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पिछले कुछ सालों से 'नेशनल बॉयफ्रेंड डे' जैसे कई दिन ट्रेंड में आए हैं।
पिछले कुछ सालों से 'नेशनल बॉयफ्रेंड डे' जैसे कई दिन ट्रेंड में आए हैं।|सय्यद दबीर हुसैन
भारत

'बॉयफ्रेंड को कैसे खुश करें' पढ़ लिया, उसका असर जानते हैं?

90% लोग डिजिटल तौर पर साक्षर नहीं लेकिन इंटरनेट की उपलब्धता बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबके पास। गूगल पर दूसरा सबसे अधिक ट्रेंड करने वाला शब्द कितना खतरनाक साबित हो सकता है, क्या आप जानते हैं?

प्रज्ञा

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राज एक्सप्रेस। गूगल ट्रेंड्स पर आज दूसरा सबसे ज़्यादा खोजा गया शब्द 'नेशनल बॉयफ्रेंड डे' है। आज 3 अक्टूबर को हमारे देश में नेशनल बॉयफ्रेंड डे मनाया जा रहा है। ये पिछले कुछ सालों से ट्रेंड में आया है। हालांकि, काफी खोजबीन के बाद भी इसका कोई इतिहास हम ढूंढने में सफल नहीं हो पाए लेकिन सुबह से इसके ईर्द-गिर्द चल रही अनेक खबरों से हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि ये तेज़ी से हमारी पीढ़ी के बीच लोकप्रिय हो रहा है। केवल मनोरंजक ही नहीं, कई राष्ट्रीय समाचार वेबसाइट्स पर भी आपको बॉयफ्रेंड डे से संबंधित खबरें पढ़ने को मिल जाएंगी।

  • राष्ट्रीय समाचार वेबसाइट्स पर प्रकाशित 'नेशनल बॉयफ्रेंड डे' से संबंधित कुछ खबरें-

  1. National Boyfriend Day: इन 5 तरीकों से बिना ज्यादा पैसे खर्च किए कर सकती हैं अपने बॉयफ्रेंड को खुश - इंडियाटीवी

  2. National Boyfriend Day 2019: आज है बॉयफ्रेंड डे, जानिए क्यों किया जाता है सेलिब्रेट - एनडीटीवी इंडिया

  3. National Boyfriend's Day 2019: Send your loved one these WhatsApp and Facebook messages - द फ्री प्रेस जर्नल

  4. National Boyfriend Day: इन 5 बातों से आपका BF हो सकता है नाराज - आजतक

  5. National boyfriend day 2019: पांच बातें जो आपके ब्वॉयफ्रेंड को बिल्कुल नहीं होती पसंद - अमर उजाला

इन खबरों को पढ़ने के बाद एक बात लगातार मुझे परेशान कर रही है। इंटरनेट आज कुछ लोगों तक सीमित नहीं है। एक छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक इसकी पहुंच है। पांचवी या छठवीं में पढ़ने वाले 10-12 साल के बच्चे, युवा, अधेड़ उम्र का कोई व्यक्ति या सामान्य तौर पर कोई भी अगर इन्हें पढ़ता है तो उस पर इसका क्या असर पड़ेगा? मेरी एक 24 साल की दोस्त ने जब इस दिन के बारे में सुना तो उसकी सबसे पहली प्रतिक्रिया थी कि मेरा तो बॉयफ्रेंड ही नहीं है, दिन कैसे मनाऊं?

ये खबरें हमारे मन पर कैसा प्रभाव डालेंगी या इनके सही-गलत होने के बारे में सोचने से पहले हम इन पर प्रतिक्रिया देते हैं। ये प्रतिक्रिया हमारे मन में हीन भावना होने की शुरूआत है। अगर दिन में 10 लोग आपको आकर ये कहेंगे या इससे संबंधित खबरें आपकी नज़रों के सामने से गुज़रती हैं तो कहीं न कहीं आप सोचने के लिए मजबूर हो जाएंगे कि हम ये क्यों नहीं मना रहे? या हमारा बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड क्यों नहीं है?

इस बारे में हमने बात की भोपाल के प्रतिष्ठित बंसल अस्पताल में मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी से। वो कहते हैं कि, 'कई बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हम किसी भी चीज़ का संपूर्ण मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है इस पर ध्यान नहीं देते। ऐसी खबरों से बाज़ारवाद का महिमामण्डन होता है। वहीं व्यक्ति के मन पर भी इसका गहरा असर पड़ता है।'

इंडिया टीवी की एक खबर में लिखा गया कि, अपने बॉयफ्रेंड को खुश करने के लिए 'आप चाहें तो एक सेक्सी सा वीडियो बना सकती हैं जो सिर्फ आपके बॉयफ्रेंड के लिए हो।'

इस तरह के सुझावों को अक्सर लोग सही मान लेते हैं। इसका एक कारण ये भी है कि ये प्रतिष्ठित समाचार वेबसाइट्स पर छपी होती हैं जिनकी विश्वसनीयता पर लोग शक नहीं करते। डॉ. त्रिवेदी बताते हैं कि इन खबरों का खास तौर पर बच्चों के मन पर बहुत गलत असर पड़ता है।

"बालपन में बच्चों को नहीं पता होता कि क्या सही और क्या गलत है। इस तरह की खबरें रिश्तों का सामान्यीकरण कर रही हैं। जिनकी समझ बच्चों में होना मुमकिन नहीं है। अगर कोई बच्ची पढ़ती है कि अपने बॉयफ्रेंड को कैसे खुश करें तो वो बिना कुछ सोचे समझे उन्हें मान लेगी। उसे नहीं पता कि उसके बनाए वीडियोज़ या फोटोज़ का गलत इस्तेमाल हो सकता है। इससे साइबर क्राइम को बढ़ावा मिलता है। साथ ही बच्चों को कई तरह की शारीरिक और मानसिक बिमारियां हो सकती हैं।"

डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, मनोवैज्ञानिक

राजधानी भोपाल के एक्सीलेंस कॉलेज में मनोविज्ञान विभाग की शिक्षिका और काउंसलिंग फॉर वेलबीइंग में काउंसलर सौम्या सिंह बताती हैं कि, 'उनके पास एक बार एक महिला आई और उसने कहा कि जब उसका पति उसका बॉयफ्रेंड था तो वो महिला के लिए मोमोज़ लाता था पर जब से उसकी शादी हो गई है पति ने मोमोज़ लाना बंद कर दिया है। मोमोज़ लाना, चॉकलेट, फूल देना, बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड को न्यूड वीडियो भेजना आदि भौतिकवादी चीज़ें हैं। ये किसी के प्रति आपकी भावनाओं का सबूत नहीं हैं।'

"बच्चों को प्यार के बारे में वैचारिक स्पष्टता नहीं होती। वे तो फिल्मों में जो देखते हैं, यहां-वहां से जो जानते हैं वही उनके लिए प्यार है पर ये तो प्यार नहीं है। प्यार वहां है जहां आप आपके पार्टनर के हर सुख-दुख में शामिल हों। ये सभी तुच्छ तरीके हैं और जब माता-पिता ही इसके बारे में साफ तौर पर नहीं समझ पा रहे हैं तो वो बच्चों को कैसे समझा पाएंगे? ये ज़ाहिर है कि इन खबरों का बच्चों पर तो नकारात्मक प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों के लिए भी ये भ्रामक हैं।"

सौम्या सिंह, काउंसलर एवं मनोविज्ञान की शिक्षिका

बच्चों की मनोदशा बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड के रिश्ते को समझने लायक नहीं होती। एक वयस्क व्यक्ति इन रिश्तों को समझ सकता है, वह अपने कंसेंट(सहमति) से किसी भी व्यक्ति के साथ संबंध रखने के लिए स्वतंत्र है। ये उसका निजी चुनाव है। भारतीय संविधान आर्टिकल 21 के तहत 'निजता का अधिकार' देता है। जो कि एक मौलिक अधिकार भी है लेकिन इन खबरों की पहुंच केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो इंटरनेट इस्तेमाल कर रहा है वो इनको आसानी से पढ़ सकता है। साथ ही एक बात गौर करने की ये भी है कि हमारे देश में डिजिटल लिटरेसी(साक्षरता) का स्तर न के बराबर है।

डिजिटल इम्पॉरमेंट फाउंडेशन के अनुसार, भारत की 90 फीसदी जनता डिजिटल तौर पर साक्षर नहीं है। यानी कि इनतक इंटरनेट की पहुंच तो है लेकिन इन्हें इंटरनेट और डिजिटल दुनिया का सही ज्ञान नहीं है। ऐसे में बॉयफ्रेंड डे पर उसे कैसे खुश करें जैसी भ्रामक खबरें हमारे लिए कितनी खतरनाक हैं इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।

मनोविज्ञान में एम. ए. और यूनीक काउंसलिंग सर्विसेज़ के संचालक अर्जुन सहाय कहते हैं कि अगर हमारे बीच में संवाद हो तो इन खबरों का असर होगा ही नहीं।

"जिस तरह हम बच्चों को सही और बुरे स्पर्श (good and bad touch) के बारे में बताते हैं उसी तरह रिलेशनशिप के बारे में क्यों नहीं समझा सकते? ये सच्चाई है कि आजकल सातवीं-आठवीं के बच्चे भी रिलेशनशिप में हैं। इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता, इसलिए ज़रूरी है कि बच्चों से इस बारे में बात की जाए। उन्हें बताया जाए कि किसी के प्रति आकर्षित होना सामान्य है और रिलेशनशिप में क्या करना सही है और क्या आपके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। सही शिक्षा होने पर किसी भी तरह की खबर का असर नहीं होगा।"

अर्जुन सहाय, संचालक, यूनीक काउंसलिंग सर्विसेज़

डॉ. सत्यकांत भी यही सुझाव देते हैं कि बच्चों को इंटरनेट का प्रयोग कैसे किया जाए ये शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से पढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही सरकार जिस तरीके से संक्रामक रोगों, महामारियों, खुले में शौच से मुक्त भारत, पीरियड्स आदि के बारे में जागरूकता अभियान चलाती है, उसी तरह से सरकार को इंटरनेट के प्रयोग और उसके प्रबंधन के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए।

समय के साथ हमारे व्यवहार, सोच, जीने के तरीकों आदि में बदलाव आता है। हमारे दादा-दादी के समय में जो जीवन प्रासंगिक था, हमारे माता-पिता के समय तक उसमें हज़ारों परिवर्तन आए। अगर तत्कालीन समय की बात की जाए तो संचार साधनों, इंटरनेट और तकनीक की पहुँच ने हमारी पीढ़ी को तेज़ी से बदला है। आज दुनिया की कोई भी जानकारी एक क्लिक में हमारे पास उपलब्ध है। जाहिर है, हमारी पीढ़ी की सोच में भी तेज़ी से परिवर्तन देखने को मिला है और ये हमारी ज़िन्दगी, फैसलों, रिश्तों लगभग सभी में झलकता है।

ऐसे में बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड का रिश्ता हमारी पीढ़ी और अगली पीढ़ियों की सच्चाई है। इससे मुंह नहीं फेरा जा सकता लेकिन इन रिश्तों का इस्तेमाल कर किसी भी व्यक्ति का फायदा उठाना, उसे डराना-धमकाना, उसके साथ जबरदस्ती किसी भी तरह का शारीरिक सम्बन्ध बनाना या उस पर इसके लिए दबाव बनाना जैसी सभी चीज़ें नैतिक तौर पर तो गलत हैं हीं, कानूनन जुर्म भी हैं।

बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड को कैसे खुश करें, उसके लिए वीडियो बनाएं, उसे फूल भेजें, ये करें, वो करें... आदि जैसी खबरें कहीं-न-कहीं हम पर एक सामाजिक दबाव बना रही हैं। अक्सर इस तरह के दबाव में आकर लोग ऐसे कदम उठा लेते हैं जो वे नहीं चाहते। इसका शिकार सबसे अधिक बच्चे होते हैं। जब वे अपने आस-पास, दोस्तों को, अपने सीनियर्स को, बड़े भाई-बहनों को ये सब करते देखते हैं तो उन्हें ये सामान्य लगता है लेकिन वे इसके परिणामों से वाकिफ नहीं होते।

एक्सीलेंस कॉलेज में मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. अनुपम शुक्ला का कहना है कि इस तरह की खबरें लोगों में हीन भावना को बढ़ावा दे रही हैं।

"ये जो रोज़ नए-नए कॉन्सेप्ट आ रहे हैं, ये रिश्तों का व्यवसायीकरण है। इन खबरों को पढ़कर लोगों को लगता है कि किसी का बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड नहीं है तो वो स्मार्ट नहीं है। बच्चों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ता है। बच्चों में इससे मानसिक बिमारियां बढ़ रही हैं। उन्हें लगता है कि उनका बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड नहीं हैं तो उन्हें कोई पसन्द नहीं करता, कोई उनकी चिन्ता नहीं करता। हमारा दिमाग ऐसा होता है कि हम चाहते हैं कि कोई हमें स्वीकार करे, हमें सही कहे, हमारी तारीफ करे और अगर ऐसा हमारे जीवन में नहीं है तो हम परेशान रहने लगते हैं। ये परेशानियां बढ़ते-बढ़ते कई बार मानसिक रोगों तक पहुँच जाती हैं। ये खबरें इस मनोस्थिति को बढ़ावा दे रही हैं।"

डॉ. अनुपम शुक्ला, विभागाध्यक्ष (मनोविज्ञान, एक्सीलेंस कॉलेज)

वे आगे बताती हैं कि, 'इस तरह की खबरों का असर ये होता है कि प्राकृतिक सम्बन्धों का मूल्य समाप्त होता जाता है। 10 वर्ष से ऊपर बच्चों में कई तरह के बदलाव आते हैं, शारीरिक और मानसिक तौर पर उनमें तूफान की तरह परिवर्तन होते हैं। बच्चों को लगता है कि, वो बड़े हो गए हैं लेकिन असल में वे बड़े होने की शुरूआत में होते हैं। ऐसे में बहुत आवश्यक है कि अभिभावक अपने बच्चों से खुलकर बात करें और उनकी बातों को सुनें और समझें।'