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मध्य प्रदेश के सर्वपल्ली राधाकृष्णन: श्री अनिल उपाध्याय
मध्य प्रदेश के सर्वपल्ली राधाकृष्णन: श्री अनिल उपाध्याय|Syed Dabeer Hussain - RE
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मध्य प्रदेश के सर्वपल्ली राधाकृष्णन: श्री अनिल उपाध्याय

क्यों मध्प्रदेश के रहने वाले अनील उपाध्याय जी को वर्तमान के डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का रूप माना जाता है? ऐसा क्या किया है इन्होंने और क्यों ? आइये जाने इनकी पूरी कहानी विस्तार से।

Vivvan Tiwari

राज एक्सप्रेस। हर व्यक्ति की पूरी लाइफ में एक न एक शिक्षक ऐसा जरूर होता है जिसे वह अपना प्रेरणा स्त्रोत मानता है। आज हम एक ऐसे ही शिक्षक के बारे में जानने जा रहे है, जो न जाने कितने लोगो के प्रेरणा स्त्रोत है और डॉक्टर सर्वपल्ली राधा कृष्णन की छवि लिए हुए हैं। आज इनके बारे में बात करके कोई भी बहुत गौरवान्वित महसूस करेगा। यह एक ऐसे शिक्षक है जो बिना किसी प्रकार के लेनदेन के निष्पक्ष रूप और सरलता से लोगों को उनकी मंज़िल तक पहुंचने में उनकी मदद करने में अपनी पूरी जान लगा दिया करते हैं। आज के युग (कलयुग) में ऐसे शिक्षक का होना अपने आप में ही एक कल्पना के सामान है।

एक 12 साल का बच्चा मुरैना में पशुओं के मेले के बहार एक छोटी सी दुकान लगाता था। उसकी दुकान में हर वो जरूरत का सामान जैसे गोलियां जिसे आज सभी चॉकलेट के नाम से जानते है, बीड़ी जो अब चलन में बहुत कम है, क्योंकि लोग आजकल सिगरेट पीना पसंद करते है, और अन्य ऐसे सामान मिलता था जो, उस पशु मेले में आये पशु विक्रेताओं को जरूरत का होता था। इतना ही नहीं इस दुकान में सभी सामन के उचित रेट मिलते थे। उस बच्चे ने मात्र 12 साल की उम्र में ही समाज सेवा को प्राथमिकता देते हुए इस दुकान की शुरुआत की। उसका मकसद सिर्फ यह था कि, व्यपारी को उचित दाम में सभी सामान पास ही में मिल सके।

हो सकता है आपको यह सब सुन कर बहुत अजीब लग रहा होगा, इस उम्र (12 साल) का बच्चा जो यह तक सही से नहीं सोच सकता है कि, उसे खाना क्या है और क्या नहीं ? और वो इतना सोच रहा है। इतना तो किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि, यही बच्चा आगे चल कर गणमान्य नागरिक बनेगा। इस बच्चें की समाज सेवा की कहानियाँ अगर लिखने बैठा जाये तो कई कलम की स्याही खत्म हो जाएगी। चाहे वो मंदिर में आकर पानी से बह जाने वाली मिटटी को समेटना हो या फिर मंदिर में आये पशुओं के लिए मुफ्त में चारा देना हो। इसके लडकपन में ऐसी गम्भीरता थी।

बच्चे की पढ़ाई का दौर :

इस बच्चे की जिंदगी का अब 10वीं कक्षा का समय चल रहा था। इस बच्चे के पिता सरकारी नौकरी में थे। वो 3 भाई और माता पिता के साथ एक सुसज्जित परिवार में रहता है। दो भाई पढ़ने में कुछ खास न होने के कारण कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाए थे, इसलिए पिता को सारी उम्मीदें छोटे बेटे अर्थात इसी बच्चे से थी। 10वीं कक्षा का रिजल्ट आता है और बच्चा पिता की उम्मीदों पर खरा उतरता है। बच्चा 10वीं कक्षा को अच्छे अंकों के साथ फस्ट डिवीज़न से पास करता है। बच्चे के रिजल्ट से पिता फुले नहीं समां रहे थे और भला ऐसा होता भी क्यों नहीं पूरे परिवार में पहली बार कोई फस्ट डिवीज़न लाया था।

हुई एक ट्रेजेटी :

10वीं कक्षा में अच्छे अंक तो पा लिए लेकिन उसके साथ एक ट्रेजेडी हुई अगर आम बोलचाल की भाषा में बोले तो, उसकी हिट हो गई। इस पर ध्यान मत ही दीजिये यह बड़ी कहानी है। निरंतर परेशानियाँ आती-जाती रही। बच्चा अब 12वीं कक्षा में मेथ्स स्ट्रीम से पढ़ाई कर रहा है। उसे फिजिक्स बिलकुल नहीं आती है। हाल यह था कि, टीचर ने बोल दिया था कि, पास होना नामुमकिन है। उसके लिए यह सुनना ही बर्दाश्त से बाहर था। उसने जैसे-तैसे पूरी युगबोध घोल के पी डाली और फिर क्या था सबसे अच्छे अंक उसी सब्जेक्ट में आये। फिजिक्स में सबसे अच्छे अंक पाना मतलब 1st डिवीजन ही पास होना।

कॉलेज का समय :

बाहरवीं पास करके जब वो कॉलेज में आया तब पिता ने डॉक्टर बनने पर जोर दिया, लेकिन उसका मन नहीं था। कोशिश तो बहुत की ग्वालियर भी गए लेकिन 2 दिन में वापस। इन्हें करना कुछ और ही था। परिवार के साथ चिंता मनन करके मुरैना के एक कॉलेज में स्नातक के लिए एडमिशन ले लिया। यहाँ एक बार फिर चोट हो गई और यह फेल हो गए। घरवाले परेशान और हताश थे। उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ तो वो ग्वालियर से B.Sc. करने चले गए। यही उनकी लाइफ का टर्निंग पॉइंट था और साथ ही यही से असफलता ने उनका साथ छोड़ दिया था। अब वही छोटा बच्चा बड़ा हो गया था जो है - श्री अनिल उपाध्याय जी। अनिल उपाध्याय जी ने स्नातक के 3 सालो में गोल्ड मैडल जीते। उसी कॉलेज से M.Sc. किया और फिर गोल्ड मैडल जीता।

एक बड़ा हादसा :

कॉलेज के इन 5 सालों में एक बड़ी घटना घाटी थी, जिसमे बिल्डिंग डेह गई थी, जिसमे अधिक से अधिक लोगों को सरकारी मदद पहुंचने से पहले बचा लिया गया था। अपने समाज सेवक स्वभाव के कारण ही इन्होंने 22 लोगों की टीम में राहत कार्य के लिए काम किया। समाज सेवक स्वभाव तो इनका कॉलेज से ही था। पियून से फाइल लेकर मंज़िल तक पहुँचा देना प्यासे को पानी पिलाना और भी कई अच्छाइयाँ इनमे थी जिससे इनकी वाहवाही होती ही रहती थी। इनके राहत कार्य के लिए बाबूलाल गौर ने इन्हें सम्मानित भी किया था।

IPS अधिकारी से मुलाकात:

कॉलेज में किसी मांग के चलते घेराव करते हुए, इन्हें एक IPS अधिकारी ने बुलाया मन में संशय होते हुए भी चले गए। जब चर्चा हुई तब सामने आई बात यह थी कि, तुम इतने नॉलेजेबल हो तो, गवर्मेंट की तैयारी करके प्रशासन से जुड़ जाओ और फिर क्या, उस 20 मिनट की चर्चा में ही उनका माइंड मैनिपुलेट हो गया और सोच लिया अब तो यही करना है। अगले ही दिन IAS की तैयारी करने दिल्ली निकल गए। पहले साल दोनों एग्जाम पास करने के बाद इंटरव्यू में पहुंच कर मात खाने के बाद लगातार चार वर्षों तक इंटरव्यू तक पहुंचे पर सलेक्ट नहीं हो सके। IAS बनने का सपना तो टूट गया, लेकिन असफल नहीं हुए।

साल 2011-12 का समय :

साल 2011-12 में B.Ed की पढ़ाई कर उन्होंने मध्यप्रदेश में सेकेंड नंबर पर टॉप किया। इन्हे न जॉब की कोई चिंता थी न कुछ करने की फ़िक्र। भोपाल आकर इन्होने अध्यापक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने IAS के सभी इंटरव्यू में असफलताओं के कारण घर वालो से नजरे कैसे मिलाएंगे ऐसी सोच बना ली और घर-संसार, दोस्त-माहिम सबका त्याग कर दिया। उनके माता- पिता को तो पता ही नहीं था कि, उनका बेटा करने क्या वाला था?

4 बच्चों से अकेडमी तक का सफर :

भोपाल आकर उन्होंने एक टेबल पर 4 बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और देखते ही देखते बच्चों की संख्या में वृद्धि होने लगी और अब इन बच्चों की संख्या 600 हो चुकी थी। बच्चे इस तरह कक्षा में भरे रहते थे, मानो कोई सिनेमा हॉल हो। यह 24-24 घंटे बच्चों को पढ़ाया करते थे। इन्होने साल 2015 में प्रतिज्ञा समाज कल्याण समिति नाम की एक समिति की शुरुआत की। इसी के तहत उन्होंने भोपाल के MP नगर में प्रतिज्ञा IAS अकेडमी की शुरुआत की। इस अकेडमी का उद्देश्य उन बच्चों को पढ़ाना था, जिनके पास IAS बनने वाली सोच थी, लेकिन हैसियत नहीं। यह उन बच्चों को फ्री में पढ़ाते थे।

सुपर 20 अकेडमी :

वह उन बच्चों में से ऐसे 20 बच्चे चुनते थे जो, सबसे ज्यादा मेधावी होते थे। इस अकेडमी से हर साल पड़े कम से कम 10-12 बच्चे IAS बनते थे। ऐसे पूरी दुनिया में उच्च पदों पर न जाने कितने बच्चे होंगे जो इस अकेडमी से पड़े है। जिसके लिए उनसे एक रूपये भी नहीं लिए गए।

मैहर में आयोजन का प्रस्ताव :

अनिल जी के इन कार्यो से प्रभावित होकर मैहर के नारायण त्रिपाठी जी ने अपनी समिति के द्वारा एक आयोजन का प्रस्ताव रखा। इस आयोजन का नाम "आओ जाने मध्यप्रदेश" था। जो, एक क्विज़ था। मैहर में पूरी तैयारियों और 4900 बच्चों के साथ यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह आयोजन एक इतिहास बन गया क्योंकि अनिल जी को गिनीज ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड से नवाज़ा गया। यह इनके द्वारा प्राप्त की गई सबसे बड़ी उपलब्धि थी। इन्हे 2016 में स्टेट अवार्ड से सम्मानित किया गया। इतना ही नहीं 2019 में इन्होंने करंट अफेयर की एक बुक लिखी। जो मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब थी। इन्होंने न जाने एक ही कक्षा में 2000 बच्चों तक को पढ़ाया है।

बच्चों के प्रति समर्पण :

अनिल जी का बच्चों के प्रति समर्पण ऐसा है कि, इन्होंने शादी तक नहीं की। उनसे पूछने पर उन्होंने बताया कि, मैं सिर्फ बच्चों के प्रति समर्पित हूँ और यह जरूरी नहीं है कि, अगर में शादी करता तो, मेरी जीवन साथी भी बच्चों के लिए समर्पित हो पाती। यही एक बड़ी वजह थी जो मेने विवाह ही नहीं किया। मैं अपना पूरा जीवन अपने छात्रों के प्रति समर्पित करना चाहता हूँ। वह हमेशा उन बच्चों के लिए कुछ न कुछ करते रहते है और उनके जीवन का एक ही लक्ष्य है एक ऐसी यूनिवर्सिटी का निर्माण करना जहां बच्चों को पढ़ाने के लिए उनसे एक रूपये भी ना लिए जाये।

इनके द्वारा पाई गई उपलब्धिया :

  • गिनीज ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित

  • स्टेट अवार्ड से सम्मानित

  • उत्कृष्ट समाज सेवी सम्मान

पुस्तकालय का निर्माण :

इनके द्वारा भाजपा कार्यलय भोपाल के पुस्तकालय का निर्माण किया गया जिसकी तारीफ स्वयं अमित शाह ने भी की है। इसके लिए इन्हे सम्मानित भी किया गया। एक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने अपना जीवन अपने छात्रों को समर्पित किया था और दूसरे और वर्तमान में ये अनील उपाध्याय जी है जिन्होंने अपना जीवन अपने छात्रों के नाम कर दिया है। अनील उपाध्याय जी ने समाज के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर एक अलग ही छवि बना ली है।