जबलपुर : चूल्हा चौका छोड़ा, अब चुनावी मैदान में उतरने तैयार हैं श्रीमतियां

जबलपुर, मध्य प्रदेश : वार्ड पार्षद चुनाव को लेकर शुरू हुई तैयारियां, महिला वार्डों में लगेगा राजनैतिक तड़का।
जबलपुर : चूल्हा चौका छोड़ा, अब चुनावी मैदान में उतरने तैयार हैं श्रीमतियां
चूल्हा चौका छोड़ा, अब चुनावी मैदान में उतरने तैयार हैं श्रीमतियांSocial Media

जबलपुर, मध्य प्रदेश। नगर निगम चुनाव को लेकर शासन के द्वारा वार्ड आरक्षण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है, अब आगामी दिनों में होने जा रहे वार्ड पार्षद चुनाव को लेकर एक तरफ जहां प्रशासन के द्वारा सभी शासकीय आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं, तो वहीं वार्ड के स्थानीय जनप्रतिनिधि भी चुनाव मैदान में अपने-अपने स्तर पर डटे हुए दिखाई दे रहे हैं। इसलिए कुछ जनप्रतिनिधियों के वार्ड आरक्षण प्रक्रिया के चलते महिला वार्ड हो जाने से अब उन्होंने अपनी-अपनी श्रीमतियों को किचिन से चूल्हा चौका छोड़ने को कह कर मैदानी स्तर पर जनता के बीच पहुंचकर राजनीति करने कहा गया है, जो अब किचिन के अलावा मैदान में राजनीति का भी तड़का लगाएंगी।

गौरतलब है कि विभिन्न राजनैतिक दलों से जुड़े वार्ड स्तर के कार्यकर्ता व पदाधिकारी लम्बें समय से क्षेत्र की राजनीति इसलिए करते आ रहे थे कि उन्हें वार्ड पार्षद के चुनाव में उतरने का मौका मिलेगा, लेकिन उनकी सभी उम्मीदों पर वार्ड आरक्षण की प्रक्रिया ने पानी फेर दिया है, फिर इसके बाद ऐसे बहुत से जनप्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी श्रीमतियों को चुनावी मैदान के लिए वार्ड पार्षद का चुनाव लडऩे के लिए लांच किया जा रहा है, जो कि इसके पहले सिर्फ अपने घर में रहकर घर गृहस्थी संभाला करती थीं, अब उनके ऊपर उनके श्रीमानों ने अपनी राजनीति में वर्चस्व बरकरार रखने के लिए राजनीति क ी अतिरिक्त जबावदारी सौंप दी है।

अभी टिकिट तय नहीं, फिर भी तैयारी शुरू :

वार्ड पार्षद चुनाव को लेकर अभी तो किसी की टिकिट पक्की नहीं हुई है, लेकिन सभी इस प्रकार से जो महिला वार्ड हुए हैं, उन पर अपनी-अपनी श्रीमतियों का नाम आगे करके अब उनके श्रीमान अपनी राजनीति को चमकाने का काम कर रहे हैं और पार्षद की टिकिट का दावा अपनी-अपनी पार्टी के समक्ष श्रीमतियों के नाम से किया जाने लगा है।

वर्षों से राजनीति करने वाली महिलाओं का क्या :

वहीं महिलाओं के लिए आरक्षित हुए वार्ड आरक्षण में अगर राजनैतिक पार्टियां महिला पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को छोड़कर अगर श्रीमानों की श्रीमतियों के नाम वार्ड की टिकिट दी जाती है तो इससे लम्बें समय से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं व पार्टी के पदाधिकारी महिलाओं में विरोध के भी स्वर देखने को मिल सक ते हैं। इसके लिए अभी से ही ऐसी महिला कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने महिला वार्ड से टिकिट का दावा अपने वरिष्ठ नेताओं के समक्ष करती हुई देखी जा रही हैं, लेकिन यह सब देखने का विषय है कि आगे टिकिट वितरण प्रक्रिया के दौरान किसको टिकिट मिलती है या फिर किसको नहीं...?

नाम के लिए होंगी श्रीमतियां, काम तो श्रीमान ही करेंगे :

जैसा कि मालूम हो कि हर बार यही होता है कि जो भी श्रीमानों की श्रीमतियां इसके पहले भी चुनावी मैदान में उतरकर चुनाव लड़ी थीं और वार्ड पार्षद का चुनाव जीती थीं, उस पर केवल उनका शासकीय कागजों में नाम बस चलता है और बाकी काम सभी ऐसी पार्षद महिलाओं के श्रीमानों के द्वारा ही किया जाता है।

घरेलू महिलाओं के साथ होगी ज्यादा दिक्कत :

ऐसे श्रीमानों की श्रीमतियां जिन्होंने आज तक राजनीतिक का क ख ग घ नहीं जाना है, उन्हें वार्ड पार्षद चुनाव की राजनीति करने में बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है, अब ऐसी स्थिति में उन्हें जनता के बीच में जाकर उनकी बातें सुनना व उनकी समस्याओं को जानकर खुद परेशान होने जैसी स्थितियां बन रही हैं, लेकिन क्या करें, उन्हें अपने-अपने श्रीमानों के लिए मजबूरी में राजनीति करना पड़ रहा है और चूल्हा चौका संभालने के साथ-साथ राजनीति का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है।

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