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मध्य प्रदेश

क्या मध्यप्रदेश सरकार करेगी 26 करोड़ का नया खर्चा ?

मध्य प्रदेश सरकार की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है किसान क़र्ज़ माफ़ी और पहले से खाली ख़ज़ाने से परेशान सरकार के सामने वचन पत्र का एक और वचन निभाने का समय आ गया हैं

Rishabh Jat

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वचन पत्र जारी किया और इन्ही वचनों पर भरोसा करके जनता ने कांग्रेस को सरकार संभालने का अवसर दिया।सरकार बनते ही प्रदेश के मुख्यमन्त्री का प्रयास रहा कि सभी वचनों को पूर्ण किया जाये और सर्वप्रथम किसान कर्ज माफ़ी का फैसला भी लिया गया। कर्ज की रकम अधिक थी और खज़ाना खाली था इसलिए कर्ज माफ़ी को चरणों में करने की बात कही गयी जो की बड़ी लम्बी प्रक्रिया बन गयी और अब तक जारी है।

कर्ज माफ़ी में हुयी इस लेट लातीफी का फायदा विपक्ष ने उठाया और विपक्ष को इसका फायदा 2019 के लोकसभा चुनावों में मिला मध्यप्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी नेता भी अपनी सीट नहीं बचा पाये। चुनाव के बाद पार्टी एक्शन में नज़र आयी और प्रदेश के लिए अनेक फैसले लिए गए और अब कर्ज माफ़ी, गौशाला के बाद कहे गये वचन पत्र में एक और बात के लिए सरकार गंभीर नज़र आ रही है।

सरकार मध्य प्रदेश में विधान परिषद गठन करने के विचार में है जिसको चुनाव के समय वचन पत्र में कहा गया था। इसके लिए संसदीय कार्य विभाग ने पत्र लिखकर सम्बंधित विभागों से राय मांगी है।प्रदेश में विधान परिषद के गठन के लिए एक लम्बी क़ानूनी प्रक्रिया से गुजरना होता है जिसका ये प्राथमिक कदम है। इसके बाद प्रस्ताव कैबिनेट को भेजा जायेगा और कैबिनेट ही निर्णय करेगा की विधान परिषद का गठन कब होगा।

कैबिनेट से पारित होने के बाद विधान परिषद का प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा जायेगा। भारत सरकार के अनुमोदन के बाद राष्ट्रपति उसकी अधिसूचना जारी करेंगे इसके बाद कहीं जाकर प्रदेश में विधान परिषद के गठन का रास्ता साफ़ हो सकेगा।

अब बात आती है 26 करोड़ की, विधानसभा के बजट के आधार पर विधान परिषद के व्यय का अनुमान लगया गया। इसमे अध्यक्ष,उपाध्यक्ष ,सदस्य ,अधिकारी ,कर्मचारियों के वेतन भत्ते, कार्यालय के ख़र्चे आदि को जोड़ कर कुल खर्च लगभग 26 करोड़ आंका गया हैं। अगर सरकार विधान परिषद का गठन करती है तो ये अतरिक्त खर्च सरकार को उठाना पड़ेगा।