राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच टकराव पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच टकराव पर सुप्रीम कोर्ट की चिंताRaj Express

राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच लगातार टकराव पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता , कहा- आत्मावलोकन करने की जरूरत

Supreme Court : शीर्ष अदालत ने एक सख्त संदेश देते हुए कहा कि राज्यपालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे निर्वाचित अथॉरिटी नहीं हैं।

हाइलाइट्स:

  • शीर्ष अदालत ने कहा, ये राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा तय किए जाने वाले मामले हैं।

  • अदालत ने कहा पार्टियों को शीर्ष अदालत में क्यों आना चाहिए, इसे रोकना होगा।

  • पंजाब, केरल सहित अन्य सरकारों और राज्यपाल के बीच टकराव ।

दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कई राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच लगातार 'टकराव' पर सोमवार को चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दोनों पक्षों को आत्मावलोकन करने की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने सात विधेयकों के लंबित रहने के खिलाफ पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए दोनों पक्षों को आत्मावलोकन करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस मामले में राज्यपाल द्वारा की गई कार्रवाई पर विवरण उपलब्ध कराने को कहा। शीर्ष अदालत ने एक सख्त संदेश देते हुए कहा कि राज्यपालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे निर्वाचित अथॉरिटी नहीं हैं। साथ ही अदालत ने लंबित मामलों से निपटने में संवैधानिक निकाय की विफलता पर राज्य सरकारों द्वारा शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने पर अपनी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने कहा, ''बजट सत्र बुलाने के लिए पार्टियों को शीर्ष अदालत जाने की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए..ये राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा तय किए जाने वाले मामले हैं।'' शीर्ष अदालत ने कहा,''राज्यपालों को इस तथ्य से अनजान नहीं रहना चाहिए कि वे निर्वाचित प्राधिकारी नहीं हैं।'' पंजाब सरकार का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील एएम संघवी ने कहा कि अध्यक्ष ने विधानसभा को फिर से बुलाया और विधानसभा ने सात विधेयक पारित किए हैं और राज्यपाल यह कहते हुए हस्ताक्षर नहीं कर रहे हैं कि सत्रावसान पर आप दोबारा विधानसभा नहीं बुला सकते।

संघवी ने कहा कि इस मामले पर अदालत को विचार करने की जरूरत है, क्योंकि राज्यपाल पूरी विधानसभा से पारित सात विधेयकों को लंबित रखे हुए हैं। अदालत ने हालाँकि, संघवी से पूछा,''आपको यह कहाँ से जानकारी मिली कि वह सहमति नहीं दे रहे हैं क्योंकि इसका सत्रावसान हो चुका है?'' इस पर संघवी ने कहा कि जून में चार बिल भेजे गए थे और सत्र बुलाने पर आपत्ति जताते हुए राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजा था। मुख्यमंत्री ने जवाब दिया लेकिन राज्यपाल ने वही आपत्ति जताई।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्यपाल का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा कि राज्यपाल ने मामले में कुछ कार्रवाई की है। उन्होंने कहा कि वह शुक्रवार को ब्योरा उपलब्ध कराएंगे। उन्होंने राज्य विधानसभाओं द्वारा संवैधानिक प्राधिकारों के दुरुपयोग के लिए सदन का उपयोग करने पर भी चिंता व्यक्त की। संघवी ने जैसे ही तेलंगाना मामले का जिक्र किया, पीठ ने कहा कि यह दूसरे राज्य में भी हुआ है और पूछा,''पार्टियों को शीर्ष अदालत में क्यों आना चाहिए। इसे रोकना होगा।'' संघवी ने तेलंगाना मामले में कहा जब राज्य ने अदालत में याचिका दायर की और तत्कालीन राज्यपाल ने कहा कि बिल पारित किए जाएंगे। वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने केरल सरकार द्वारा दायर इसी तरह की याचिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एलडीएफ सरकार द्वारा दो साल से अधिक समय से लंबित बिलों से संबंधित याचिका दायर करने के बाद राज्यपाल ने कहा कि वह शीर्ष अदालत में इसका जवाब देंगे।

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