शिवगिरी तीर्थयात्रा उद्घाटन में राजनाथ सिंह का संबोधन
शिवगिरी तीर्थयात्रा उद्घाटन में राजनाथ सिंह का संबोधन Social Media

तिरुवनंतपुरम में शिवगिरी तीर्थयात्रा उद्घाटन में राजनाथ सिंह का संबोधन

केरल के तिरुवनंतपुरम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शिवगिरी तीर्थयात्रा उद्घाटन समारोह में संबोधित कर अपने संबोधन में कहीं ये बातें...

केरल, भारत। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह आज शुक्रवार को केरल के तिरुवनंतपुरम में शिवगिरी तीर्थयात्रा उद्घाटन समारोह में शामिल हुए और समारोह को संबोधित किया।

समारोह में राजनाथ सिंह ने कहा- इस विशाल तीर्थदान महोत्सव में, पूज्य संतों के आशीर्वाद, और श्री नारायण गुरु जी की कृपा से मुझे आप सबके बीच उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यहाँ जिस आध्यात्मिक आनंद को मैं अनुभव कर पा रहा हूँ, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। यहीं के एक छोटे से गाँव कालड़ी के आचार्य शंकर ने जिस तरह पूरे भारत की यात्रा कर राष्ट्र को सांस्कृतिक एकता के बंधन में बांधा, वह अपने आप में अभूतपूर्व था। अद्वैतवाद के दर्शन के माध्यम से उन्होंने जीव और परमात्मा के ऐक्य का जो मत दिया, वह आज भी इस देश की आत्मा में रचा-बसा है।

श्री नारायण गुरु जी भी निस्संदेह, सांस्कृतिक एकता को समृद्ध करने वाली कड़ी में एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने न केवल केरल की जनता को, अपितु समस्त भारत की जनता, बल्कि मैं कहूँ बाहर देशों के लोगों को भी समान रूप से प्रभावित किया है, और उन्हें भारत और भारतीयता से जोड़ा है। आप सभी बिना किसी भेद-भाव के, समता की भावना के साथ एक दूसरे के साथ एकाकार हो गए हैंI यह समागम दुनिया को एक संदेश देने के लिए पर्याप्त है, और वह है भारतीय संस्कृति में निहित मानवमात्र की समता और समानता।

  • आज हमारे पास गर्व करने के लिए जो-जो भी चीजें हैं, जो-जो भी विरासते हैं, उसमें हमारी सांस्कृतिक विरासत सबसे प्रमुख है। हमारी संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है, और इसने भारत देश के साथ-साथ दुनिया भर को जीवन जीने की राह दिखाई है। समता, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और विश्वशांति के जिन सिद्धांतों की ओर आज दुनिया आगे बढ़ रही है, इसके सूत्र हमें भारतीय संस्कृति में दिखाई देते हैं।

  • कई बार भारतीय चिंतनधारा पर यह आरोप लगता है, कि यहाँ समता, समानता और बंधुत्त्व की अवधारणा पर अपेक्षाकृत विचार नहीं किया गया है। यह अवधारणा यहाँ अगर पहुँची है, तो वह Western Renaissance अथवा French revolution के माध्यम से हमारे यहाँ पहुँची है। पर यह बात पूरी सही नहीं है।

  • पश्चिम में तो मानव-मानव के बीच समता, समानता और बंधुत्त्व पर बात की गई है, पर हमारे देश में तो मानव के साथ अन्य प्राणियों, जीव-जंतुओं और जड़-चेतन तक के बीच समानता और उनके कल्याण की बात की गई है।

  • वसुधैव कुटुंबकम’ के रूप में हमारे ऋषियों-मनीषियों द्वारा समस्त विश्व को एक परिवार मानने का आग्रह अगर दुनिया को कहीं से गया है, तो वह हमारे और आपके देश भारत से ही गया है। और यही कारण है कि हमारा देश भारत, प्राचीन काल में विश्वगुरु के रूप में मान्य था।

  • समानता की अवधारणा हमारे आदिग्रंथों में है। यह मैं आप लोगों के सामने रखना चाहूँगा। 'अखंड-मंडला-कारं, व्याप्त-एव-चराचरम' कहकर इस देश में कण-कण में ईश्वर की संकल्पना इसीलिए की गयी है, ताकि मानव का मानव से ही नहीं, बल्कि सृष्टि के सभी अंगों के साथ तादात्म्य स्थापित हो सके।

  • 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो' कहकर भगवान ने सभी प्राणियों के हृदय में स्वयं के निवास की बात की है। इसी प्रकार आगे चलकर, बौद्ध और जैन धर्म में सभी मनुष्यों के बीच समानता की बात करते हुए, उन्हें इन धर्मों में सम्मान पूर्वक प्रविष्ट कराया गया।

  • आप देखेंगे, तो पाएँगे कि हमारे वेदों और उपनिषदों में जो दर्शन प्राप्त होता है, कालांतर में वही दर्शन सरलता और सहजता के साथ भक्तिकाल के संतों और कवियों में प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए छान्दोग्य उपनिषद का एक महावाक्य है 'तत्वमसि'। इसका भाव है कि ‘जीव के अपने कुछ सारभूत गुण हैं, जो ब्रह्म के गुणों से समानता रखते हैं’। सरल शब्दों में कहें, तो ‘जीव और ब्रह्म दोनों आपस में एकाकार हैं। इसी तरह ईश उपनिषद में 'ईशावास्य मिदं सर्वं' कहा गया है, यानि ईश्वर की व्याप्ति सर्वत्र है। यह भी सभी तत्वों में ईश्वर की समान उपस्थिति के चलते समानता की ही बात करता है।

  • कबीरदास के यहां यही दर्शन 'एक नूर ते सब जग उपज्या' के रूप में सामने आता है, जो ईश्वर की सर्वत्र व्याप्ति की घोषणा करता है। नानक के यहाँ यही दर्शन 'इक ओंकार सतनाम’ के रूप में आता है। नानक जी के अनुसार अगर जगत का कर्ता एक है, तो सभी प्राणियों में समानता भी स्वाभाविक है।

  • गोस्वामी तुलसीदास जी के यहां आप देखेंगे, तो वही दर्शन भक्ति के उदात्त महाकाव्य रामचरितमानस में 'सिया राम मैं सब जग जानी' के रूप में प्रकट होता है। वह समस्त जग में सिया-राम के दर्शन करते हैं, और जब सभी जगह सियाराम की व्याप्ति है तो सब स्वतः समान हो जाते हैं।

  • हमारी संस्कृति सदा निर्बलों के पक्ष में, सत्य के पक्ष में, न्याय के पक्ष में, ज्ञान के पक्ष में, कुल मिलाकर मानवता के पक्ष में खड़ी रही है, जो एक बार पुनः 19वीं शताब्दी में श्री गुरु नारायण जी के माध्यम से प्रकट होती है।

  • चाहे मैं हूं, या प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी हों, हम सभी उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं, जहां की शाखाओं में हर सुबह जो प्रार्थना होती है, उसमें श्री नारायण गुरु का स्मरण किया जाता है। हमारे लिए श्री नारायण गुरु सम्माननीय ही नहीं, बल्कि प्रातः स्मरणीय भी हैं

  • स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद ने भी शिवगिरि मठ में आकर 'गुरुदेवन' का मार्गदर्शन प्राप्त किया, और अपने जीवन में लक्ष्य के प्रति और अधिक ऊर्जा के साथ आगे बढ़े।

  • सतयुग में ज्ञानशक्ति महत्त्वपूर्ण थी, तो त्रेता में मंत्रशक्ति। द्वापर में युद्धशक्ति महत्त्वपूर्ण थी, तो कलियुग में संघ, यानि संगठन की शक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। गुरुजी के इस उपदेश को हमें आत्मसात करना होगाI हम वैश्विक मंच पर एक बार फिर से विश्वगुरु के रूप में दिखेंगे।

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