उमरिया : बांधवगढ़ में संरक्षित क्षेत्र से सटकर भू-खण्ड का विक्रय
बांधवगढ़ में संरक्षित क्षेत्र से सटकर भू-खण्ड का विक्रयRaj Express

उमरिया : बांधवगढ़ में संरक्षित क्षेत्र से सटकर भू-खण्ड का विक्रय

उमरिया, मध्य प्रदेश : बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में जिस तरह से नियम और कायदों का माखौल उड़ाया जा रहा है, उससे वन्यप्राणियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।

उमरिया, मध्य प्रदेश। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में जिस तरह से नियम और कायदों का माखौल उड़ाया जा रहा है, उससे वन्यप्राणियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है। प्रबंधन की लापरवाही का खामियाजा वन्यप्राणियों को भुगतना पड़ रहा है। इन दिनों बीटीआर में कमर्शियल निर्माण हो रहा है, किन्तु अधिकारी निर्माणकर्ताओं के सामने बौने साबित हो रहे हैं। केन्द्र सरकार भले ही टाईगर रिजर्व के संरक्षित क्षेत्रों के आस-पास वन्य प्राणी सुरक्षा दृष्टि हेतु राजपत्र व अधिनियम भले पारित कर ले, किन्तु राजपत्र के परिपालन में राजस्व विभाग के खलल के कारण वन विभाग अपनी कार्यवाही में उलझनों में पड़ जाता है, जिन कारणों से अपनी उदासीनता के कारण सुर्खियों में रहने वाले पार्क प्रबंधन को कार्यवाई से बचने का मौका मिल जाता है।

यह है मामला :

बांधवगढ़ पूंजीपतियों व रसूखदारों के लिए व्यापार का केन्द्र बिंदु बना हुआ है, जिसके फेर में बीटीआर के संरक्षित क्षेत्र से सटकर कामर्शियल निर्माण किया जा रहा है तो, वहीं इससे लगी भूमि के खरीद-फरोक्त कराने में राजस्व अमला भी पीछे नहीं है। राजस्व विभाग की लापरवाही के कारण राजस्व भूमि के नाम पर नियम को ताक में रख कामर्शियल उपयोग के लिए संरक्षित क्षेत्र की सीमाओं से सटकर भूमि का विक्रय व निर्माण हो रहा है, जबकि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आला-अफसर गहरी निंद्रा में लीन हैं, जिससे उन्हें अवैध निर्माण कार्य पर रोक लगाने से बचने का मौका भी मिल रहा है, ऐसे में दो विभागों के जिम्मेदारों पर सवाल उठ रहे हैं।

राजपत्र में पारित नियम :

भारत सरकार द्वारा 14 दिसंबर 2016 में पारित अधिनियम को देखा जाए तो, संरक्षित क्षेत्र के बांउड्रीवॉल से 1 किमी की परिधि में कोई भी कामर्शियल निर्माण नहीं किया जा सकता। किन्तु बांधवगढ में यह धड़ल्ले से जारी है। दूसरी ओर संरक्षित क्षेत्र से सटकर जिन भूमि का विक्रय व डायवर्सन हो जाता है, उसमें संरक्षित क्षेत्र के वन अधिकारियों को कार्यवाही करने में कई अड़चनें आती हैं, जिस कारण से अधिकारी कार्यवाही करने से दूर भागते हैं।

कमी का उठा रहे फायदा :

टाइगर रिजर्व संरक्षित क्षेत्र के सुरक्षा दृष्टि हेतु सर्वोच्च न्यायालय व भारत सरकार द्वारा एलएसी (लोकल एडवाइजर कमेटी) गठित की गई है, जिसमें कमिश्नर, अध्यक्ष व पार्क क्षेत्र संचालक सदस्य, सचिव व कलेक्टर सदस्य के साथ ही जनप्रतिनिधि भी सदस्य होते हैं, इस समिति की अनुशंसा के बाद ही इको सेंसटिव जोन में किसी प्रकार की निर्माण के अनुमति के लिए अनुशंसा की जा सकती है। जिसके पश्चात् अनुमति देने का प्रावधान है। साथ ही अनुमति देने या अनुशंसा करने के लिए राजपत्र के पारित नियम के तहत ही किया जा सकता है, लेकिन बांधवगढ में भूमि विक्रय व डायवर्सन पर कोई विचार नहीं किया जाता, जिसका फायदा दलाल व जमीन विक्रेता व के्रता उठा लेते हैं।

वन्यजीवों के लिए संकट :

बांधवगढ टाइगर रिजर्व के संरक्षित क्षेत्रों से सटकर हो रहे भूमि विक्रय से लेकर कामर्शियल निर्माण कार्य वन्य प्राणियों के अस्तित्व पर संकट बन चुका है। बाघ व अन्य वन्य जीवों के एक जोन से दूसरे जोन पर जाने के लिए कॉरिडोर मार्ग में बंद हो रहा है, जहां ग्रामीणों के घरों में वन्यप्राणी घुसते हैं और जानलेवा हमला करते हैं। टाइगर रिजर्व अंतर्गत 2016 के बाद हुए कार्य निर्माण पर विभाग द्वारा किसी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की गई, जबकि कुछ दिनों पहले तत्कालीन उप वन संचालक सिद्धार्थ गुप्ता द्वारा कई अवैध निर्माण करने वाले रिर्सोट संचालकों को नोटिस जारी की गई थी, लेकिन श्री गुप्ता के तबादले के बाद कार्यवाई ठण्डी पड़ गई।

इनका कहना है :

मेरे पास शिकायत आयेगी तो, पूरे मामले में उचित कार्यवाही की जायेगी।

व्ही.सेंट. रहीम, क्षेत्र संचालक, बांधवगढ़

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