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सीबीएसई के दिशा- निर्देश का नहीं हो रहा पालन।
सीबीएसई के दिशा- निर्देश का नहीं हो रहा पालन।|The Poineer
भारत

क्या सीबीएसई की गाइडलाइन्स मानते हैं निजी विद्यालय?

सीबीएसई काउंसिल शिक्षा में सुधार लाने के लिए हर साल कुछ गाइडलाइन्स ज़ारी करती है लेकिन सवाल ये है कि कितने स्कूल इन गाइडलाइन्स के अनुसार काम कर रहे हैं।

रवीना शशि मिंज

राज एक्सप्रेस। सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री ऐजुकेशन) देश के प्रतिष्ठित शिक्षा बोर्ड्स में से एक है। सीबीएसई काउंसिल शिक्षा में सुधार लाने के लिए उनके अंतर्गत संचालित होने वाले स्कूलों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए हर साल कुछ गाइडलाइन्स ज़ारी करती है। यहाँ एक बड़ा सवाल ये उठता है कि सीबीएसई के अथक प्रयासों के बावजूद विद्यार्थियों के परिणाम क्यों खराब आ रहे हैं?

क्या हैं सीबीएसई की गाईडलाइन्स?

सीबीएसई ने केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और उसके अंतर्गत संचालित होने वाले तमाम स्कूलों के लिए गाइडलाइन्स निर्धारित की हैं। जिसमें स्कूलों के मूलभूत ढांचे, अध्यापक भर्ती के नियम, विद्यार्थियों के दाखिले और पाठ्यक्रम से जुड़ी सारी जानकारी, पाठ्येत्तर गतिविधियों(Extra curricular Activity) के लिए दिशा- निर्देश हैं। इनका पालन करना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने वाले स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

सीबीएसई के दिशा-निर्देशों के अनुसार, स्कूल का एक सत्र दस महीने का होना चाहिए। दस महीनों में त्यौहारों की छुट्टियाँ, राष्ट्रीय अवकाश, प्राकृतिक आपदा, देश बंद आदि शामिल हैं। इन सब छुट्टियों का दुष्प्रभाव केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में नहीं दिखता परंतु निजी स्कूलों के विद्यार्थियों और अध्यापकों पर इनका दबाव अधिक नज़र आता है।

इस मसले पर हमने कई अध्यापकों से बात की उन्होंने इस समस्या का कारण एक ही बताया, सीबीएसई विनियमन का अनुसरण नहीं करना।

केंद्रीय और नवोदय विद्यालयों की हालत बेहतर

केंद्रीय विद्यालयों का हाल जानने के लिए हमने वहाँ के एक अध्यापक शशि भूषण से बात की। वे मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले के केंद्रीय विद्यालय में हिंदी विषय पढ़ाते हैं। उन्होंने बताया कि, ये सब छुट्टियों का भार केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों के विद्यार्थियों और अध्यापकों पर नहीं आता।

अध्यापक शशि भूषण ने बताया कि, "हम सीबीएसई गाइडलाइंस के अनुसार काम करते हैं। सीबीएसई हर साल एक शैक्षणिक केलैंडर जारी करता है, जिसमें महीने के हिसाब से पाठ्यक्रम बांट दिया गया है। हम उसी हिसाब से अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं। केंद्रीय विद्यालयों में जितनी पाठ्येत्तर गतिविधियाँ होती हैं, उतनी किसी भी स्कूल में नहीं होतीं। इन सब के बावजूद हम समय पर पाठ्यक्रम पूरा करके बच्चों को रिवीज़न का मौका भी दे देते हैं।"

"आप हमारे किसी भी विद्यार्थी से बात कर लीजिए आपको कभी ये शिकायत नहीं मिलेगी कि समय की कमी के कारण हमने पाठ्यक्रम को जल्दी-जल्दी पूरा कर दिया हो और बच्चों को समझ ही नहीं आया हो,"- शशि भूषण आगे बताते हैं।

वे आगे ये भी कहते हैं कि, "हम सिर्फ एनसीआरटी की किताबें बच्चों को पढ़ाते हैं। एनसीआरटी ने हर विषय को बेहतरी से कवर किया है इसलिए दूसरे लेखकों को पढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि विद्यार्थी चाहें तो पढ़ सकते हैं, हमें उससे कोई आपत्ति नहीं लेकिन एनसीआरटी की किताबों से बच्चों को अच्छी मदद मिल जाती है।"

निजी स्कूलों की मनमानी परेशानी का सबब-

निजी स्कूलों की मनमानी परेशानी का सबब बनता जा रहा है। केंद्र इस कवायद में जुटा हुआ है कि निजी स्कूल उनके गाइडलाइंस पर चलें लेकिन निजी स्कूल अपनी मनमानी करते नहीं थक रहे। इन स्कूलों की मनमानी की सज़ा अभिभावकों, विद्यार्थियों और पूरी शिक्षा व्यवस्था तो भुगतनी पड़ती है।

उदाहरण आप लोगों के सामने है, जो विद्यालय सीबीएसई के दिशा-निर्देशानुसार काम कर रहे हैं वहां के बच्चे, अध्यापक और अभिभावकों को कोई शिकायत नहीं है। वहीं अपनी मनमानी कर रहे सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूलों की आए दिन शिकायत सामने आ ही रही हैं।

ये सारी समस्याएं जो बच्चे, अध्यापक और अभिभावको तीनों वर्ग ही परेशान है-

महंगी पुस्तकें-

कई सीबीएसई से मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों में एनसीईआरटी छोड़कर निजी प्रकाशकों की किताबें पढ़ाई जा रही हैं। जो सीबीएसई के नियम के सख्त खिलाफ है।

एनसीईआरटी की तुलना में निजी प्रकाशक की किताबें काफी महंगी होती हैं। दोनों प्रकाशकों में दो से तीन गुना का अंतर है। नया स्कूल सत्र शुरू होने से पहले निजी प्रकाशक स्कूलों से संपर्क करते हैं। कमीशन का रेट तय हो जाने के बाद उस प्रकाशक की किताबें पढ़ाने की मुहर लग जाती है। इससे स्कूलों को अच्छा खासा मुनाफा होता है।

कुछ विद्यालयों को छोड़कर सभी में यही खेल होता चला आ रहा है। ऐसा करने से स्कूल वाले अपना कमीशन कमा रहे हैं। वहीं अभिभावकों की जेबें ढीली हो रही हैं। सिर्फ किताबें तक ही सीमित नहीं है ये बिजनेस। हर स्कूल ने एक दुकान का चुनाव कर लिया है सिर्फ उनके स्कूलों की ड्रेस मिलती हैं, जिससे भी वो मुनाफा कमा रहे हैं।

इसी साल मध्यप्रदेश में सीबीएसई स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों के उपयोग को लेकर भोपाल में बैठक हुई। बैठक में दिशा-निर्देश दिए गए थे कि सीबीएसई स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें चलाई जाएँ। तभी एक स्कूल प्रिंसिपल ने आपत्ति उठाते हुए कहा कि एनसीईआरटी की किताबें चलाने से स्कूल का स्टैंडर्ड खराब होता है।

आपको बता दें कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए एनसीईआरटी की किताबें ही पढ़नी पड़ती है। ऐसे में समझ सकते हैं कि अपने स्वार्थ के लिए सारे स्कूल बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

कक्षाओं में 30 से अधिक बच्चों की संख्या-

एक क्लास में 30 से अधिक बच्चों की संख्या होना भी सीबीएसई के नियमावली के विरूद्ध है। निजी स्कूलों की एक कक्षा में बच्चों की संख्या 30 से अधिक देखने को मिलती है।

30:1 का अनुपात इन स्कूलों में 45:1 और 50:1 देखने को मिलेगा। इतनी संख्या में बच्चों को एक साथ पढ़ाया जाएगा तो जाहिर है हर बच्चे पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाएगा। आज बहुसंख्या में बच्चे कोचिंग पढ़ने जाते हैं उसका एक मुख्य कारण यही है।

हमारे यहां शिक्षकों पर भी दबाव कम नहीं है। निजी महंगे स्कूलों में अध्यापकों की हालत बेहतर है लेकिन वहीं दूसरे स्कूलों में अध्यापकों की हालत खराब है।

हमारी एक अध्यापिका से बात हुई जो पिछले 3 सालों से एक निजी स्कूल में पढ़ा रही हैं। पहचान न बताने की शर्त पर उन्होंने बताया कि, उनके स्कूल के सभी अध्यापकों की स्थिति चिंताजनक है। बच्चों को पढ़ाने से लेकर उनके प्रोजेक्ट बनवाने तक की जिम्मेदारी उनके ऊपर है।

वे आगे बताती हैं कि, स्कूल की तरफ से उन्हें शैक्षेणिक कैलेंडर(Academic calendar) नहीं दिया गया है। हमें पाठ्यक्रम से जुड़े दिशा- निर्देश प्रिंसिपल देते हैं। ये जानकारी नहीं है कि ये दिशा- निर्देश सीबीएसई के अनुसार होतें हैं या प्रिंसपिल के अपने।

कुछ छुट्टियाँ तो निर्धारित होती हैं मगर कुछ आकस्मिक ही पड़ जाती हैं। ऐसी स्थिति में हमें एक्सट्रा क्लासेस लेना पड़ती हैं। दबाव बच्चों और अध्यापक दोनों पर है।

विद्यार्थियों की स्थिति-

सही मायनों में विद्यार्थियों पर ही दबाव आता है। एग्जाम प्रेशर, अच्छे अंक लाने का प्रेशर। अध्यापक तो जैसे-तैसे एक्सट्रा क्लास लेकर पाठ्क्रम पूरा करा देते हैं पर बच्चों को सभी विषयों को याद करने का कितना समय मिलता ये असली मुद्दा है। सिलेबस जितनी जल्दी पूरा होगा विद्यार्थियों को उतना पढ़ने का समय मिलेगा।

बाकी कक्षाओं को अभी दरकिनार कर दें तो कक्षा 11वीं के बच्चों स्थिति और भी बदतर है। कैसे?

सब जानते हैं कि कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षाएं होती हैं और इसके परिणाम मई महीने में घोषित किए जाते हैं। नए सत्र मतलब 15 जून से कक्षा 10वीं पास हुए बच्चों को कक्षा 11वीं में प्रवेश मिलता है।

अब आते हैं समस्या पर। 10 महीने के हिसाब से गिनती करें तो कक्षा 11वीं के बच्चों की वार्षिक परीक्षाएं अप्रैल में होनी चाहिए क्योंकि सीबीएसई की गाइलाइन्स तो 10 महीने के पक्ष में हैं लेकिन हो कुछ और रहा है। बतौर उदाहरण कई निजी स्कूल ऐसे पाएं गए जिन्होंने जनवरी माह के आखिर में ही कक्षा 11वीं के बच्चों की वार्षिक परिक्षाएं शुरू कर दी।

कक्षा 11वीं का पाठ्यक्रम काफी भिन्न है। जैसे नर्सरी बच्चों के लिए जरूरी है सभी विषयों को सीखने के लिए, वैसे ही विद्यार्थियों के लिए कक्षा 11वीं है। विद्यार्थी कक्षा 11वीं में चयनित विषयों के बेसिक को बेहतरी से समझता है और अध्यापकों को समझाना होता है लेकिन स्कूल में हो कुछ और रहा है। 10 महीने के पाठ्यक्रम को 7-8 महीने में खत्म कर देना और फिर परीक्षा ले लेना और उम्मीद जताना कि बच्चा टॉप कर जाएगा तो ये सरासर अन्याय है। बच्चा सिर्फ पास हो जाए वही बड़ी बात होगी।

स्कूल की इन मनमानियों का परिणाम हो रहा है कि विद्यार्थी फेल हो रहे हैं या कम्पार्टमेंट आ जाती है। उनका मनोबल कम हो जाता है और सीबीएसई बोर्ड छोड़कर वे राज्य बोर्ड में दाखिला ले लेते हैं।

स्कूल की मनमानी से बच्चे हो  रहे फेल।
स्कूल की मनमानी से बच्चे हो रहे फेल।
अभिभावक से प्राप्त टाईम टेबल

पेरेंटेस-टीचर्स मीटिंग का भी बिगड़ा माहौल-

पेरेंटेस-टीचर्स मीटिंग एक कार्यक्रम है जो हर स्कूलों में आयोजित होती है। जिसमें बच्चे के परफॉर्मेंस के बारे में अध्यापक और अभिभावक चर्चा करते हैं। कई अभिभावकों का कहना है कि पहले ये होता था कि क्लास टीचर बारी से बारी अभिभावकों से बात करते थे। बच्चों को कहां समस्या आ रही है, अभिभावक उनको कैसे मदद कर सकते हैं सब चर्चा करते थे। अब हालत बदल गए हैं।

अब बच्चों के अभिभावक और सारे विषय के अध्यापक एक साथ बैठकर मीटिंग करते हैं। ऐसा लगता है मानों सारे अध्यापक अभिभावकों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। बच्चों की खूबी के बारे में चर्चा कम होती है बच्चे की कमी को ज्यादा गिनाया जाता है। इससे अभिभावक और बच्चों दोनों को मनोबल कम होता है।

एक सवाल जो यहां सीबीएसई के लिए उठता है कि क्या सिर्फ दिशा- निर्देश देना ही काफी है या उनका अनुसरण कितना हो रहा है ये देखना भी?

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