ग्वालियर : साइलेंट मोड पर भाजपा के दिग्गज नेता

ग्वालियर, मध्य प्रदेश : भाजपा के दिग्गज ही नहीं कई कार्यकर्ता भी खुलेआम अपना दर्द उजागर कर रहे हैं कि कांग्रेसियों के थोक में भाजपाई बन जाने से पार्टी मेें उनकी पूछपरख कम हो गई है।
ग्वालियर : साइलेंट मोड पर भाजपा के दिग्गज नेता
साइलेंट मोड पर भाजपा के दिग्गज नेताRaj Express

ग्वालियर, मध्य प्रदेश। ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा के पाले में आ जाने से भाजपा की भले ही प्रदेश की सत्ता में वापसी हो गई हो, लेकिन भाजपा के कई दिग्गज खुद को उपेक्षित महसूस कर साइलेंट मोड में नजर आ रहे हैं। दिग्गजों की ये खामोशी उपचुनाव में कितना असर डालेगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन आम भाजपाई के मन में ये सवाल जरूर है कि इन दिग्गजों का इतने महत्वपूर्ण चुनाव में क्या योगदान है?

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भान्जे अनूप मिश्रा की एक समय प्रदेश की राजनीति में तूती बोलती थी। प्रदेश सरकार में मंत्री रहते स्वर्णरेखा के लिए केंद्र से करोड़ों का प्रोजेक्ट लाने से लेकर अनेक बड़ी योजनाएं वे ग्वालियर लेकर आए, लेकिन भितरवार से चुनाव हारने के बाद वे पार्टी की गतिविधियों में नजर नहीं आ रहे हैं। इसकी जो भी वजह हो। एक दबंग ब्राह्मण नेता की छवि रखने वाले अनूप मिश्रा को लेकर आमजनों में यह चर्चा जरूर है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के अशोक शर्मा को भाजपा ने ब्राह्मण नेता के तौर पर हाथों हाथ लिया है, लेकिन अपने ही पार्टी के तेजतर्रार नेता अनूप मिश्रा को उपचुनाव में शायद अब तक कोई अहम जिम्मेदारी नहीं दी है।

कमोवेश यह स्थिति प्रदेश सरकार में मंत्री रहे नारायण सिंह कुशवाह की नजर आ रही है। भाजपा के हर छोटे बड़े कार्यक्रम में नजर आने वाले नारायण सिंह उपचुनाव में कहीं नहीं दिख रहे हैं। अपनी ही पार्टी से बागी होकर चुनाव में उतरी समीक्षा की वजह से उन्हें जो हार का दंश झेलना पड़ा, उसको वे आज तक भूल नहीं पाए हैं। समीक्षा के बागी हो जाने से कांग्रेस के प्रवीण पाठक बहुत ही कम अंतर से विधायक चुन लिए गए और नारायण सिंह को हार का सामना करना पड़ा। नारायण सिंह की पीड़ा यह भी है कि उनकी हार का कारण बनी समीक्षा को पुन: भाजपा में शामिल कर लिया है, वे चुनाव प्रचार में भी नजर आ रही हैं, लेकिन नारायण सिंह कहीं नजर नहीं आ रहे हैं।

जयभान सिंह पवैया की पीड़ा कुछ अलग है। जिस सिंधिया परिवार को निशाना बनाकर वे राजनीति करते थे, ऐसे सिंधिया के भाजपा में आ जाने से वे शांत हो गए हैं, हालांकि समय समय पर उनकी पीड़ा शब्दों की रूप में सामने भी आई है। खुद को पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता बताने वाले पवैया ग्वालियर विधानसभा में प्रद्युम्न सिंह तोमर के साथ जनता से हाथ जोड़कर वोट मांगते भी नजर आए, लेकिन विधानसभा में खासा जनाधार रखने वाले पवैया के समर्थकों की चुनाव में क्या भूमिका पर भी ग्वालियर विधानसभा का परिणाम निर्भर करेगा।

सोशल मीडिया पर निकाल रहे भड़ास :

भाजपा के दिग्गज ही नहीं कई कार्यकर्ता भी खुलेआम अपना दर्द उजागर कर रहे हैं कि कांग्रेसियों के थोक में भाजपाई बन जाने से पार्टी मेें उनकी पूछपरख कम हो गई है। कांग्रेस से आए लोगों को अधिक तब्वजो मिल रही है, जबकि पूछ परख के लिए रूठे भाजपाईयों से अब तक संपर्क तक नहीं किया गया है कि आखिर वजह क्या है? भाजपा के जिला मीडिया प्रभारी रहे सुबोध दुबे ने सोशल मीडिया पर अपनी पीड़ा उजागर करते हुए लिखा है कि किसी वरिष्ठ नेता ने उन्हें उपचुनाव में पूछा तक नहीं हैं।

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