मथुरा के बल्देव कस्बे में दाऊ जी मन्दिर में देवर भाभी की अनूठी होली कल
मथुरा के बल्देव कस्बे में दाऊ जी मन्दिर में देवर भाभी की अनूठी होली कलSocial Media

मथुरा के बल्देव कस्बे में दाऊ जी मन्दिर में देवर भाभी की अनूठी होली कल

रंगों का त्योहार होली आज मथुरा समेत देशभर में बड़े धूमधाम से बनाया जा रहा है वहीं ब्रज की होली की श्रृंखला में जिले के बल्देव कस्बे में स्थित दाऊ जी मन्दिर में देवर भाभी की अनूठी होली कल खेली जाएगी।

राज एक्सप्रेस। रंगों का त्योहार होली आज मथुरा समेत देशभर में बड़े धूमधाम से बनाया जा रहा है वहीं ब्रज की मशहूर होली की श्रृंखला में जिले के बल्देव कस्बे में स्थित दाऊ जी मन्दिर में देवर भाभी की अनूठी होली मंगलवार को खेली जाएगी। जिलाधिकारी नवनीत सिंह चहल ने आज यहां बताया कि मन्दिर के रिसीवर से इस होली को खेलते समय कोविड-19 के नियमों का पालन करने को कहा गया है । इस दौरान मन्दिर में अधिक भीड़ न हो तथा सभी को मास्क पहनना सुनिश्चित किया गया है। उन्होंने बताया कि इसी श्रृंखला में विभिन्न मशहूर मन्दिर के प्रबंधकों को भी कोरोना के नियमों का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है।

इस बीच मन्दिर के रिसीवर आर के पाण्डे ने बताया कि इस हुरंगे के लिए आठ कुंतल टेसू के फूल, 11 कुंतल गुलाब के फूल और ढ़ाई कुंतल गुलाल का प्रयोग किया जाएगा। टेसू के फूलों को भिगोकर उससे रंग तैयार किया जाएगा। उन्होंने बताया कि दाऊजी मन्दिर की होली देवर-भाभी की होली इसलिए कही जाती है कि द्वापर में यहां पर श्यामसुन्दर और उनके सखाओं ने रेवती मइया एवं उनकी सहचरियों से होली खेली थी। श्यामसुन्दर एक स्वरूप से सखाओं के साथ मिलकर होली खेल रहे थे तो दूसरे स्वरूप में वे अपने बड़े भाई बलराम के साथ दूर मौजूद थे।

उन्होंने बताया कि इस हुरंगे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अश्लीलता से कोसों दूर होती है तथा इसमें श्रद्धा, भक्ति और संगीत की त्रिवेणी प्रवाहित होती रहती है। यह होली दो झंडो के साथ खेली जाती है। कान्हा जब रेवती मइया पर रंग डालने की कोशिश करते हैं तो वे कहती हैं कि "नन्द के होली तो ते तब खेलूं मेरी पहुंची में नग जड़वाय"। लेकिन जब कान्हा और उनके सखा नहीं मानते हैं तो वे उनके रंग से गीले कपड़ों को फाड़कर उसके कोड़े बनाकर पीटती हैं और रसिया गायन के साथ मन्दिर की छत से गुलाल की वर्षा होती है तथा टेसू के रंग की होली शुरू हो जाती है। इस होली में टेसू का इतना रंग खेला जाता है कि मन्दिर प्रांगण में लगभग एक फुट रंग भर जाता है। हुरंगे का समापन झंडे की लूट से होता है तथा हुरिहार "हारी रे गोरी घर चली जीत चले नन्दलाल" तथा रेवती मइया और उनकी सखियां "हारे रे लाला घर चले जीत चली ब्रज नारि" गाते हुए क्षीर संगर की परिक्रमा करते है।

डिस्क्लेमर : यह आर्टिकल न्यूज एजेंसी फीड के आधार पर प्रकाशित किया गया है। इसमें राज एक्सप्रेस द्वारा कोई संशोधन नहीं किया गया है।

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