तानसेन समारोह : सर्द मौसम में घुली सुरों की गर्माहट
तानसेन समारोह : सर्द मौसम में घुली सुरों की गर्माहटSocial Media

तानसेन समारोह : सर्द मौसम में घुली सुरों की गर्माहट

ग्वालियर, मध्य प्रदेश : सोमवार को सर्द हवाओं के बीच जब शास्त्रीय रागों से ओतप्रोत गायक वादकों ने तानसेन समारोह में जब गायन-वादन की प्रस्तुति दी तो ऐसा लगा मानो सर्द मौसम में सुर गर्माहट घोल रहे हैं।

ग्वालियर, मध्य प्रदेश। सोमवार को सर्द हवाओं के बीच जब शास्त्रीय रागों से ओतप्रोत गायक वादकों ने तानसेन समारोह में जब गायन-वादन की प्रस्तुति दी तो ऐसा लगा मानो सर्द मौसम में सुर गर्माहट घोल रहे हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का पूर्णत: पालन करते हुए रसिकों ने तानसेन समारोह का आनंद उठाया। रसिकों को द्वार पर प्रवेश पत्र दिया गया और बाहर आने के बाद वापस ले लिया गया, उसी कार्ड से अन्य रसिक को प्रवेश दिया गया।

सुबह के पहले कलाकार कमल कामले ने तानसेन द्वारा रचित मिसुरी से भी मीठे राग गूजरी तोड़ी वायोलिन बजाया। इस राग का सृजन राजा मानसिंह की प्रेयसी मृगनयनी ने किया था। उन्होंने विलंबित गत एक ताल और द्रुत तीन ताल में प्रस्तुत कर रसिकों का मन जीत लिया। ठुमरी याद पिया की आये की धुन निकाली तो वातावरण विरहमय हो गया। समापन राग परमेश्वरी में एक धुन निकालकर किया। तबला संगत सलीम अल्लाह वाले ने की। सभा की शुरुआत तानसेन संगीत महाविद्यालय के ध्रुपद गायन से हुई। राग देशी और ताल चौताल में निबद्ध बंदिश के बोल थे रघुवर की छवि सुंदर।

नटभैरव में बजी बांसुरी :

ग्वालियर के श्रीकांत कुलकर्णी ने राग नटभैरव में मनमोहक बांसुरी वादन कर रसिकों का मन मोह लिया। आलाप जोड़ के बाद झपताल में गत प्रस्तुत की। तबले पर संजय राठौर एवं बांसुरी पर श्रेष्ठ कुलकर्णी व अजय सोनी ने संगत की।

सांवरे से प्रीत लागी....

संजीव अभ्यंकर राग शुद्ध सारंग में तीन ताल में निबद्ध छोटा ख्याल सांवरे से प्रीत लागी का गायन किया उनके गायन में उनके गुरू मेवाती घराने के मूर्धन्य संगीत साधक पंडित जसराज की झलक दिखी। उन्होंने राग शुद्ध सारंग और एक ताल में निबद्ध बड़ा ख्याल सकल वन लाग रही से की। उन्होंने मधु भरी आवाज में मैं तो सांवरे के रंग रंची भजन सुनाकर इति की।

पर्सियन धुनों के माधुर्य में डूबे रसिक :

सांध्यकालीन सभा में ईरान से आए कला साधकों की तिकड़ी ने प्राचीन पर्सियन संगीत की धारा प्रवाहित की तो रसिक उसके माधुर्य में डूबते चले गए। ईरान के कलाकारों की इस त्रिगुलबन्दी में दारुश अलंजारी, हमजा बागी एवं मैशम्म अलीनागियान शामिल थे। इन्होंने किमांचे, सहतार व ढपली की त्रिगुलबंदी कर बेहतरीन प्रस्तुतियाँ दीं। ईरानी कलाकारों ने पर्सियन संगीत की कई पारंपरिक धुनें पेश कीं। मिठास से भरीं इन धुनों ने ओज भी प्रकट किया।

सोमवार की सांध्यकालीन सभा का शुभारंभ ध्रुपद केंद्र ग्वालियर के विद्यार्थियों के गायन से हुआ। अभिजीत सुखदाने के संयोजन में तैयार राग भीमपलासी और चौताल में निबद्ध बंदिश कुंजन में रच्यों रास को विद्यार्थियों ने बड़े ही सलीके और ध्रुपद गायकी के मूल अंगों का निर्वहन करते हुए गाया। इस प्रस्तुति में पखवाज पर संजय पंत आगले ने वेहद सधी हुई संगत की।

राग मारवा में बिखेरे ध्रुपद के रंग...

दरभंगा घराने के प्रशांत मलिक और निशांत मलिक राग मारवा में आलाप से शुरुआत की। मध्यलय और द्रुतलय की आलापचारी करते हुए गमक और मींड का काम अपने गायन बखूबी ढंग से दिखाया। चौताल में निबद्ध बंदिश बंशी नटवर बजाए को अपनी बुलंद आवाज में बड़े ही ओजपूर्ण अंदाज से गाया। पखवाज पर पंडित गौरव शंकर उपाध्याय ने संगत की। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में तार वाद्य विभाग के एचओडी डॉ सुनील पावगी ने राग जोग में आलाप जोड़ झाला से शुरू करके उन्होंने इस राग में दो गतें बजाईं। विलंबित गत झपताल में निबद्ध थी जबकि द्रुत गत तीन ताल में निबद्ध थी। समापन उन्होंने तीन ताल में एक रचना से किया। उनके वादन में सरोद सितार और शहनाई का अंग भी सुनने को मिलता है। तबले पर अंशुल प्रताप सिंह ने संगत की। समापन सितार और बांसुरी की जुगलबंदी से हुआ। सितार पर गणेश मोहन व बांसुरी पर रूपक कुलकर्णी ने राग सिंदुरा में आलाप जोड़ झाला से शुरू करके दो गतें बजाईं। मध्य लय की गत रूपक ताल में व द्रुत गत तीन ताल में निबद्ध थी। तबले पर हितेंद्र दीक्षित ने संगत की।

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