विजयादशमी व RSS स्थापना दिवस पर मोहन भागवत का तमाम मुद्दों पर कड़ा संदेश

विजयादशमी और स्थापना दिवस के मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कोरोना संकट, चीन के साथ विवाद, नई शिक्षा नीति सहित तमाम मुद्दे पर अपनी बात रखी। जानें उनका भाषण...
विजयादशमी व RSS स्थापना दिवस पर मोहन भागवत का तमाम मुद्दों पर कड़ा संदेश
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नागपुर: आज देश भर में विजयादशमी मनाई जा रही है और विजयादशमी के दिन ही आज 25 अक्‍टूबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का स्थापना दिवस भी होता है। विजयादशमी और स्थापना दिवस के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर शस्त्र पूजा की। इसके बाद मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया।

विजयादशमी की दी शुभकामनाएं :

इस दौरान RSS प्रमुख मोहन भागवत ने समस्त देशवासियों को संबोधित कर विजयादशमी की शुभकामनाएं दी। साथ ही अपने संबोधन में कोरोना संकट, चीन के साथ विवाद, नई शिक्षा नीति, राम मंदिर, नागरिकता संशोधन काूनन (CAA), नए कृषि कानून, पारिवारिक चर्चा के महत्व और स्वदेशी नीति के तहत 'वोकल फॉर लोकल' के मुद्दे पर अपनी बात रखी।

कोरोना संकट पर बोले मोहन भागवत :

कोरोना संकट पर बोलते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- कोरोना की वजह से कई सारे विषय बंद हो गए। सरकार की तरफ से सही समय पर उठाए गए कदमों की वजह से भारत को कोरोना के मामले में अन्य देशों की तुलना में कम नुकसान हुआ। विश्व के अन्य देशों की तुलना में हमारा भारत संकट की इस परिस्थिति में अधिक अच्छे प्रकार से खड़ा हुआ दिखाई देता है। भारत में इस महामारी की विनाशकता का प्रभाव बाकी देशों से कम दिखाई दे रहा है, इसके कुछ कारण हैं। कोरोना की मार ने कई सार्थक बातों की तरफ हमारा ध्यान खींचा है।

चीन पर साधा निशाना :

चीन के साथ विवाद व हाल ही की गतिविधियों को लेकर मोहन भागवत ने कहा कि, ''कोरोना महामारी के संदर्भ में चीन की भूमिका संदिग्ध रही, यह तो कहा ही जा सकता है, परंतु अपने आर्थिक सामरिक बल के कारण मदांध होकर उसने भारत की सीमाओं पर जिस प्रकार से अतिक्रमण का प्रयास किया वह सम्पूर्ण विश्व के सामने स्पष्ट है। चीन के साम्राज्यवादी स्वभाव के सामने भारत तन कर खड़ा हुआ है, जिससे पड़ोसी देश के हौसले पस्त हुए हैं। कोई भी देश हमारी दोस्ती को कमजोरी न समझे।''

नई शिक्षा नीति का किया स्वागत :

विजयादशमी पर अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने नई शिक्षा नीति पर कहा, ''अर्थ, कृषि, श्रम, उद्योग तथा शिक्षा नीति में स्व को लाने की इच्छा रख कर कुछ आशा जगाने वाले कदम अवश्य उठाए गए हैं। व्यापक संवाद के आधार पर एक नई शिक्षा नीति घोषित हुई है। उसका संपूर्ण शिक्षा जगत से स्वागत हुआ है, हमने भी उसका स्वागत किया है।''

'वोकल फॉर लोकल' पर बोले भागवत :

विजयादशमी पर अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा- आगे बढ़ने के लिए स्वदेश की नीति आवश्यक है और 'वोकल फॉर लोकल' स्वदेशी की नीति से भरा हुआ है। इसके जरिए हम अपनी स्वदेशी की भावना को आगे बढ़ा सकते हैं और इसे पूरा कर सकते हैं। यह स्वदेशी संभावनाओं वाला उत्तम प्रारंभहै, परन्तु इन सबका यशस्वी क्रियान्वयन पूर्ण होने तक बारीकी से ध्यान देना पड़ेगा, इसीलिये स्व या आत्मतत्त्व का विचार इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में सबने आत्मसात करना होगा, तभी उचित दिशामें चलकर यह यात्रा यशस्वी होगी।

मोहन भागवत के संबाेधन की प्रमुख बातें :

  • पर्यावरण का विषय सर्वस्वीकृत व सुपरिचित होने से अपने घर में पानी को बचाकर उपयोग, प्लास्टिक का पूर्णतया त्याग व घर के आंगन में, गमलों में हरियाली, फूल, सब्जी बढ़ाने से लेकर वृक्षारोपण के उपक्रम कार्यक्रम तक कृति की चर्चा भी सहज व प्रेरक बन सकती है।

  • सप्ताह में एक बार हम अपने कुटुम्ब में सब लोग मिलकर श्रद्धानुसार भजन व इच्छानुसार आनन्दपूर्वक घर में बनाया भोजन करने के पश्चात्, 2-3 घण्टों की गपशप के लिए बैठ जाएं और पूरे परिवार में आचरण का संकल्प लेकर, उसको परिवार के सभी सदस्यों के आचरण में लागू करने करें।

  • भारतीय विचार में संघर्ष में से प्रगति के तत्त्व को नहीं माना है। अन्याय निवारण के अंतिम साधन के रूप में ही संघर्ष मान्य किया गया है। विकास और प्रगति हमारे यहाँ समन्वय के आधार पर सोची गई है।

  • हमारा कृषि का अनुभव गहरा व्यापक व सबसे लम्बा है। इसलिये उसमें से कालसुसंगत, अनुभवसिद्ध, परंपरागत ज्ञान तथा आधुनिक कृषि विज्ञान से देश के लिये उपयुक्त व सुपरीक्षित अंश, हमारे किसान को अवगत कराने वाली नीति हो। कृषि नीति का हम निर्धारण करते हैं, तो उस नीति से हमारा किसान अपने बीज स्वयं बनाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। हमारा किसान अपने को आवश्यक खाद, रोगप्रतिकारक दवाइयाँ व कीटनाशक स्वयं बना सके या अपने गाँव के आस-पास पा सके यह होना चाहिए।

  • देश की एकात्मता के व सुरक्षा के हित में ‘हिन्दू’ शब्द को आग्रहपूर्वक अपनाकर, उसके स्थानीय तथा वैश्विक, सभी अर्थों को कल्पना में समेटकर संघ चलता है। संघ जब 'हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है' इस बात का उच्चारण करता है तो उसके पीछे कोई राजनीतिक अथवा सत्ता केंद्रित संकल्पना नहीं होती।

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