किन वजहों से सागर, इंदौर, जबलपुर की साख पर लगा बट्टा, नंबर वन रैंक से शर्म क्यों?
मध्य प्रदेश के यह शहर अव्वल रहने पर भी गर्व नहीं कर सकते।Neelesh Singh Thakur – RE

किन वजहों से सागर, इंदौर, जबलपुर की साख पर लगा बट्टा, नंबर वन रैंक से शर्म क्यों?

रैंक शर्मिंदगी का भी कारण बन जाती है। मध्य प्रदेश के शहरों के मामलों में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है कि यह शहर अव्वल रहने पर गर्व नहीं कर सकते।

हाइलाइट्स

  • एमपी में करप्शन का रिकॉर्ड

  • घूसखोरी में इंदौर दूसरे नंबर पर

  • सागर में सबसे अधिक रिश्वतखोर

  • जबलपुर में सबसे अधिक मांगी घूस

राज एक्सप्रेस (Raj Express)। आम तौर पर अच्छा काम करने के लिए नंबर वन रहने वालों को शाबाशी दी जाती है, लेकिन बात गलत कामों की हो तो फिर यह रैंक शर्मिंदगी का भी कारण बन जाती है। मध्य प्रदेश के शहरों के मामलों में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है कि यह शहर अव्वल रहने पर गर्व नहीं कर सकते।

वजह रिश्वतखोरी -

मध्य प्रदेश (एमपी/MP) के सरकारी कामकाज में जायज काम के लिए भी रिश्वत अब परंपरा बनती जा रही है। लोकायुक्त ने पिछले 3 दिनों में 10 से ज्यादा भ्रष्ट अफसरों को रिश्वतखोरी के आरोप में पकड़ा है। यह तो मात्र बानगी है, बीते सालों के रिकॉर्ड्स पर गौर फरमाएंगे तो पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। जानिये मध्य प्रदेश में रिश्वतखोरी का रिकॉर्ड।

बीते सात सालों में –

मध्य प्रदेश में पिछले सात सालों में 1658 अधिकारी/कर्मचारी रंगे हाथों रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किये गये हैं। पिछले 20 महीनों में भोपाल में 30 रिश्वतखोर अधिकारी/कर्मचारी जांच की जद में आए हैं।

ये विभाग सबसे भ्रष्ट –

आम जनता के हितों से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े विभाग रिश्वतखोरी की फेहरिस्त में टॉप पर हैं। मामलों पर गौर करें तो रिश्वतखोरी के मामले में राजस्व विभाग, नगर निगम, पुलिस के अलावा अति संवेदनशील कहे जाने वाले स्वास्थ्य विभाग का नाम भी काली सूची में शामिल है।

इसमें सबसे ज्यादा राजस्व विभाग से जुड़े 6 मामले, नगर निगम से जुड़े 5, पुलिस से जुड़े 2, स्वास्थ्य विभाग से जुड़े 3 मामलों में अधिकारी/कर्मचारियों को पकड़ा गया। फाइनेंस, फॉरेस्ट, शिक्षा, होमगार्ड, आरटीओ, एमपीएसईबी, श्रम विभाग, पीडब्ल्यूडी में क्रमशः एक-एक केस रिश्वतखोरी के उजागर हुए हैं।

यह वर्ग बदनाम –

रिश्वतखोरी के जो मामले उजागर हुए हैं उनमें पटवारी, क्लर्क, डॉक्टर, डायरेक्टर, डीएसपी, इंजीनियर, नायब तहसीलदार, रेंजर, सीईओ, एसडीओ, रेवेन्यू इंस्पेक्टर वर्ग के अधिकारी शामिल हैं। राजस्व और पंचायत से जुड़े मामलों में रिश्वतखोरी चरम पर है।

रिश्वतखोरी के मामले –

हालांकि शासकीय रिकॉर्ड्स के मान से रिश्वतखोरी के मामलों में कमी आती नजर आती है। क्योंकि साल 2015 में रिश्वतखोरी के कुल 411 मामले सामने आए थे। साल 2016 में इनकी संख्या 310 थी।

इसी तरह अगले साल 2017 में इनमें कमी देखी गई, इस वर्ष केस 254 थे। इसी तरह साल 2018 में कुल 208 प्रकरण, साल 2019 में 244 जबकि 2020 में ऐसे मामलों की संख्या 118 थी।

साल 2021 में अब तक रिश्वतखोरी के 113 केस सामने आए हैं। यहां यह गौर करना जरूरी है कि 2019 के बाद से लागू लॉकडाउन के कारण शासकीय कामकाज लगभग बंद था इस कारण भी रिश्वतखोरी पर लगाम कसी रही।

अब शासकीय कामकाज जब गति पकड़ रहा है तो रिश्वतखोरी भी उफान मार रही है इसका प्रमाण मध्य प्रदेश में बीते 3 दिनों के दौरान लोकायुक्त पुलिस द्वारा प्रदेश के 10 शहरों में की गई कार्रवाई है।

शहरों का रिकॉर्ड –

करप्शन के मामले में शहरों की सूची में कुल 40 रिश्वतखोरी के प्रकरणों के साथ सागर फेहरिस्त में टॉप पर है। कुल 38 केसों के साथ इंदौर दूसरे जबकि 36 मामलों के कारण जबलपुर तीसरे नंबर पर है। भोपाल, ग्वालियर और उज्जैन में रिश्वतखोरी के क्रमशः 30-30 मामले सामने आए हैं। रीवा में कुल 27 मामले मिले।

सबसे अधिक धन –

रिश्वतखोरी के मामले में हुई कार्रवाई में आरोपियों से सबसे अधिक 8.25 लाख रुपये जबलपुर में जब्त हुए। सागर में कुल 6.89 लाख जबकि इंदौर में 6.35 लाख रुपये जब्त हुए।

भोपाल गढ़ –

भोपाल लोकायुक्त पुलिस दल ने बीते पांच सालों के दौरान 180 शासकीय आरोपियों को रिश्वत लेते समय गिरफ्तार किया। इस कार्रवाई में आरोपियों से डेढ़ करोड़ रुपयों की राशि जब्त हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान एक दर्जन अफसरों के ठिकानों पर छापामार कार्रवाई में 15 करोड़ रुपयों से अधिक की राशि जब्त की गई।

करप्शन का अथाह सागर –

लोकायुक्त पुलिस ने पिछले 20 महीने के दौरान रिश्वतखोरी के कुल 232 मामले पकड़े हैं। इन मामलों में 38 लाख रुपयों की घूसखोरी उजागर हुई। आंकड़ों के मान से सबसे अधिक 40 रिश्वतखोर सागर में पकड़े गए।

जिले के देवरी विकासखंड के गौरझामर परिक्षेत्र के चरगवां गांव में आदिवासियों ने डिप्टी रेंजर पर पट्टा बनाने के लिए घूस मांगने के आरोप लगाए हैं। भुक्तभोगी आदिवासियों का आरोप है कि 19 परिवारों की झोपड़ियों को वन विभाग के अमले ने जला दिया।

काले कारनामों की इस बड़ी फेहरिस्त में सबसे ज्यादा मामले सागर जिले में सामने आए। बीते सात सालों के दौरान भारत के ह्रदय प्रदेश एमपी में रिश्वत लेने के मामले में 1658 अधिकारी/कर्मचारी पकड़े गए हैं।

इतने में सौदा ईमान का –

आरोपी अधिकारियों/कर्मचारियों पर 500 रुपयों से लेकर तीन लाख रुपयों की रिश्वत मांगने का आरोप लगा है। किसी आरोपी पर 50 रुपये के शासकीय कार्य के लिए 500 रुपया मांगने का आरोप है तो किसी ने 10 फीसद कमीशन के हिसाब से 3 लाख रुपयों की घूस मांगी थी।

बड़े पदाधिकारी शामिल -

हाल ही में भोपाल एम्स के डिप्टी डायरेक्टर को सीबीआई ने पकड़ा और दफ्तर सील कर दिया। सीबीआई का आरोप है कि आरोपी डिप्टी डायरेक्टर घूस के रूप में एक लाख रुपये ले रहा था।

शिकायत के अनुसार आरोपी वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी ने फार्मासिस्ट से शासकीय कार्य के लिए दो लाख रुपयों की डिमांड की थी। एक लाख रुपये लेते समय आरोपी अधिकारी को सीबीआई ने पकड़ लिया।

जानकारी के मुताबिक आरोपी अधिकारी ने 40 लाख रुपये से संबंधित विभागीय बिल आगे बढ़ाने के लिए फार्मासिस्ट से 2 लाख रुपये मांगे थे।

मामले में सीबीआई ने एम्स भोपाल के डिप्टी डायरेक्टर (प्रशासनिक) धीरेंद्र प्रताप सिंह को आरोपी बनाया है। आरोपी अधिकारी सिंह ने 40 लाख रुपए का बिल स्वीकृत करने के एवज में फार्मासिस्ट से 2 लाख रुपए मांगे थे लेकिन बाद में बात एक लाख रुपये में तय हो गई थी। शनिवार को टीम ने उसे रंगे हाथ दबोच कर ऑफिस सील कर दिया।

इतना बरामद –

जांच टीम ने डिप्टी डायरेक्टर (प्रशासनिक) धीरेंद्र प्रताप सिंह के आवास से 7 लाख रुपए नकद के साथ 80 लाख रुपये के म्यूच्युअल फंड निवेश संबंधी दस्तावेज बरामद किए हैं। जानकारी के मुताबिक आरोपी अधिकारी धीरेन्द्र के पिता पूर्व में पुलिस विभाग में पदस्थ रहे हैं।

फार्मासिस्ट ने सीबीआई से शिकायत में बताया था कि 40 लाख रुपए का बिल पास करने डिप्टी डायरेक्टर धीरेन्द्र प्रताप सिंह 5% कमीशन मांग रहे हैं। सीबीआई जांच में शिकायत सही पाई गई। शनिवार को सीबीआई ने धीरेंद्र प्रताप सिंह को रंगे हाथ गिरफ्तार किया।

पीके पाण्डेय, एसपी, सीबीआई (जैसा मीडिया को बताया)

बिल पेमेंट के मामले! –

सीबीआई टीम आरोपी को रंगे हाथ पकड़ने के बाद एम्स पहुंची। यहां जांच टीम ने दफ्तर के दस्तावेजों की बारीकी से छानबीन की। जांच एजेंसी ने जो दस्तावेज जांच के दायरे में लिये हैं इनमें अधिकतर दस्तावेज बिल पेमेंट संबंधी हैं।

डेपुटेशन पर तैनाती -

विभागीय सूत्रों के मुताबिक आरोपी धीरेंद्र प्रताप सिंह की मूल पदस्थापना इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी ग्वालियर में थी। इसके साथ ही वह पूर्व में IIFM भोपाल में भी पदस्थ रह चुके हैं। बताया गया है कि अब रिश्वतखोरी की जांच की जद में घिरे आरोपी अधिकारी को डेपुटेशन में एम्स में पदस्थ किया गया था। इस मामले में सीबीआई को आय से अधिक संपत्ति की आशंका है।

NCRB की सूची –

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने भारत के उन राज्यों की सूची तैयार की है जिन राज्यों में सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। इस लिस्ट में मध्य प्रदेश को दूसरे नंबर पर रखा गया।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सर्वाधिक भ्रष्ट्राचार महाराष्ट्र राज्य में है जबकि इसके बाद मध्य प्रदेश की बारी आती है। रिपोर्ट में भारत के प्रदेशों में तेजी से बढ़ती मुनाफाखोरी और रिश्वतखोरी के चलन के आधार पर राज्यों की रैंकिंग की गई है।

काले कारनामों के इतने मामले -

NCRB ने भारत के राज्यों के काले कारनामों का जो कच्चा चिट्ठा तैयार किया है उसमें कुल जमा 1279 मामलों के साथ महाराष्ट्र टॉप पर है। इसके लगभग आधे 634 केस के साथ मप्र दूसरे नंबर पर है।

मध्य प्रदेश में करप्शन की बानगी –

NCRB ने रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि एमपी में हर विभाग का छोटे से लेकर बड़ा कर्मचारी/अधिकारी रिश्वत के खेल का हिस्सा है। रिपोर्ट के मुताबिक एमपी में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र से लेकर थाने में एफआईआर दर्ज कराने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है।

राष्ट्रीय रिकॉर्ड -

NCRB की रिपोर्ट के मान से वर्ष 2015 के 634 मामलों और 2014 के लंबित कुल 465 मामलों को मिलाकर कुल 1099 मामलों में से 439 मामलों में ही पुलिस कोर्ट में चार्जशीट पेश कर सकी।

रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 के अंत तक कुल 340 मामले लंबित थे। ध्यान दें इसमें भ्रष्टाचार से जुड़े 26 मामलों में 44 करोड़ 24 लाख रुपये जब्त हुए थे। जब्त राशि के राष्ट्रीय रिकॉर्ड के मुकाबले यह जब्त राशि देश में जब्त की गई सबसे ज्यादा राशि थी।

MP में मामलों की भरमार -

मात्र भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि इन मामलों के निपटारे और निदान के मामलों में भी मध्य प्रदेश फिसड्डी है। एमपी में अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई होने में सालों का वक्त लगते देखा गया है। ऐसे में कई लोग अपनी शिकायत ही वापिस ले लेते हैं।

भ्रष्टाचार के लंबित मामले -

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार से जुड़े लंबित मामलों की संख्या 320 है। खास बात यह है कि भ्रष्टाचार के मामले में पिछले साल किसी भी आरोपी के खिलाफ मामले की जांच पूर्ण हो पाई हो, ऐसा मामला सामने नहीं आया।

डिस्क्लेमर आर्टिकल प्रचलित रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसमें शीर्षक-उप शीर्षक और संबंधित अतिरिक्त प्रचलित जानकारी जोड़ी गई हैं। इस आर्टिकल में प्रकाशित तथ्यों की जिम्मेदारी राज एक्सप्रेस की नहीं होगी।

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