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प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर|Pixabay
भारत

राजस्थान के बाद गुजरात में 100 से अधिक बच्चों की मौत

राजस्थान के कोटा और बीकानेर के बाद अब गुजरात के राजकोट से 111 बच्चों की मौत की खबर सामने आई है। इस मुद्दे पर चिंता जताने और हल निकालने के बजाए नेता कर रहे हैं आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति।

प्रज्ञा

प्रज्ञा

राज एक्सप्रेस। राजस्थान के बाद अब गुजरात से भी नवजात बच्चों की मौत की घटनाएं सामने आई हैं। कोटा और बीकानेर के बाद अब राजकोट में 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। राजस्थान के कोटा में अब तक 110 बच्चों की मौत हो चुकी है, वहीं बीकानेर में 162 बच्चों की मौत हुई। इसके बाद गुजरात के राजकोट से यह खबर सामने आई है कि, यहां 111 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस बारे में जब गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी से सवाल पूछा गया तो वे बिना कोई जवाब दिए निकल गए।

बीकानेर सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल एचसी कुमार ने बताया कि, दिसंबर के महीने में पीबीएम अस्पताल के आईसीयू में 162 बच्चों की मौत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि, अस्पताल में चिकित्सा सेवाओं में कोई लापरवाही नहीं हुई है। हर एक जीवन को बचाने के लिए पूरे प्रयास किए जाते हैं। वहीं कोटा स्थित जे. के. लोन सरकारी अस्पताल में मरने वाले नवजात बच्चों की संख्या भी बढ़कर 110 हो गई है।

राजकोट सिविल अस्पताल के डीन मनीष मेहता ने बताया कि, राजकोट सिविल अस्पताल में दिसंबर के महीने में 111 बच्चों की मौत हो गई। कोटा में 100 से ज्यादा बच्चों की मौत के बाद सरकार द्वारा बनाए गए पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, 'बच्चों की मौत की वजह हाइपोथर्मिया (शरीर का तापमान असंतुलित हो जाना) के चलते हुई है। अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी इसकी वजह हो सकती है।'

हाइपोथर्मिया एक ऐसी आपात स्थिति होती है, जब शरीर का तापमान 95 एफ (35 डिग्री सेल्सियस) से कम हो जाता है। वैसे शरीर का सामान्य तापमान 98.6 एफ (37 डिग्री सेल्सियस) होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अस्पताल में बच्चे सर्दी के कारण मरते रहे और यहां पर जीवन रक्षक उपकरण भी पर्याप्त मात्रा में नहीं थे।

नवजात शिशुओं के शरीर का तापमान 36.5 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए, इसलिए उन्हें वार्मर्स पर रखा गया, जहां उनका तापमान सामान्य रहता है। हालांकि अस्पताल में काम कर रहे वार्मर्स की कमी होती गई और बच्चों के शरीर के तापमान में भी गिरावट जारी रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि 28 में से 22 नेबुलाइजर दुष्क्रियाशील (डिसफंक्शनल) मिले। वहीं 111 में से 81 जलसेक (इनफ्यूजन) पंप काम नहीं कर रहे थे और पैरा मॉनिटर और पल्स ऑक्सीमेटर्स की हालात भी खराब थी।

अस्पताल में ऑक्सीजन पाइपलाइन्स नहीं थी, जिससे सिलेंडर की मदद से बच्चों को ऑक्सीजन की आपूर्ति की जाती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि, आईसीयू की हालात खराब थी।

बिहार में जब मामूली बुखार से सैंकड़ों बच्चों की मौत हुई तो कई तरह से इस पर राजनीति हुई। एक बार फिर राजस्थान और गुजरात में हो रही बच्चों की मौतों पर राजनीति शुरू हो गई है। राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने जे. के. लोन अस्पताल का दौरा करने के बाद अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। पायलट ने अस्पताल के दौरे के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा कि, 'हमें आंकड़ों के जाल में नहीं फंसना है। हम लोगों का काम इस पूरे मामले को लेकर संतोषजनक नहीं है।'

'आंकड़ों के जाल में हम इस चर्चा को ले जाएं, यह उन लोगों को स्वीकार्य नहीं है जिन्होंने अपने बच्चे खोए हैं। जिस मां ने अपने बच्चे को कोख में 9 महीने रखा, उसकी कोख उजड़ती है तो उसका दर्द केवल वही जानती है। हमें लोगों को विश्वास दिलाना होगा कि हम इस तरह की घटना को स्वीकार नहीं करेंगे। हमें ज़िम्मेदारी तय करनी होगी। यदि इतने बच्चों की मौत हुई है तो कोई ना कोई कमी जरूर रही होगी।'

सचिन पायलट, उप-मुख्यमंत्री (राजस्थान)

इस बयान से यह साफ है कि उनका इशारा राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के उस बयान की तरफ था जिसमें उन्होंने बच्चों की मौतों के आंकड़े के कम होने की बात कही थी। अशोक गहलोत ने कहा था कि, 'प्रदेश के हर अस्पताल में हर रोज 3-4 बच्चों की मौतें होती हैं। यह कोई नई बात नहीं। एक भी बच्चे की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन मौतें 1400 भी हुई हैं, 1500 भी हुई हैं। इस साल तकरीबन 900 मौतें हुई हैं।' उन्होंने यह भी दावा किया कि इस साल पिछले 6 सालों के मुकाबले सबसे कम मौतें हुई हैं।

2019 में अस्पताल में 16,915 नवजात भर्ती हुए, जिसमें से 963 की मौत हो गई। वर्ष 2018 की बात की जाए तो 16,436 बच्चों में 1005 नवजातों की मौत हुई थी। 2014 से यह संख्या लगभग 1,100 प्रति वर्ष रही है। जोधपुर के उम्मेद अस्पताल और एमडीएम हॉस्पिटल की हालत बहुत ज्यादा बेहतर नहीं है।

यहां दिसंबर महीने में एनआईसीयू और पीआईसीयू में बच्चों की कुल मौतों की संख्या 146 है। एसएन मेडिकल कॉलेज से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, इन दोनों ही अस्पतालों में दिसंबर महीने में 4,689 बच्चों को भर्ती कराया गया था। इनमें से 3,002 नवजात थे। इलाज के दौरान कुल 146 बच्चों की मौत हो गई, जिनमें से 102 नवजात थे।

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