को भी आयु सीमा में छूट दे दी थी।

विज्ञापन जारी नहीं करने की दूसरी वजह दिव्यांगों को दिया जाने वाला आरक्षण है। सरकारी परीक्षाओं में दिव्यांगों को कुल 6% आरक्षण मिलता है। 6 प्रतिशत आरक्षण को भी 3 वर्गो में बांटा गया है जैसे 2% दृष्टिहीनों, 2% मूक- बधिरों और 2% अस्थि विकलांगो को दिया जाता था। इसमें अब बहुदिव्यांगों को जोड़ दिया गया है। ऐसे में दिव्यांग अभ्यर्थियों को आरक्षण बंट जाने का डर था।

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