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भीमा-कोरेगांव में स्थित 'रणस्तंभ'
भीमा-कोरेगांव में स्थित 'रणस्तंभ'|ट्विटर
भारत

भीमा-कोरेगांव में सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम, सीएए के विरोध को 'न'

साल 2018 में भड़की हिंसा के मद्देनज़र अब सुरक्षा के तमाम बंदोबस्त किए गए हैं। सोशल मीडिया पर भी रखी जा रही है कड़ी निगरानी। रणस्तंभ और आस-पास के इलाकों में बंद हो सकती हैं इंटरनेट सेवाएं।

प्रज्ञा

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राज एक्सप्रेस। साल 1818 में लड़ी गई भीमा-कोरेगांव की ऐतिहासिक लड़ाई की 202वीं वर्षगांठ पर आज लाखों दलित समर्थकों, अम्बेडकरवादी विचारधारा को मानने वाले लोगों, राजनेताओं और विद्यार्थियों आदि के यहां पहुंचने की संभावना है। साल 2018 में हुई हिंसा के चलते यहां सुरक्षा के तमाम बंदोबस्त किए गए हैं। पुणे ग्रामीण पुलिस और जिला प्रशासन ने पेरने, वधु बुद्रुक, सानासवाड़ी और भीमा-कोरेगांव के आस-पास के कई गांवों में कड़ी सुरक्षा का इंतज़ाम किया है।

प्रशासन के अनुसार, 5000 से अधिक पुलिस के सिपाही, राज्य रिजर्व पुलिस बल और होम गॉर्ड्स की टुकड़ी सुरक्षा के इंतज़ाम देख रही है। सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। ऐसे कई फेसबुक पेजेस को बंद किया गया है जो हिंसा भड़काने वाले पोस्ट करते हैं। पुलिस का कहना है कि, शांति भंग करने वाले किसी भी तरह के पोस्ट पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं जिला प्रशासन की तरफ से 'नागरिकता संशोधन अधिनियम' और 'नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स' के खिलाफ होने वाले किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन की मनाही है।

एहतियाती कार्रवाई के चलते पुलिस ने भीमा-कोरेगांव में स्थित रणस्तंभ के आस-पास इंटरनेट सेवाएं बंद रखने की घोषणा की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुणे के जिला कलेक्टर नवल किशोर राम ने कहा कि,

"यह सीएए या एनआरसी के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए उठाया गया कदम नहीं है बल्कि हम चाहते हैं कि भीमा-कोरेगांव में होने वाला आयोजन बिना किसी हिंसा के शांतिपूर्ण तरीके से हो। यह आयोजन भीमा-कोरेगांव के शहीदों को श्रृद्धांजलि देने के लिए किया जाता है और हम नहीं चाहते कि, यहां कोई और ऐसा मुद्दा उठाया जाए जो कि परेशानी का कारण बन सकता हो।"

प्रशासन की तरफ से किसी भी तरह भड़काऊ राजनैतिक या ऐतिहासिक घटना के बैनर्स और होर्डिंग्स लगाने की मनाही है। अगर कोई भी इस तरह की हरकत करता है तो पुलिस उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। वहीं 250 से अधिक वॉट्सएप ग्रुप्स के एडमिन्स को भी चेतावनी जारी की गई है। 15 फेसबुक पेज और 25 टिकटॉक वीडियोज़ को भी हटा लिया गया है।

मिलिन्द एकबोटे और सांभाजी भिड़े और 150 अन्य लोगों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-144, 107, 110 आदि के तहत निषेधात्मक आदेश जारी किए गए हैं। इन्हें भीमा-कोरेगांव और आस-पास के इलाकों में आने की मनाही है। मिलिन्द एकबोटे और सांभाजी भिड़े के खिलाफ साल 2018 में हुई हिंसा में एफआईआर दर्ज़ हुई थी।

क्या है भीमा-कोरेगांव का ऐतिहासिक महत्व?

हर साल, पहले दिन पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव में एक जश्न मनाया जाता है। नए वर्ष की शुरूआत का नहीं, दलितों की सवर्णों पर जीत का जश्न। बात कुछ 202 साल पुरानी है।

साल 1818 में अंग्रेज़ों और मराठाओं के बीच एक युद्ध लड़ा गया। ऐसा कहा जाता है कि, इसमें 2500 से भी अधिक की मराठा सेना को कुछ 500 सैनिकों ने परास्त कर दिया था। अंग्रेज़ों की तरफ से लड़ रहे सैनिकों में अधिकतर महार जाति से ताल्लुक रखते थे। जिन्हें तत्कालीन समय में अछूत समझा जाता था।

महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले में भीमा नदी के तट पर भीमा-कोरेगांव नाम का एक छोटा-सा गांव है। यहां हुई लड़ाई में मराठाओं को मिली हार ने औपचारिक तौर पर पेशवा साम्राज्य का अंत कर दिया। यह युद्ध पेशवा बाजीराव द्वितीय और ईस्ट इंडिया कंपनी के महार सैनिकों के बीच 1 जनवरी 1818 को लड़ा गया था।

जिसके बाद अंग्रेज़ों ने युद्धस्थल पर इन सैनिकों की याद में एक विजय स्तंभ की स्थापना की। जिसे 'रणस्तंभ' भी कहा जाता है। इसपर भीमा-कोरेगांव में अंग्रेज़ों की तरफ से लड़ाई लड़ने वाले सैनिकों के नाम उद्धृत हैं। भारतीय संविधान के निर्माता और समाज सुधारक डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर ने 1 जनवरी 1927 को रणस्तंभ पहुंचकर इन दलित सैनिकों को श्रृद्धांजलि अर्पित की और अंग्रेज़ों की नीतियों के खिलाफ भाषण दिया, जिसके चलते ब्रिटिश हुकूमत ने अंग्रेज़ी सेना में महारों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।

रणस्तंभ के सामने डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
रणस्तंभ के सामने डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
सोशल मीडिया

बाबा साहेब की विचारधारा को मानने वाले और दलित समुदाय के लोग इस लड़ाई को दलितों की जीत के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि, यह ब्राह्मणवादी पेशवाओं के दलितों पर अत्याचार, यातनाओं और अन्यायपूर्ण व्यवहार के ऊपर मिली जीत है।

साल 2018 में हुए आयोजन में भड़की थी हिंसा-

हर साल नए साल की शुरूआत में हज़ारों की तादाद में लोग भीमा-कोरेगांव पहुंचते हैं और रणस्तंभ पर श्रृद्धांजलि अर्पित करते हैं। अपने पूर्वजों को याद करते हैं। साल 2018 में दो सौ साल पूरे होने के कारण यहां हर साल से अधिक संख्या में लोग जुटे थे। इस आयोजन में हिंसा भड़क गई। कहा जाता है कि, कई लोग भगवा झंडा लेकर आयोजन में पहुंचे जिसके बाद हिंसा भड़क गई। दलितों और मराठाओं की इस लड़ाई में एक व्यक्ति की जान चली गई थी और कई लोग घायल हुए थे।

भीमा-कोरेगांव से तीन किमी दूर एक और छोटा-सा गांव है, वधु बुद्रुक। इस गांव की भी एक ऐतिहासिक कहानी है। कहा जाता है कि, यहां एक स्थानीय दलित युवक गोविंद गोपाल महार ने छत्रपति सांभाजी महाराज का अंतिम संस्कार किया था, जिसका स्मारक यहां मौजूद है।

छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे सांभाजी महाराज की मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर हत्या कर दी गई थी। उनके क्षत-विक्षत शरीर को भीमा नदी में फेंक दिया गया और जनता को उनका अंतिम संस्कार न करने की चेतावनी दी गई थी। वधु बुद्रुक में रहने वाले गोविंद गोपाल महार ने जो कि एक पहलवान था, औरंगजेब की चेतावनी को अनसुना कर सांभाजी महाराज के शरीर को नदी से निकाला और पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया।

वधु बुद्रुक में सांभाजी महाराज के साथ ही गोविंद गोपाल महार की समाधी भी बनी हुई है। साल 2018 में भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के तीन दिन पहले 29 दिसंबर को गोविंद गोपाल महार की समाधी टूटी हुई पाई गई। जिसके बाद दलित और सवर्ण समुदायों में तनाव पैदा हो गया।

एक बैठक के बाद इसमें थोड़ी राहत हुई लेकिन कई दलित और बहुजन समूह के लोगों ने 'एल्गार परिषद' नाम से 31 दिसंबर 2017 को एक सार्वजनिक सम्मेलन का आयोजन किया। यह आयोजन शनिवार वाड़ा में किया गया जो कि 1818 तक पेशवाओं का राजमहल था। इसमें जिग्नेश मेवाणी, जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद, रोहित वेमूला की मां राधिका वेमूला, प्रकाश अम्बेडकर जैसे कई दलित नेता शामिल हुए।

सम्मेलन में हिन्दुत्व राजनीति को नई पेशवाई बताया गया। दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों को यह बात नागवार गुज़री और 1 जनवरी 2018 को हुई हिंसा के पीछे यह भी एक कारण रहा।

कई मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि दक्षिणपंथी हिन्दू समर्थकों की तरफ से हुआ हमला पूर्व नियोजित था। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि, भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी नेता मिलिन्द एकबोटे, सांभाजी भिड़े और उनके समर्थकों द्वारा हिंसा भड़काने एवं धार्मिक भावनाएं उकसाने वाले कृत्यों की परिणति है।

विपक्ष और वामपंथी दलों के लोग हिन्दुवादी संगठनों और केन्द्र में भाजपा सरकार को इस हिंसा के पीछे ज़िम्मेदार ठहराते हैं। इस मामले में दो अलग-अलग जांचें चल रही हैं। जिनमें पुलिस ने आरोप लगाया कि भीमा-कोरेगांव में इकट्ठा हुए लोगों में से कुछ लोगों का संबंध नक्सलियों से है और वे तात्कालिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह मारने का प्लान बना रहे थे। जबकि कई मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि ये आरोप बेबुनियाद है।

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