छिंदवाड़ा जिले में अब मोतियों की भी खेती होगी
अब छिन्दवाड़ा में मोतियों की खेती होगी
राज एक्सप्रेस, संवाददाता

छिंदवाड़ा जिले में अब मोतियों की भी खेती होगी

भारतीय बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजार में मोतियों का निर्यात और रोजगार के अवसर मिलने से युवा आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे, सीपों से कन्नौज में इत्र का तेल निकालने का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।

छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश। कृषि के क्षेत्र में छिन्दवाड़ा जिले में बहुफसलीय खेती की जाती है, किंतु अब छिन्दवाड़ा में मोतियों की खेती भी हो सकेगी। मोतियों की खेती से जिले के युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर मिलने से वे आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकेंगे।

जिले में मोतियों की खेती का सुअवसर जवाहर लाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत छिंदवाड़ा स्थित चंदनगांव में संचालित कृषि विज्ञान केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ.सुरेन्द्र पन्नासे के सफल प्रयासों और मार्गदर्शन से हासिल हो सका है एवं मोती की खेती का आगाज हो चुका है।

इसके लिये भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा कृषि विज्ञान केन्द्र चंदनगांव में कार्यक्रम सहायक के पद पर पदस्थ श्रीमती चंचल भार्गव को आदिवासी उपयोजना के अंतर्गत मोती की खेती संबंधी परियोजना का प्रभार सौंपा गया है जो जिले में मोती की खेती के इच्छुक युवाओं व किसानों को मोती की खेती का प्रशिक्षण एवं अन्य मार्गदर्शन प्रदान करेंगी।

जिले में मोती की खेती के लिये इच्छुक अभी तक लगभग 45 युवा और किसान कृषि विज्ञान केन्द्र में आकर इस परियोजना का अवलोकन कर जानकारी प्राप्त कर चुके हैं और उन्होंने मोती की खेती में अपनी रूचि दिखाई है।

कृषि विज्ञान केन्द्र चंदनगांव की कार्यक्रम सहायक श्रीमती भार्गव ने बताया कि छिंदवाड़ा जिले के किसान सभी प्रकार की खेती करते हैं, लेकिन आजकल मोती की खेती का चलन तेजी से बढ़ रहा है। कम मेहनत और न्यूनतम लागत में अधिक मुनाफे का सौदा साबित होने से मोती की खेती की ओर युवाओं का रूझान बढ़ा है।

कार्यक्रम सहायक श्रीमती भार्गव ने बताया कि मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम शरद ऋतु यानी अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है। कम से कम 100X80X12 फीट या बड़े आकार के तालाब में मोतियों की खेती की जा सकती है। मोती संवर्धन के लिये 0.4 हेक्टेयर जैसे छोटे तालाब में अधिकतम 15 हजार सीप से मोती उत्पादन किया जा सकता है। खेती शुरू करने के लिए किसान को पहले तालाब, नदी आदि से सीपों को इकठ्ठा करना होता है या फिर इन्हें खरीदा भी जा सकता है। इसके बाद प्रत्येक सीप में छोटी-सी शल्य क्रिया करके इसके भीतर 4 से 6 मि.मी. व्यास वाले साधारण गोल या डिजायनदार बीड जैसे गणेश, बुद्ध, पुष्प आकृति आदि डाले जाते हैं। लगभग 12 से 15 माह बाद सीप को चीरकर मोती निकाल लिया जाता है। एक सीप की लागत लगभग 35 से 40 रुपए आती है। बाजार में एक मि.मी. से 20 मि.मी. सीप के मोती का दाम करीब 100 रूपये से लेकर 1500 रूपये तक होता है।

आजकल डिजायनर मोतियों को खासा पसन्द किया जा रहा है, जिनकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। भारतीय बाजार की अपेक्षा विदेशी बाजार में मोतियों का निर्यात कर काफी अच्छा पैसा कमाया जा सकता है। सीप से मोती निकाल लेने के बाद सीप को भी बाजार में बेचा जा सकता है। सीप द्वारा कई सजावटी सामान तैयार किये जाते हैं।

सीपों से कन्नौज में इत्र का तेल निकालने का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है जिससे सीप को स्थानीय बाजार में भी तत्काल बेचा जा सकता है। सीपों से नदी और तालाबों के जल का शुद्धीकरण भी होता रहता है जिससे जल प्रदूषण की समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है। मृत सीपों का चूरा बनाकर कुक्कुट को देने से कैल्शियम की पूर्ति भी की जा सकती है। इस प्रकार मोतियों की खेती से मोती और सीप दोनों से आय अर्जित की जा सकती है।

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