धुरंधरों राजनीतिज्ञों में होती थी राजा जौनपुर की गिनती
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धुरंधर राजनीतिज्ञों में होती थी राजा (यादवेंद्र दत्त दुबे) जौनपुर की गिनती

राजनीति के पुरोधा व जौनपुर के राजा यादवेंद्र दत्त दुबे ने दो दशक पहले नौ सितंबर 1999 को दुनिया को अलविदा कह दिया था, मगर उनकी यादें आज भी लोगों के बीच ताजा हैं। वे जौनपुर रियासत के 11 वें राजा थे।

जौनपुर। राजनीति के पुरोधा व जौनपुर के राजा यादवेंद्र दत्त दुबे ने दो दशक पहले नौ सितंबर 1999 को दुनिया को अलविदा कह दिया था, मगर उनकी यादें आज भी लोगों के बीच ताजा हैं। वे जौनपुर रियासत के 11 वें राजा थे। जानकारों का कहना है कि राजा जौनपुर यादवेंद्र दत्त राजनीति के ऐसे धुरंधर थे जो अपनी बुद्धिमत्ता व कौशल के दम पर शीर्ष पर पहुंचे। वे हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत धारा प्रवाह बोलते थे तो विज्ञान व ज्योतिष की भी अच्छी जानकारी रखते थे। वह जनसंघ व भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उत्तर प्रदेश के आरएसएस के प्रभारी रहे। चार बार विधायक व दो बार सांसद चुने गए। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में नेता विरोधी दल भी रहे।

पं.दीनदयाल उपाध्याय ने 1963 का उपचुनाव उनकी हवेली में एक माह रूककर लड़ा था। इनका संबंध आरएसएस के बड़े प्रचारकों से रहा, जिनका अक्सर यहां आना-जाना लगा रहता था। राजा यादवेंद्र दत्त के करीबी रहे राज पीजी कालेज के पूर्व प्राचार्य डा.अखिलेश्वर शुक्ला ने बताया कि एक बार लोकसभा में राजा साहब अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर बोल रहे थे, उनकी वाकपटुता को पूरा सदन एकाग्रता से सुन रहा था। उनका समय समाप्त होने पर लोकसभा अध्यक्ष ने उनको रोकना शुरू किया। इस पर अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवानी ने अपना समय लोकसभा अध्यक्ष से आग्रह करके दिला दिया। उसी समय कांग्रेस नेता स्टीफेन ने टोका-टाकी शुरू कर दी तो राजा साहब ने उनको भोजपुरी भाषा में समझाते हुए कहा कि तोहार उमर चालीस होई आई, अवै न गई तोहार लरिकाई। इस पर पूरे सदन में ठहाका लगना व ताली बजना शुरू हो गया।

वर्ष 1962 में सदर सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे, तो राज हवेली से कलेक्ट्रेट तक जुलूस निकला था। जिस पर बीबीसी ने कवर किया था। बीबीसी में बोला गया कि जौनपुर के राजा यादवेंद्र दत्त के जुलूस में पूरे जिले की भीड़ इकठ्ठा हो गई थी कि इसमें तिल रखने की जगह नहीं थी। राजा यादवेंद्र दत्त दुबे का जन्म सात दिसंबर 1918 को हुआ था। 1957 में पहली बार जनसंघ के टिकट पर सदर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे थे। दोबारा सदर सीट से 1962 के चुनाव में उनके सामने कांग्रेस के दिग्गज नेता हरगोविद सिंह थे। उन्होंने उनको हराया तो उनको विधानसभा में नेता विरोधी दल बनाया गया। उनकी बढ़ती ख्याति व जीत को देखते हुए जनसंघ के बड़े नेता पं.दीनदयाल उपाध्याय को 1963 के उपचुनाव में यहां लड़ने के लिए भेजा गया था, जिसमें उनको हार मिली थी।

वर्ष 1967 में बरसठी से चुनाव लड़कर विधायक चुने गए तो गड़वारा से भी एक बार चुनाव जीते। 1977 के इमरजेंसी में उन्हें वाराणसी के जेल में बंद किया गया था। वह जौनपुर लोकसभा से 1977 व 1989 में सांसद चुनकर संसद पहुंचे। जौनपुर की राज हवेली में आरएसएस के दूसरे सरसंघ चालक गुरुजी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, आरएसएस नेता भाऊराव देवरस, वेणु गोपालन, नानाजी देशमुख, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जैसे दिग्गजों का आना-जाना लगा रहता था।

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