उमरिया : 1 एक माह में 3 तेंदुए और तीसरी बाघिन की मौत
1 एक माह में 3 तेंदुए और तीसरी बाघिन की मौतसांकेतिक चित्र

उमरिया : 1 एक माह में 3 तेंदुए और तीसरी बाघिन की मौत

उमरिया, मध्यप्रदेश : बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के जंगल में लगी भीषण आग की आंच अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि बाघों की सिलसिलेवार मौतों ने वन्यजीव प्रेमियों के दिलो को दहला कर रख दिया है।

उमरिया, मध्यप्रदेश। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के जंगल में लगी भीषण आग की आंच अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि बाघों की सिलसिलेवार मौतों ने वन्यजीव प्रेमियों के दिलो को दहला कर रख दिया है, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में लगातार हो रहे इन हादसों की एक वजह वनमंत्री विजय शाह का पार्क डायरेक्टर विंसेंट रहीम को दिया जा रहा खुला संरक्षण है।

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में आग लगने की घटना के तुरंत बाद 31 मार्च को एक बाघिन की संदिग्ध मौत का मामला प्रकाश में आया था। प्रारंभिक जांच में उसकी मौत का कोई पुख्ता कारण स्पष्ट नहीं किया जा सका था और नर बाघ द्वारा फीमेल को मारे जाने का हवाला प्रेसवार्ता में मंत्री द्वारा दिया गया, जो लोगों को कुछ हजम सा नहीं हुआ, सूत्रों की माने तो बाघिन के शरीर में आग से जलने के निशान देखे गए थे। जिसे पार्क प्रबंधन ने बड़ी चतुराई से छिपाया और एनटीसीए की गाइड लाइन के अनुसार उसे जला दिया गया। इसके बाद 8 अप्रैल को एक तेंदुए की मौत का मामला सामने आया। इस मामले की जांच पूरी हुई नहीं थी कि एक और तेंदुए की मौत ने हलचल मचा दी।

बीमार थी बाघिन :

12 अप्रैल को गोबरा ताल बीट में नाले के पास से एक नर बाघ मृत अवस्था में पाया गया, जिसका शव क्षत-विक्षत था, किंतु बाघ के मृत्यु का कारण भी अज्ञात बताया गया। सत्य तो यह है कि मौजूद लोगों ने यह बताया कि बाघ के शरीर पर जलने के निशान थे, लेकिन इंतेहा तो तब हो गई जब 14 अप्रैल को वनबेई बीट की 4 साल की बीमार बाघिन को प्रबंधन और डॉक्टर की मौजूदगी में नहीं बचाया जा सका। इस मौत ने पार्क प्रबंधन के लापरवाही की कलई खोलकर रख दी।

पानी में थी बाघिन :

वनबेई की बाघिन के बीमार होने की जानकारी पार्क प्रबंधन को लगभग 4 दिन पूर्व ही हो चुकी थी और जिस क्षेत्र में वह बाघिन मौत से जूझ रही थी, उक्त क्षेत्र को पर्यटक मार्ग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, स्थानीय व पर्यटक और गाइडों का कहना था बाघिन बीमार होने के बाद से लगातार पानी में थी, जिसकी सूचना पर्यटक व वन परिक्षेत्र अधिकारी द्वारा पार्क प्रबंधन के मुखिया को दी गई, किंतु पार्क प्रबंधन की मुखिया ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जब प्रबंधन के मुखिया और डॉक्टर द्वारा बाघिन के प्रति कदम उठाए गए और ट्रेंकुलाइज करके उसका इलाज शुरू किया गया, तब तक काफी देर हो चुकी थी।

बांधवगढ़ को ले ना डूबे :

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कैबिनेट मंत्री विजय शाह बांधवगढ़ के लगभग आधा दर्जन दौरे कर चुके हैं, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व उनकी सीधी निगरानी में है। यही वजह है कि वन्य जीव एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का सीधा सवाल है कि वन मंत्री के लगातार दौरों से पार्क प्रबंधन में क्या कोई बेहतरी आई? टाइगर रिजर्व की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात छोटे कर्मचारियों से लेकर आला अफसरों तक के रवैये और तौर-तरीकों में कोई बदलाव नहीं आया। दबी जुबान में हर तरफ एक ही बात है कि मंत्री जिस काम के लिए बार-बार बांधवगढ़ आते थे, वह काम उन्होंने बखूबी करा लिया। वन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता में कितना था, यह तो वन जीवों की मौत से अंदाजा लगाया जा सकता है।

हर बार प्रबंधन का बचाव :

मंत्री के लगातार दौरों और दिए गए बयानों से एक चीज तो सामने आईने की तरह स्पष्ट है कि निहित स्वार्थों के लिए उन्होंने पार्क प्रबंधन को खुला संरक्षण दिया। अन्यथा क्या वजह है कि बांधवगढ़ में सीमित अंतराल में घट रही एक के बाद एक बड़ी घटनाओं के लिए पार्क प्रबंधन की जिम्मेदारी - जवाबदेही तय करने, उनसे जवाब तलब करने, घटनाओं की उच्चस्तरीय जांच बैठाने की बजाय वे हर बार प्रबंधन का बचाव करते नजर आए, इसीलिए वन्यजीव एवं पर्यावरण प्रेमी यह कहने लगे हैं कि नेशनल पार्क के डायरेक्टर की वन मंत्री से यारी इस विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व को कहीं ले ना डूबे।

टी-9, टी-22 के साथ कई बाघ लापता :

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में विगत 1 वर्ष पहले पर्यटकों को काफी बाघों का दीदार हुआ करता था, जिसमें सबसे प्रसिद्ध टी-22 भीम नामक बाघ व टी- 9 मंगू नामक बाघ पर्यटक के लिए बहुत दर्शनीय लोकप्रिय था जो आगजनी घटना के बाद से नही देखे जा रहे हैं और साथ-साथ कई ऐसे बाघ हैं, जो अब नहीं देखे जा रहे हैं, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के मुखिया को कोई फिक्र नहीं है कि बांधवगढ़ में कितने वन्य प्राणी लापता है, कितने दिख रहे हैं जिसका कोई भी पुख्ता प्रमाण मुखिया के पास मौजूद नहीं है।

इनका कहना है :

चार दिन पूर्व इस बाघिन के बीमार होने की सूचना मिली थी, तब से उसका इलाज किया जा रहा था, लेकिन कल रात से जब उसने चलना-फिरना बन्द कर दिया तब उसे ट्रेंक्यूलाइज करके पिंजड़े में बंद करके ड्रिप देना शुरू किया गया, किंतु वह रिकवर नहीं कर सकी और उसकी मौत हो गई। इलाज एवं देखभाल में कोई लापरवाही नही हुई न जंगल में आग लगने का इस मौत से कोई संबंध नहीं है।

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