Raj Express
www.rajexpress.co
साल 2017-18 में जंगली जानवरों के हमले से 42 लोगों की मौत हो गई।
साल 2017-18 में जंगली जानवरों के हमले से 42 लोगों की मौत हो गई। |National Geographic
मध्य प्रदेश

देश का ‘सबसे बड़ा वनक्षेत्र’ लहूलुहान क्यों है?

भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, इस राज्य का 30.72% हिस्सा वनक्षेत्र (94,689.38 वर्ग किमी) है। यहां वन्य अपराधों और जंगली जानवरों का हमला दोनों ही बढ़े हैं। इसके पीछे क्या कारण छिपे हुए हैं?

प्रज्ञा

प्रज्ञा

राज एक्सप्रेस। 29 जुलाई 2019 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साल 2018 की टाईगर एस्टिमेशन रिपोर्ट जारी की। इसके मुताबिक सर्वाधिक बाघों की संख्या मध्यप्रदेश में है। मध्यप्रदेश में साल 2014 से 2018 के बीच 218 बाघों की बढ़ोत्तरी हुई और फिलहाल राज्य में 526 बाघ हैं। एक तरफ जहां बाघों की संख्या में इजाफा हुआ है तो वहीं वन क्षेत्र में कमी आई है। साथ ही जानवरों और इन्सानों के बीच का टकराव भी बढ़ा है।

साल 2017-18 में जंगली जानवरों के हमले से 42 लोगों की मौत हो गई। वहीं 1025 लोग घायल हुए तो 6488 मवेशियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। वन विभाग की अनेक योजनाओं और नियमों के बावजूद जंगली जानवरों के लोगों और मवेशियों पर हमले की खबरें हमें समाचारों के माध्यम से मिलती रहती हैं। कई जानवर लोगों की फसलों को भी बर्बाद कर देते हैं। वन विभाग के अधिकारियों से बात कर हमने जानना चाहा कि इन बढ़ते टकरावों के पीछे क्या प्रमुख कारण है।

मध्यप्रदेश सरकार में उप वन संरक्षक (वन्य प्राणी) रजनीश कुमार सिंह के मुताबिक,

जानवरों के हमले के पीछे ये मुख्य कारण हैं-

  1. जनसंख्या में बढ़ोत्तरी
  2. ज़मीन का इस्तेमाल बढ़ा है- लोगों को इस्तेमाल के लिए ज़मीन चाहिए, घर बनाने के लिए और बाकी तमाम चीज़ों के लिए।
  3. परती ज़मीन का खत्म होना
  4. आधारभूत संरचना का विकास (infrastructural construction)-

“हम अगर आज से 50 साल पहले की बात करें तो जंगल की ज़मीन ज़्यादा थी पहली चीज़। ऐसा होता था कि जंगल की ज़मीन होती थी और रिहायशी या खेती की ज़मीन होती थी। इनके बीच में काफी ज़मीन खाली रहती थी उसे परती ज़मीन कहा जाता था। इस जगह में लोग अपने मवेशियों को चरने के लिए छोड़ देते थे। हर गांव में ऐसी ज़मीन होती थी जहां लोग खेती नहीं करते थे। ये ज़मीन गांव और जंगल के बीच में खाली रहती थी।”

रजनीश कुमार सिंह, उप वन संरक्षक (वन्य प्राणी)

आजकल तकनीक बढ़ने से ये हुआ है कि बंजर ज़मीन पर भी खेती होने लगी है। पहले जो ज़मीन खाली रहती थी अब उस का इस्तेमाल होने लगा है। जो परती ज़मीन थी वो खत्म होती चली गई। इससे जंगल और गांवों के बीच में दूरी खत्म हो गई। जैसे ही जंगल खत्म होता है तो कोई गांव वहां शुरू हो जाता है।

जंगल के कई जानवर बाहर की तरफ शिकार के लिए आते हैं, पहले यहां परती ज़मीन होने से लोगों पर हमले नहीं होते थे लेकिन इसके खत्म होने से जानवर सीधे गांव तक आने लगे हैं।

“जो कहा जाता है कि जंगलों पर अतिक्रमण हो रहा है या जानवरों के हमले बढ़ रहे हैं वो असल में ऐसा नहीं है कि जंगल की ज़मीन कम हो रही है, अगर आप उसके आंकड़े देखेंगे तो उनमें थोड़ा बहुत बदलाव हुआ है लेकिन गांव और जंगल के बीच की परती ज़मीन खत्म होने के कारण इनमें वृद्धि हुई है। नील गाय या बैल, भेड़िया, लोमड़ी, जंगली सुअर ये जानवर परती ज़मीन और जंगल के बाहरी इलाकों के जानवर थे। इनका रहने का स्थान खत्म होने से ये गांवों में आने लगे हैं।”

रजनीश कुमार सिंह, उप वन संरक्षक (वन्य प्राणी)

जंगली जानवरों के हमलों में सैकड़ों लोगों को गंवानी पड़ी है जान।
जंगली जानवरों के हमलों में सैकड़ों लोगों को गंवानी पड़ी है जान।
Syed Dabeer Hussain - RE

हमलों को रोकने के लिए सरकार उठा रही है ये कदम-

  1. हर उद्यान की एक क्षमता है, यानि कि वहां कितने जानवर रहते हैं या रहेंगे इसकी एक सीमा तय होती है। सरकार अगर जानवरों को स्थानांतरित करती है तो वो सेंचुरी या उद्यानों का क्षेत्रफल बढ़ाती है।

  2. जंगल की ज़मीन के छोरों पर बसे गांवों को सरकार विस्थापन करने के लिए प्रेरित करती है। इससे जंगलों की ज़मीन में इजाफा होता है, साथ ही जानवरों की पहुंच से गांव दूर होते हैं।- इसके लिए परिवार की हर पीढ़ी को दस लाख रूपए दिए जाते हैं। एक परिवार को औसतन 27 से 30 लाख रूपए तक मिलते हैं।- पिछले पांच सालों में सरकार ने सतपुड़ा में बसे लगभग 49 गांवों में से 45 गांवों को विस्थापित किया है।

  3. जंगल के बाहर पत्थर की दीवार आदि भी बनाने का काम सरकार कर रही है।

  4. मध्यप्रदेश सरकार पहली सरकार है जिसने जानवरों के हमले को सर्विस गॉरंटी के भीतर लाया। इससे ये हुआ कि अगर जानवर के हमले से किसी व्यक्ति की मौत होती है तो उसके परिवार को 24 घंटे के अंदर चार लाख रूपए दिए जाते हैं।

    - अगर किसी को चोट लगती है तो दो लाख रूपए तक देने का प्रावधान है। उस व्यक्ति का इलाज तुरन्त शुरू होता है। साथ ही एक महीने के अंदर इस केस की कार्रवाई पूरी हो जाती है।

    - अगर किसी मवेशी की मौत होती है तो 50,000 रूपए तक मुआवजा देने का प्रवाधान है। मवेशी की जांच भी गांव के वेटनरी डॉक्टर ही करते हैं।

भारतीय वन सेवा, भोपाल में अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक के रूप में कार्यरत आलोक कुमार कहते हैं कि राज्य में मुख्य रूप से वन क्षेत्र के बाहर नील गाय और काले हिरण काफी संख्या में पाए जाते हैं। ये फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। साथ ही अभ्यारणों के पास बसे गांवों में जंगली जानवर हरे चारे की लालच में आकर भी ऐसा करते हैं। फसल नुकसानी की समस्या तो है। ये समस्या पिछले कुछ सालों में बढ़ी है।

वे आगे बताते हैं कि सरकार फसल नुकसानी के मामले में मुआवजा देती है। कोई भी अगर जंगली जानवर फसल नुकसान करता है तो आवेदक को लोक सेवा केन्द्र में आवेदन जमा कराना होता है या फिर तहसीलदार को देना होता है। तहसीलदार मौके पर जाकर उसकी जांच करता है और जो भी नुकसानी होती है, क्षतिपूर्ति के प्रावधान के तहत उसका मुआवजा दिया जाता है। ये मुआवजा राजस्व विभाग के अंतर्गत दिया जाता है, इसमें 20-25% से अधिक नुकसान होने पर ही मुआवजा देने का प्रावधान है।

मुआवजे में सबसे बड़ी समस्या यही है, राजस्व विभाग का मुआवजा देने का पैमाना प्राकृतिक आपदा वाला है। वो किसी भी चीज़ को आपदा तब मानते हैं जब कम से कम 25% या उससे ज़्यादा नुकसान हो। जब कोई जानवर फसल नुकसानी करता है तो वो तय पैमाने पर तो नहीं करता।

इसे ऐसे समझिए कि अगर किसी जानवर ने एक खेत के 10% हिस्से की फसल को नुकसान पहुंचाया, इस हालत में राजस्व विभाग किसान को मुआवजा नहीं देगा। इस हिस्से पर किसान दोबारा फसल लगाता है और फिर से जानवर उसके खेत की 15 या 20% फसल को नुकसान पहुंचाता है तो इस बार भी उसे मुआवजा नहीं मिलेगा। ऐसे में किसान की फसल तो 25% से अधिक ही खराब हो गई लेकिन एक बार में नहीं होने की वजह से उसे मुआवजा नहीं दिया जाता।

सरकार को किसानों के प्रति और अधिक संवेदनात्मक नज़रिया इख्तियार करते हुए फसल हानि को प्राकृतिक आपदा से बाहर करना चाहिए। इसके साथ ही फसल नुकसानी के लिए नई नीतियों का निर्माण भी होना चाहिए।

“वन विभाग जानवरों के लिए जंगल में चारे और पानी की व्यवस्था करता है ताकि जानवर बाहर कम निकलें और लोगों और फसलों को नुकसान न पहुंचाएं। जंगल में फैंसिंग और पत्थर की दीवार भी बनाई जाती हैं। जंगलों में जानवरों के रहने की जगहों या प्राकृतिक वातावरण का कम होना (Habitat Loss) भी हमलों के पीछे की मुख्य वजह है। जैसे जंगलों के बीच में या आस-पास, एक से दूसरे जंगल जाने के रास्ते के बीच कोई खेती आ गई, पट्टा या वनअधिकार आ गया तो उसका भी असर पड़ता है।”

आलोक कुमार, अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (भारतीय वन सेवा, भोपाल )

वन अपराध-

वन अपराधों की श्रेणी में ये सभी अपराध आते हैं-

  1. अवैध कटाई
  2. अवैध चराई
  3. अवैध परिवहन
  4. अतिक्रमण
  5. अवैध उत्खनन

इन अपराधों में साल 2011 से 2018 के बीच काफी कमी आई है। साल 2011 में कुल 66,514 वन्य अपराध हुए। वहीं 2018 में वन्य अपराधों की संख्या घटकर 50,123 हो गई। साल 2019 में अगस्त तक 28,770 वन अपराध रजिस्टर हुए।

वन अपराधों की संख्या
वन अपराधों की संख्या
वन्य प्राणी विभाग, मध्यप्रदेश सरकार

पेंच राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र निदेशक विक्रम सिंह परिहार बताते हैं, "हमारे टाईगर रिज़र्व में कई जगह पत्थरों की दीवार है ताकि जो शाकाहारी वन्य प्राणी हैं वो गांव में न पहुंचें। कई बार दीवार गिर जाती है, कई बार दीवार को फांद कर जानवर निकल जाते हैं, हर जगह दीवार हो भी नहीं सकती तो कई बार जानवर गांवों में चारे के लिए चले जाते हैं। इससे फसल नुकसानी होती है जिसका मुआवजा राजस्व विभाग के अंतर्गत दिया जाता है।"

साथ ही उन्होंने जहां-जहां पर बाघ घूम रहे हैं वहां लोगों में मुनादी करवाई है कि लोग अकेले जंगलों में न निकलें, समूह बनाकर जाएं। वन विभाग की गाड़ी इन जगहों पर घूमती है। मवेशियों के मरने पर महीने भर में मुआवजा देने का वन विभाग प्रयास करता है।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र निदेशक, एल. कृष्णमूर्ति का कहना है कि जनसंख्या बढ़ने से लोगों और जंगली जानवरों का टकराव बढ़ रहा है। ऐसी घटनाएं सुबह या शाम में ज़्यादा होती हैं। वो लोगों को जागरूक करने का काम लगातार कर रहे हैं। लोगों का सबसे ज़्यादा टकराव भालुओं से होता है क्योंकि उसका भोजन और लोग जो चीज़ें जंगलों में लेने जाते हैं वो लगभग एक है। ऐसे में वन विभाग लोगों को जंगलों में अकेले जाने से मना करता है।

भारतीय वन सर्वेक्षण की साल 2011 की रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश राज्य में 94,689.38 वर्ग किमी वन भूमि थी। ये राज्य की कुल 3,08,252 वर्ग किमी ज़मीन का 30.72% हिस्सा था। भारत में सबसे बड़ा वनक्षेत्र मध्यप्रदेश का है। वहीं साल 2017 में ये वन भूमि घटकर 77,414 वर्ग किमी रह गई है।

साल 2011 में वन क्षेत्र

साल 2011 में वन क्षेत्र

राज्य सरकार कई स्तरों पर जानवरों के हमलों को रोकने और कम करने का प्रयास कर रही है। वन क्षेत्र में लगातार आ रही कमी हमलों का एक बहुत बड़ा कारण है। हालांकि मध्यप्रदेश शासन की वेबसाइट के अनुसार, राज्य में पेड़ लगाने को लेकर व्यापक स्तर पर काम हो रहा है। औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों के उपयोग के लिए सागौन और बांस जैसे उच्च आर्थिक मूल्य की प्रजातियों का रोपण कर वानिकी उत्पादन में वृद्धि करना, वाणिज्यिक बागवानी योजना का उद्देश्य है। मध्यप्रदेश राज्य वन विकास निगम ने 2,22,275 हेक्टर क्षेत्र पर वृक्षारोपण का कार्य शुरू किया है।