दिल्ली विधानसभा चुनाव : पंजे और कमल पर क्यों भारी पड़ा झाड़ू
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दिल्ली विधानसभा चुनाव : पंजे और कमल पर क्यों भारी पड़ी झाड़ू

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से एक बार फिर 62 सीटों पर "आप" ने कब्ज़ा कर लिया है। जानिए क्यों दिल्ली की जनता का विश्वास नहीं जीत पाई कांग्रेस...

Rishabh Jat

राज एक्सप्रेस। दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर इतिहास दोहराया है। पिछले विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को 70 में 67 सीटें प्राप्त हुयी थीं। इन चुनावों में भी कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी और अब 2020 दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद भी स्थिति एक सामान्य ही है। इस बार भी कांग्रेस को एक भी सीट का फायदा नहीं हो पाया है। अगर कांग्रेस के वोट परसेंटेज की बात करें, तो पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में वोट परसेंट में भी गिरावट देखी गयी है। शायद यही एक मुख्य कारण हैं कि कांग्रेस प्रत्याशियों की आधी से ज्यादा सीटों पर जमानत जप्त हो गयी है।

अगर बात करें दूसरी राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी बीजेपी की तो साफ़ दिखाई देता है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर स्थानीय मुद्दे चुनाव में हावी पड़ गए हैं। बीजेपी ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव प्रचार-प्रसार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी फिर भी दिल्ली की जनता का विश्वास जीतने में असमर्थ रही। बीजेपी के 11 मुख्यमंत्री वर्तमान समेत पूर्व मिलाकर प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत अन्य मंत्री मंडल के मंत्री लगे हुए थे। पर कहीं न कहीं चुनाव में स्थानीय मुद्दों की कमी के कारण बीजेपी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। अगर भारतीय जनता पार्टी के पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखा जाये तो बीजेपी की सीट भी बढ़ी है साथ में वोटिंग परसेंटेज भी बढ़ा है। इस बार बीजेपी को 70 में से 8 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुयी है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करनी वाली आम आदमी पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में 5 सीटों का नुकसान हुआ है। 67 सीटों से 62 सीट्स पर आ गयी है 'आम आदमी पार्टी' पर इन 70 में से 62 सीट का प्रचंड बहुमत मिलने का मुख्य कारण है दिल्ली की जनता का विकास के मुद्दे पर वोट करना। जहाँ दोनों राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी द्वारा विकास जनकल्याण और स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी, इसी कारण दिल्ली की 2 करोड़ जनता ने अरविंद केजरीवाल को पुनः मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने का मौका दिया।

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