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Maa Sharda Temple Maihar
Maa Sharda Temple Maihar|Social Media
मध्य प्रदेश

नवरात्रि स्‍पेशल: शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के दशर्न से मिलेगी सुखद अनुभूती

अगर आप भी नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के मंदिर के दर्शन करने का प्‍लान बना रहे हैं, तो शक्तिपीठों में एक मैहर वाली शारदा देवी के दर्शन करने जा सकते हैं, जो आपके लिए एक अच्‍छा टूर साबित हो सकता है।

Priyanka Sahu

Priyanka Sahu

राज एक्‍सप्रेस। हिंदू धर्म में नवरात्र का बहुत महत्‍व है, इन दिनों मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है और आज नवरात्र का पहला दिन है। इस मौके पर बहुत से भक्‍त देश में मौजूद अलग-अलग देवी मंदिरों के दर्शन करने के लिए जाते हैं। अगर आप भी नवरात्र पर मां दुर्गा के मंदिर के दर्शन करने का प्‍लान बना रहे हैं, तो हम आपको देवी दुर्गा के इस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपके लिए एक अच्‍छी ट्रैवल साबित हो सकती है एवं नवरात्रि के दिनोंं में यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर मध्‍यप्रदेश में 'मां मैहर देवी शारदा' (Maa Sharda Temple Maihar) का है, बोलचाल की भाषा में इसे मईयर और मैयर का नाम दिया गया है।

है एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थस्थल :

मध्यप्रदेश में स्थित मैहर एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थस्थल है, त्रिकूट पर्वत की 600 फुट की ऊंचाई पर शारदा देवी का यह मंदिर स्थित है। इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ काल भैरवी, भगवान हनुमान जी, देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, फूलमति माता, ब्रह्म देव और जलापा देवी की पूजा की जाती है। मैहर शहर का नाम भी भगवान से जुड़ी कहानी पर ही निर्धारित है। कहा जाता है कि, जब भगवान शिवजी देवी सती के शव को अपने कंधे पर उठा कर ले जा रहे थे, तब उनके गले का हार टूट कर इस जगह पर गिर गया और तब से ही इस शहर का नाम माई का हार, 'मैहर' पड़ गया, इसीलिए इसकी गणना शक्तिपीठों में की जाती है।

शारदा देवी मंदिर के बारे में :

  • शारदा देवी का यह प्रसिद्ध मंदिर देश के लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है, यह मंदिर धार्मिक तथा ऐतिहासिक है।

  • इस मंदिर तक पहुँचने के लिए आपको 1063 सीढ़ियाँ को पार करना होगा।

  • मैहर के इस मंदिर की महत्ता हर साल लाखों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

  • इस मंदिर में शारदा माँ की पूजा होती है।

  • वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, नवरात्रि पर्व पर तो यहाँ पर भक्तों का भारी सैलाब उमड़ता है।

  • यह मंदिर सतयुग के प्रमुख अवतार नृसिंह भगवान के नाम पर 'नरसिंह पीठ' के नाम से भी विख्यात है।

मैहर शारदा देवी मंदिर यातायात मार्ग :

रेल यात्रा- राजधानी दिल्ली से मैहर तक की सड़क से दूरी लगभग 1000 किलोमीटर है। ट्रेन से पहुंचने के लिए महाकौशल व रीवा एक्सप्रेस उपयुक्त हैं। दिल्ली से चलने वाली महाकौशल एक्सप्रेस सीधे मैहर पहुंचती है और रीवा एक्सप्रेस से यात्रा करने वाले भक्तजनों को मजगांव पर उतरना चाहिए, वहां से मैहर लगभग 15 किलोमीटर दूर है।

सड़क यात्रा- मैहर नैशनल हाइवे से जुड़ा हुआ है, यहाँ आप मध्य प्रदेश के बाकी शहरों से सड़क के रास्ते द्वारा आराम से पहुँच सकते हैं। कई बस सेवाएँ यहाँ तक के लिए उपलब्ध हैं।

विश्राम की सुविधाएं भी उपलब्‍ध :

मैहर पहुंचने के बाद आप किसी धर्मशाला या होटल में थोड़ा विश्राम करके माता के दर्शनों के लिए आप चढ़ाई आरंभ कर सकते हैं। कहते हैं, मां हमेशा ऊंचे स्थानों पर विराजमान होती हैं। जैसे लोग मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहाड़ों को पार करते हुए वैष्णो देवी तक पहुंचते हैं, ठीक उसी तरह मध्य प्रदेश के सतना जिले में भी 1063 सीढ़ियां चलकर 'मां शारदा देवी' के दर्शन करते हैं। बुज़ुर्ग और शारीरिक दुर्बलता से पीड़ित लोगों को यहाँ तक पहुँचाने के लिए 'रोप वे' का भी प्रबंध है। मंदिर के चारों तरफ पुलिस जवानों का पहरा लगा रहता है, किसी प्रकार की अनहोनी से निपटने के लिए जिला प्रशासन ने चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के इंतजाम कर रखे हैं।

देवी मां शारदा तक पहुंचने की यात्रा 4 खंडों में विभक्त :

  • मैहर देवी मां शारदा तक पहुंचने की यात्रा का प्रथम खंड 480 सीढ़ियों को पार करना होता है। मंदिर के सबसे निकट त्रिकूट पर्वत से सटा मंगल निकेतन बिड़ला धर्मशाला है, इसके पास से ही येलजी नदी बहती है।

  • द्वितीय खंड 228 सीढ़ियों का है, इस यात्रा खंड में पानी व अन्य पेय पदार्थों का प्रबंध है। यहां पर आदिश्वरी माई का प्राचीन मंदिर है।

  • यात्रा के तृतीय खंड में 147 सीढ़ियां और चौथे, अंतिम खंड में 196 सीढ़ियां पार करनी होती हैं, तब मां शारदा का मंदिर आता है।

सबसे पहले आल्हा और ऊदल करते हैं देवी की पूजा :

भक्तों का ऐसा मानना है कि, शाम की आरती होने के बाद जब मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते है, तब मां शारदा माई के प्रिय भक्त आल्हा और ऊदल मंदिर में आते हैं। आज भी मां का पहला श्रृंगार और पूजा-आरती कर माता शारदा के दर्शन सबसे पहले आल्हा और ऊदल ही करते हैं। कहा जाता है कि, उस समय बंद मंदिर से घंटी और पूजा करने की आवाज आती रहती है। यह मान्यता मंदिर में अब तक जारी है, मैहर मंदिर के महंत पंडित बताते हैं कि, मंदिर के पट खोले जाते हैं तो, पूजा की हुई मिलती है। इस रहस्य को सुलझाने हेतु वैज्ञानिकों की टीम भी डेरा जमा चुकी है, लेकिन रहस्य अभी भी बरकरार है, जो इस पर विश्वास नहीं करता वे अपनी आंखों से जाकर देख सकता है।

मंदिर से जुड़ी रहस्यमयी कहानी :

मैहर के मंदिर की एक रहस्यमयी कहानी यह है कि, इस मंदिर के दरवाज़े सिर्फ रात्रि 2 बजे से सुबह 5 बजे तक 3 घंटों के लिए ही बंद रहते हैं। इस समय हर रोज़ माता का श्रृंगार और उनकी पूजा-अर्चना सबसे पहले आल्हा और ऊदल ही करते हैं और इस दौरान अगर कोई मां के मंदिर में आता है, तो उसकी मृत्यु निश्चित होती है।

कौन थे आल्हा और ऊदल:

आल्हा और ऊदल दो भाई थे, ये बुन्देलखण्ड के महोबा के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे। कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खण्ड नामक एक काव्य रचा था, उसमें इन वीरों की गाथा वर्णित है। इस प्रसिद्ध तीर्थ स्थल के सन्दर्भ में एक अन्य दन्तकथा यह भी प्रचलित है कि आल्हा और ऊदल, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ भी युद्ध किया था, वे भी शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे।

'शारदा माई' नाम क्यों रखा :

कहते हैं कि, इन दोनों भाईयों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच मैहर में 'शारदा देवी' के इस मंदिर की खोज की थी। आल्हा ने यहां 12 सालों तक माता की तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया और माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। दोनों भाईयों ने भक्ति-भाव से अपनी जीभ शारदा को अर्पण कर दी थी, जिसे माँ शारदा ने उसी क्षण वापस कर दिया था। आल्हा माता को 'शारदा माई' कहकर पुकारा करते थे, इसीलिए प्रचलन में उनका नाम 'शारदा माई' हो गया। इस मंदिर में जानवरों की बलि देने की प्रथा थी, लेकिन अब इसे बंद कर दिया गया। मंदिर के पीछे और पहाड़ों के नीचे एक तालाब है, जिसे 'आल्हा तालाब' कहा जाता है।

तालाब से दो किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ आल्हा और ऊदल कुश्ती लड़ा करते थे। इसके अलावा ये भी मान्यता है कि, यहां पर सर्वप्रथम आदि गुरू शंकराचार्य ने 9वीं या 10वीं शताब्दी में पूजा-अर्चना की थी। स्थानीय परंपरा के हिसाब से आज तक लोग माता के दर्शन के साथ-साथ दो महान योद्धाओं आल्हा और ऊदल के भी दर्शन करते हैं।