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एनआरसी से बाहर हुए 19 लाख से ज़्यादा लोग।
एनआरसी से बाहर हुए 19 लाख से ज़्यादा लोग।|ट्विटर
भारत

क्या है NRC जिसके पीछे चल रहा है बड़ा बवाल

एनआरसी, ये लफ्ज़ पिछले कुछ सालों में चर्चा का विषय रहा है। आखिर ये है क्या? किन लोगों को इससे बाहर किया गया? और इन लोगों के साथ अब होगा क्या?

Pragya Bharti

Pragya Bharti

राज एक्सप्रेस। इस साल (2019) की 31 अगस्त को एनआरसी की अंतिम सूची जारी की गई। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, इस सूची में 19 लाख छह हज़ार 657 लोगों का नाम नहीं है। कुल 3 करोड़ 29 लाख से अधिक लोगों ने इसके लिए आवेदन किया और उनमें से 3 करोड़ 11 लाख 21 हज़ार 004 लोगों का नाम इस सूची में आ गया है।

  • क्या है NRC?

एनआरसी मतलब नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स, जिसका अर्थ है नागरिकों की राष्ट्रीय सूची। वो सूची जिसमें भारत के निवासियों का नाम है, जिन लोगों का नाम इस सूची में नहीं होगा वो भारत के नागरिक नहीं कहलाए जाएंगे। यानि कि जिन 19 लाख से ज़्यादा लोगों का नाम एनआरसी की अंतिम सूची में नहीं आया है उन्हें अपनी पहचान साबित करनी होगी अन्यथा उन्हें भारत में बाहर से आए गैर-कानूनी प्रवासियों की सूची में डाल दिया जाएगा।

  • क्यों है ये इतनी अहम?

इसकी अहमियत इसलिए है क्योंकि अगर किसी भी व्यक्ति विशेष का नाम इसमें नहीं है तो उसे भारत की नागरिकता नहीं मिलेगी यानि कि वो व्यक्ति इस देश का नागिरक नहीं कहलाएगा और उसे भारत से बाहर भेजा जाएगा। कब, कहां और कैसे इसका जवाब अभी तक भारत सरकार ने नहीं दिया है। हालांकि, सरकार का मानना है कि गैर-कानूनी प्रवासी बंग्लादेशी हैं और बंग्लादेश सरकार पहले ही उन लोगों को अपने देश का नागरिक मानने से इनकार कर चुकी है। इन हालातों में एनआरसी से छूटे लोगों के साथ क्या होगा ये भविष्य के गर्भ में कैद है।

  • असम में ही क्यों? क्या पूरे देश में ऐसी कोई सूची जारी होगी?

असम में भूमिपुत्र और बाहरी लोगों के बीच लड़ाई कई दशकों से चली आ रही है। आज़ादी के पहले भी वहां इस तरह की पहचान का खतरा था लेकिन साल 1947 में भारत-पाकिस्तान के अलग होने और 1971 में बंग्लादेश के अलग देश बनने के बाद से ये लड़ाई गंभीर होती चली गई।

कई राजनेताओं का कहना है कि पूरे देश में इस तरह की सूची जारी करनी चाहिए लेकिन सरकार ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक फैसला नहीं लिया है।

यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत में तिब्बत से आए लोग कई सालों से रह रहे हैं। वे भारत के नागरिक नहीं हैं और शरणार्थी हैं, क्या सरकार उन्हें भी देश से बाहर का रास्ता दिखाएगी? देश में नेपाली लोगों का भी आना-जाना है। वे कई बार काम के सिलसिले में तो कई लोगों की रिश्तेदारी भी भारत में है। ऐसे लोगों के साथ क्या होगा? यही हाल श्रीलंका के तमिल ब्राह्मणों के साथ भी है। 1947 के बाद पाकिस्तान से आए हिन्दू भी भारत के नागरिक नहीं है। इस तरह के सभी समुदायों के साथ क्या होगा?

लोग अपना नाम एनआरसी में जुड़वाने के लिए कर रहे हैं मशक्कत।
लोग अपना नाम एनआरसी में जुड़वाने के लिए कर रहे हैं मशक्कत।
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  • कब से शुरू हुई असम में एनआरसी की कवायद?

साल 1951 में आज़ादी के बाद देश की पहली जनगणना हुई। इस ही जनगणना के बाद पहली बार असम में एनआरसी बनी और उसके बाद से पहली बार इसमें संशोधन किया गया है ताकि असम में गैर-कानूनी पलायन को रोका जा सके। ये सूची भारत की सर्वोच्च न्यायालय की देख-रेख में बनाई गई है।

साल 1971 में बंग्लादेश के अलग देश बनने के बाद से असम में लोगों का गैर-कानूनी तरीके से पलायन बढ़ा। यहां के स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ऐसा माना गया कि असम में 31 से 34 प्रतिशत बाहरी लोग रह रहे हैं।

सत्तर के दशक में असम गण परिषद और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने गैर-कानूनी पलायन का पुरजोर विरोध किया। राज्य में इसके चलते कई बार दंगे भी हुए। साल 1983 में दंगे बढ़ने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आईएमडीटी- इलिगल माइग्रेंट्स डिटरमिनेशन बाए ट्रिब्यूनल (Illegal Migrants Determination by Tribunal) एक्ट बनाकर मामले को सुलझाने की कोशिश की। इसके अनुसार 25 मार्च 1971 को या उसके बाद आधिकारिक पासपोर्ट या किसी भी तरह के कानूनी दस्तावेज के बिना भारत में आने वाले लोगों गैर-कानूनी प्रवासी कहा गया। यह एक्ट केवल असम में लागू किया गया।

इसके बावजूद असम में हालत नहीं सुधरे और 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की अध्यक्षता में आंदोलनकारियों, असम सरकार और भारत सरकार के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसे असम समझौता (Assam Accord) कहा गया। इसमें ये तय हुआ कि साल 1951 से 1961 के बीच असम आए लोगों को पूरी नागरिकता दी जाएगी। वहीं साल 1961 से 1971 के बीच राज्य में आए लोगों को अधूरी नागरिकता दी जाएगी, मतलब कि इन लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं होगा।

  • एनआरसी प्रक्रिया-

साल 2005 में असम के तात्कालिक मुख्यमंत्री सर्बानन्द सोणोवाल ने सर्वोच्च न्यायालय में एक पीटिशन दायर की। जिसके बाद न्यायालय ने आईएमडीटी को खारिज कर दिया। वहीं साल 2009 में एक पीआईएल दायर हुई और न्यायालय ने साल 1951 की एनआरसी लिस्ट को संशोधित कर दोबारा बनाने का आदेश दिया। साल 2014 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की देख-रेख में ये प्रक्रिया शुरू हुई।

राज्यसभा टीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रक्रिया के अन्तर्गत राज्य में 2500 एनआरसी सेवा केन्द्र बनाए गए। हर सेवा केन्द्र के अन्तर्गत कम से कम 10 गांवों को रखा गया। इस दौरान आवेदन पत्र बांटे गए। इन्हें जमा करने की आखिरी तारीख 31 अगस्त 2015 थी। जिसके बाद 1 सितंबर से इनकी जांच शुरू हुई।

प्रक्रिया पूरी होने पर 31 दिसंबर 2017 को पहली एनआरसी सूची जारी की गई। इस सूची में तीन करोड़ 29 लाख आवेदनों में से 1 करोड़ 90 लाख लोगों के नाम थे और एक करोड़ 25 लाख से ज़्यादा लोगों के नाम नहीं थे।

इसके बाद 30 जुलाई 2018 को एनआरसी की दूसरी सूची जारी की गई। इस सूची में 40 लाख से भी ज़्यादा लोगों के नाम नहीं थे। कुल 2 करोड़ 89 लाख 83 हज़ार 677 लोगों के नाम इस सूची में शामिल थे। इसके बाद 36 लाख 26 हज़ार 630 लोगों ने एनआरसी में शामिल होने के लिए आवेदन किया।

26 जून 2019 को एक लिस्ट जारी हुई जिसमें 1 लाख 2 हज़ार 462 लोगों को एनआरसी से बाहर कर दिया गया। ये लोग अपनी नागरिकता साबित करने के लिए केस लड़ सकते हैं। ये वो लोग हैं जिनका नाम जुलाई 2018 में जारी हुई लिस्ट में था पर जो नागरिक होने के लिए अपात्र पाए गए।

इसके बाद 31 अगस्त 2019 को एनआरसी की अंतिम सूची जारी हुई, जिसमें 19 लाख 6 हज़ार 657 लोगों को इससे बाहर कर दिया गया है। ये लोग अब भी सरकार को आवेदन कर सकते हैं, जिसके लिए इन्हें 120 दिनों की मोहलत दी गई है।

  • किन आधारों पर तय हो रही है असम में नागरिकता?

1951 की एनआरसी और 24 मार्च 1971 की मध्यरात्रि तक की निर्वाचन सूची के आधार पर संशोधित एनआरसी बनाई गई है। इस समय तक निर्वाचन सूची में नाम नहीं होने पर भी 24 मार्च 1971 मध्यरात्रि तक के ज़मीन और किराए के घर के दस्तावेज़ों, नागरिकता प्रमाण पत्र, मूल निवासी प्रमाण पत्र और पासपोर्ट्स पहचान के दस्तावेज़ के रूप में जमा किए जा सकते हैं। अगर कोई 1971 के बाद पैदा हुआ है तो वो अपने माता-पिता या किसी संबंधित व्यक्ति के दस्तावेज़ जमा कर अपनी नागरिकता सिद्ध कर सकता है। इसके साथ ही जन्म प्रमाण-पत्र या कोई दस्तावेज जो संबंधित व्यक्ति के साथ आपके सम्बन्ध को साबित करे जमा किया जा सकता है।

  • एनआरसी में नाम नहीं आने पर लोगों के साथ क्या होगा?

जिन लोगों का नाम एनआरसी में नहीं आएगा उनके साथ क्या होगा, इस पर भारत सरकार का रुख अभी पूरी तरह साफ नहीं है। फिलहाल उन्हें डिटेंशन कैम्प्स भेजने की व्यवस्था है।

  • एनआरसी पर उठ रहे सवाल-

एनआरसी में कई महत्वपूर्ण लोगों का नाम शामिल नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद (1974-1977) के परिवार का नाम भी एनआरसी की सूची में नहीं है।

7 और 8 सितंबर 2019 को इंडियन सोसाइटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ में "असम में नागरिकता विवाद : संवैधानिक प्रकियाएं और मानवीय मूल्य पर जन सुनवाई" हुई। द कारवां वेबसाइट के मुताबिक, इस सुनवाई में जूरी के सदस्यों ने इस बात पर अपनी सहमति व्यक्ति की कि एनआरसी से मानवीय संकट पैदा हुआ है।

पश्चिम बंगाल राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एनआरसी का विरोध किया है। उन्होंने इसके विरोध में मार्च निकाला और सरकार को संबोधित करते हुए कहा कि आग के साथ मत खेलिए। हम कभी भी धर्म, जाति और जातीयता के आधार पर लोगों के बंटवारे को नहीं होने देंगे।

“आप असम के लोगों को पुलिस के बल पर शांत कर सकते हैं पर ये बंगाल में नहीं चलेगा। यहां आप एक भी व्यक्ति को छूने भर की कोशिश कीजिए फिर देखिए। यहां रहने वाला हर व्यक्ति बंगाल का नागरिक है।”

ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री (पश्चिम बंगाल)

द हिन्दू की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पांच वामपंथी दलों ने सरकार से गुजारिश की है कि एनआरसी में नाम नहीं आने पर लोगों को डिटेंशन कैम्प न भेजा जाए। साथ ही डिटेंशन कैम्स को बंद कर दिया जाए।

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया(मार्क्सिस्ट), कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) लिबरेशन, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लोक और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने 11 सितंबर को देश की राजधानी दिल्ली में मिलकर इस विषय पर चर्चा की और संयुक्त बयान जारी किया। वामपंथी दलों का मानना है कि डिटेंशन कैम्प्स में मूलभूत सुविधाएं नहीं होती हैं। लोगों को अनिश्चित समय के लिए कैम्प्स में रखना गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक है।

द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं एनआरसी से सबसे अधिक प्रभावित हैं। जिन महिलाओं की शादी जल्दी हो गई, उनके पास अपने परिवार के दस्तावेज नहीं हैं, ऐसे में वो खुद को भारत का नागरिक सिद्ध नहीं कर पा रही हैं। ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है।