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2016-17 की SEQI रिपोर्ट में मध्यप्रदेश 15 वें स्थान पर है।
2016-17 की SEQI रिपोर्ट में मध्यप्रदेश 15 वें स्थान पर है।|Social Media
मध्य प्रदेश

स्कूली शिक्षा गुणवत्ता में आखिर क्यों पिछड़ा है मध्यप्रदेश?

नीति आयोग की पिछली SEQI रिपोर्ट में मध्यप्रदेश 14वें स्थान पर था, आखिरी रिपोर्ट में ये एक पायदान नीचे गिर गया। 7 करोड़ से अधिक स्कूली शिक्षा का बजट आखिर क्यों नहीं पूरी कर पा रहा ज़रूरतें?

रवीना शशि मिंज

राज एक्सप्रेस। नीति आयोग ने 30 सितंबर को विद्यालयीन शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक 2016-17 {School Education Quality Index (SEQI), 2016-17} जारी किया। जिसमें सभी राज्यों के साल 2016-17 के विद्यालय शिक्षा गुणवत्ता को मांपा गया और उसी के आधार पर सूची तैयार की गई। सूची देखकर आप बेशक समझ ही जायेंगे कि आपके राज्य की शिक्षा व्यवस्था कितने दूध और कितने पानी में है।

वैसे, केरल राज्य बधाई का पात्र है, क्योंकि नीति आयोग के इंडेक्स में वो शीर्ष पर है, जिसका मतलब है कि केरल राज्य विद्यालय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के हर मानकों में खरा उतरा है। इस सूची में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला प्रदर्शन मध्यप्रदेश का है। मध्यप्रदेश गुणवत्ता शिक्षा के सूचकांक में पिछले साल 14वें पायदान पर था, जो इस बार एक पायदान पीछे सरक कर 15वें पर पहुँच गया है।

मध्यप्रदेश के इस निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे के कारणों को जानने के लिए हमने पुराने रिकॉर्ड्स खंगाले।

शिक्षा गुणवत्ता की जांच के लिए कई गाइडलाइन्स होती हैं, जैसे – पढ़ाने की तकनीक, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रक्रिया, विद्यालय की आधारभूत संरचना, पढ़ाने के लिए आसपास का माहौल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, शिक्षकों की उपस्थिति आदि।

उपर्युक्त गाइडलाइन्स के मद्देनज़र हमने राज्य के शिक्षा क्षेत्र में हो रहे कामों, कैग की सर्वे रिपोर्ट्स को पढ़कर इस क्षेत्र की स्थिति समझने की कोशिश की। कैग ने दिसम्बर 2017 में एक रिपोर्ट जारी की थी, इसके बाद उन्होंने कोई रिपोर्ट जारी नहीं की। यह रिपोर्ट 2010 से 2016 तक का विश्लेषण है। यह रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में विद्यालयीन शिक्षा के स्तर पर तात्कालिक राज्य सरकार से कहाँ चूक हुई।

1. शिक्षा का अधिकारी (Right To Education) का सही ढंग से लागू नहीं होना-

कैग(CAG) की यह रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में 2010 से 31 मार्च 2016 तक शिक्षा का अधिकार कानून सही ढंग से लागू नहीं हुआ। इस कानून के तहत प्रत्येक रिहायशी इलाके में शाला होनी चाहिए लेकिन प्रदेश में हालत ठीक इसके विपरीत थे। साल 2015–2016 में प्रदेश के 95,198 रिहायशी इलाकों में केवल 82,872 प्राथमिक शालाएं ही थीं, जबकि शेष इलाकों के बच्चे इस सेवा से वंचित रह गए।

वहीं शिक्षकों के संदर्भ में बात करें तो शिक्षा का अधिकार कानून शिक्षकों की संख्या और योग्यता पर भी विशेष ध्यान देता है। यह कानून सिंगल टीचर विद्यालय और अप्रशिक्षित टीचर के सख्त खिलाफ है। लेकिन 2010-2016 के सर्वे में पाया गया कि प्रदेश में कुल 18,213 सिंगल टीचर विद्यालय में थे। मतलब एक पूरा विद्यालय एक ही टीचर के भरोसे चल रहा था।

साल 2013 में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके अनुसार मध्यप्रदेश में 52% शिक्षकों के पास पढ़ाने की ट्रेनिंग ही नहीं थी।

यहां एक बात और गौर करने वाली है कि शिक्षा का अधिकार योजना के लिए सरकार के पास अलग से कोई बजट ही नहीं था। सरकार हर साल सर्व शिक्षा अभियान में मिलने वाले फंड से ही खर्चा कर रही थी।

शिक्षा का अधिकार (आर्टिकल 21A) कानून 6 से 14 साल तक के बच्चों को अनिवार्य रूप से नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान देता है। यहाँ तक कि सभी मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों और जाति पर आधारित 25% आरक्षण का प्रावधान भी इस कानून में है। संविधान में 2009 में इस कानून को जोड़ा गया था और 2010 में सभी राज्यों में अनिवार्य रूप से लागू हो गया था।

2. मूलभूत सुविधाओं और विद्यालयों की आधारभूत संरचना में खामी

दूसरा अहम पहलू है मूलभूत सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर। कैग ने प्रदेश के 390 स्कूलों का सर्वे किया। यह सर्वे विद्यालय के इंफ्रास्ट्रक्चर और छात्रों की सुविधाओं को केंद्र में रखकर किया गया था। इस सर्वे में भी चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। जो इस प्रकार है:-

  1. सर्वे किए गए 390 स्कूलों में 78 ऐसे विद्यालय पाए गए जहाँ लड़के और लड़कियाँ के लिए अलग शौचालय नहीं थे। दोनों एक ही शौचालय इस्तेमाल करने के लिए मजबूर थे। और अन्य 37 शौचालयों की हालत बद् से बद्त्तर पाई गई थी। जबकि 332 स्कूलों में विकलांग बच्चों के अनुकूल शौचालय का निर्माण नहीं किया गया था।

  2. 37 स्कूलों में बच्चों के लिए शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं था।

  3. 105 स्कूलों के परिसर में बच्चों के लिए खेल के मैदान नहीं थे।

  4. 133 स्कूलों में पुस्तकालय की सुविधा नहीं पाई गई।

  5. 295 स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए मेज-कुर्सी या टेबल की सुविधा नहीं थी। बच्चे टाट-पट्टी पर बैठने को मजबूर थे।

3. शिक्षकों के हज़ारों पद खाली फिर भी नहीं हुई भर्तियां

साल 2018 के अगस्त महीने में राज्य सरकार ने शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए एक नोटिफिकेशन जारी किया था। जिसमें कहा गया कि सरकारी स्कूलों में 40 हज़ार शिक्षकों की भर्ती होगी। इसके अतिरिक्त 5 हज़ार व्यापम शिक्षकों की भर्ती की जाएगी।

वहीं शिक्षकों के रिक्त पदों के इतिहास में जाया जाए तो प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में साल 2011 में 75 हज़ार पद खाली थे। उस समय की तात्कालिक सरकार ने 2013 में 16 हज़ार शिक्षकों की भर्ती की। जिसके बाद सरकार ने साल 2018 के शुरूआती महीनों तक (लगभग 5 साल) शेष पदों पर भर्ती नहीं की। सरकार हर साल प्रस्ताव लेकर आई लेकिन किसी न किसी कारणवश ये प्रस्ताव रद्द होते गए।

4. नि:शुल्क पुस्तकों के वितरण में देरी-

सर्व शिक्षा अभियान के मैनुअल के अनुसार, कक्षा पहली से आठवीं के सभी छात्रों को नि:शुल्क किताबें मुहैया कराई जानी हैं। राज्य सरकार का रवैया यहां भी लचीला दिखाई दिया, या तो बच्चों तक नि: शुल्क किताबें पहुँच ही नहीं पाईं, या पहुंचीं तो देर से।

राज्य शिक्षा केन्द्र(RAK) के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि 2010-2016 के सत्र में सभी जिलों से तकरीबन 26.49 करोड़ मुफ्त किताबें बांटने की सराकर से मांग की गई, लेकिन सरकार 42.88 लाख किताबें ही मुहैया करा पाई। शेष जिले के स्कूलों ने दोबारा किताबों की मांग की जिसके बाद उन बच्चों तक सुविधा पहुँचाई गई, वो सभी समय से लेट। जो भले ही प्रत्यक्ष नहीं पर अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा की गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव डालता है।

5. कंप्यूटर एडेड लर्निंग

कंप्यूटर एडेड लर्निंग वो तकनीक है जहाँ छात्रों को कंप्यूटर के माध्यम से पढ़ाया जाता है। राज्य ने मार्च 2015 में 222वीं पीएबी की बैठक में एक मसौदा तैयार किया, जिसके तहत उच्च प्राथमिक शिक्षा में छात्रों को कम्यूटर तकनीक की मदद से विज्ञान और गणित विषयों को पढ़ाया जाना था। पीएबी ने सरकार के मसौदे पर हामी भरते हुए, 3,153 स्कूलों को तैयार करने और 644 शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के लिए कहा। साथ ही 22.14 करोड़ रूपए भी जारी किए।

कैग द्वारा की गई जांच में ये सामने आया कि, फंड की अनुपलब्धता की वजह से ये संभव नहीं हो पाया। विभाग से जब 2016 में इस योजना में हुई देरी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सीधे जवाब देने की बजाय ये बताया कि सारे विषयों का डिजिटलीकरण कर अपलोड कर दिया जाएगा।

6. विद्यालय ड्रॉप आउट और विद्यालय में नामांकन नहीं लेना भारी चिंता का विषय

प्रदेश में दिनों दिन विद्यालय शिक्षा को बीच में छोड़ देने या विद्यालय ड्रॉप आउट दर बढ़ती जा रही है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2011 से 2016 में कुल 42.86 विद्यार्थियों ने प्राथमिक शिक्षा बीच में ही छोड़ दी। इन 42.86 लाख बच्चों में 28.81 लाख सरकारी विद्यालयों के हैं वहीं शेष निजी विद्यालयों से।

विद्यालयों में प्राथमिक शिक्षा के लिए नामांकन करने वाले छात्रों की संख्या में कटौती हुई है। साल 2010-11 में पहली से आठवीं तक 154.24 लाख बच्चों ने दाखिला लिया था वहीं साल 2014-15 में केवल 127.80 लाख बच्चों ने दाखिला लिया। इन पांच वर्षों में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में नामंकन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 17% घटी है।

7. हर साल विद्यालयीन शिक्षा पर तय किया गया बजट

सरकार की विद्यालयीन शिक्षा नीति और कार्य प्रणाली में कमियां और खामियां तो आपको बता दी, अब चलिए आपको बता हैं कि सरकार ने हर साल इस सेक्टर के लिए कितना बजट तय किया-

नीति आयोग का एजुकेशन क्वॉलिटी इंडेक्स 2016 -17 के पर्फोरमेंस का आंकलन है तो हम भी इसी सत्र का बजट आपको बता रहें है। 2015-2016 में तात्कालिक बीजेपी सरकार ने केवल स्कूली शिक्षा के लिए 7,21,07,305 रू का बजट तय किया था। जिसके बाद 2016-17 में 7,74,98,928 का बजट था।

नीति आयोग द्वारा जारी विद्यालयीन शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक 2016-17 की रिपोर्ट-

मध्यप्रदेश में बीते 15 साल से भाजपा की सरकार रही है। यह इंडेक्स साल 2015 से 2017 तक के रिकॉर्ड्स के हिसाब से तैयार किया गया है। यह एक बड़ा सवाल है कि सरकार ने क्यों शिक्षा व्यवस्था और गुणवत्ता में आई कमी पर ध्यान नहीं दिया? यहां एक सवाल ये भी है कि क्या तात्कालिक सरकार को अपना तय किया गया बजट कम पड़ गया?

प्रदेश में 2018 में उपचुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस ने भारी मतों के साथ सत्ता में वापसी की। हमने इस सरकार के स्कूली शिक्षा बजट पर नज़र दौड़ाई। कांग्रेस ने 2019-2020 सत्र के लिए स्कूली शिक्षा बजट 15,34,96,096 तय किया है। सरकार के पास भारी भरकम बजट है। अब ये देखना होगा की राज्य सरकार इस बजट को किस तरीके से उपयोग करती है।