भूता कोला जैसी 3 और परंपराए
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Kantara 2 : जानिए कांतारा फिल्म में दिखाए जाने वाले "भूता कोला" जैसी 3 और परंपराए...

Kantara 2 : भूता कोला जैसी और भी कई परंपराए है जो, भूता कोला जैसी ही विचित्र है। आईये जानते है कुछ ऐसी ही परंपराओं के बारे में...

राज एक्सप्रेस। "कांतारा" एक ऐसी फिल्म थी जिसने भारतीय सिनेमा को नया आयाम दिया और सिनेमा को बनाने का नया तरीका भी सिखाया कि भारत के गांव में, कस्बों के, पौराणिक कथाओं में उल्लेख की गई परंपराओं के बारे में ईमानदारी से और परंपराओं के स्वाभिमान को कैसे फिल्म के माध्यम में दिखाया जाता है। जिन सिनेमा प्रेमियों को कांतारा पसंद आयी थी उनको कल फिल्म के प्रोड्यूसर ने खुश-खबरी दी है कि कांतारा का दूसरा पार्ट यानी "कांतारा–2" भी आने वाला है, जिसमे पहले भाग में दिखाए भूता कोला परंपरा पर और ज्यादा रिसर्च कर, दूसरे पार्ट में भूता कोला की पौराणिक कथाओं को बड़े परदे पर दिखाएंगे लेकिन भारत देश विविधताओं का देश भी माना जाता है। भूता कोला जैसी और भी कई परंपराए है जो उसके जैसी ही विचित्र है।

जानते है कुछ ऐसी ही परंपराओं के बारे में:

गद्याची जात्रा/नृत्य–गोवा :

इस जात्रा का आयोजन गोवा राज्य में स्थित सल, बोरदे बिचोलिम, पिलगांव, कुडने, सवोई वेरेम नाम के गांव एवं इलाको में होता हैं। इस जात्रा में भूत और प्रेतों की पूजा की जाती है। यह जात्रा गोवा के शिगमो त्योहार का हिस्सा होता है जिसमे "देवनचार दैत्य" की पूजा की जाती हैं।

यह त्योहार गोवा का बसंत ऋतु त्योहार है जो होली पूर्णिमा यानी मार्च महीने में आम के पेड़ के नीचे मनाया जाता हैं। इस जात्रा में "गदे" नामक नृतक एवं कलाकार सफेद धोती में नृत्य कर भूत और प्रेत आत्माओं को बुलाते है इसके बाद देवनचार सभी नृत्य कर रहे गदो में प्रवेश करते है, जिसके बाद सारे गदो को जंगल के पास एक रोशनी दिखाई देती है जिसे "उजवाड़े" कहा जाता है।

माना जाता है यह रोशनी स्वयं देवनचार देवा उन्हें दिखाते है जिसके बाद सारे गदे जंगल में जाते है और देवनचार देवा के साथ लुकाछिपी खेलते है। गदो को जंगल में एक मंदिर दिखता है, जिसमे मशाले जल रही होती हैं। जितने भी गदे रोशनी की तलाश में जंगल जाते है उनमें से वापस सिर्फ कुछ ही आते है और वह अपने साथ एक मिट्टी की हांडी लेकर आते है जिसे "कुढ़ाई" कहा जाता हैं। लेकिन कुछ गदो को देवनचार छिपा देते है, जिनको ढूंढने के लिए वापस आए गदो को भेजा जाता है।

जब वह सब वापिस आते है तो सभी गदे कम से कम तीन दिनों तक होश में नहीं आते और ना ही उन्हें पिछले तीन दिन में जो भी हुआ है वो याद रहता हैं। इसके बाद सभी गदे शमशान में जाकर राख लेकर वापस आते है और उसे एक जगह में रखते है जिसे "मांडी" कहा जाता हैं।

जिसके बाद पारंपरिक गीतों और मंत्र उच्चारण के साथ इस त्योहार और जात्रा का अंत होता हैं। यह त्योहार कही ना कही "कांतारा" फिल्म में दिखाई गई कहानी से मेल खाता हैं। इस त्योहार और जात्रा को देखने महाराष्ट्र और कर्नाटक से भी लोग गोवा आते हैं।

थेय्यम नृत्य- केरल :

थेय्यम एक ऐसा नृत्य हैं जिसे उत्तरी केरल के सभी जातियों द्वारा आयोजित और प्रदर्शित किया जाता हैं। यह नृत्य बहुत हिस्सों में भूता कोला से समान हैं। ऐसा माना जाता है कि थेय्यम लोक नृत्य केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में हजारों सालों से होता आ रहा हैं।

थेय्यम नृत्य उत्तरी मालाबार के कसारगोड, कन्नूर, वायनाड के मनंतवाडी तालुक और कोझिकोड के कोयिलैंडी तालुक में मलयालम पंचांग के हिसाब से थुलम महीने यानी अक्टूबर व नवंबर महीने में मनाया जाता हैं। इस थुलम महीने में "थेय्यम देवा" को यह थेय्यम नृत्य समर्पित होता हैं।

थेय्यम नृत्य मंदिर के आंगन या उपवन में नृतक द्वारा किया जाता हैं। थुलम महीने में इस त्योहार और नृत्य में भाग लेने वाले समुदाय अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि थेय्यम नृत्य और त्योहार की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी।

थेय्यम नृत्य के कलाकार केरल के सबसे पुराने जन जातियों में से एक होते हैं। थेय्यम में भगवान शिव, भगवान विष्णु और माता भगवती की पूजा की जाती हैं। चेंडा, एलाथलम, कुरुमकुजल और विक्कुचेंडा जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल नृत्य में किया जाता हैं।

400 से अधिक अलग-अलग थेय्यम हैं, प्रत्येक का अपना संगीत, शैली और नृत्यकला है। इनमें सबसे प्रमुख हैं रक्षा चामुंडी, कारी चामुंडी, मुचिलोत्तु भगवती, वायनाडू कुलवेन, गुलिकन और पोट्टन। प्रत्येक कलाकार महान शक्ति वाले नायक का प्रतिनिधित्व करता है। कलाकार भारी मेकअप करते हैं और भड़कीले परिधान पहनते हैं। टोपी और आभूषण वास्तव में राजसी हैं और सभी को विस्मय और आश्चर्य की भावना से भर देते हैं।

थेय्यम नृत्य
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गरुड़न थुकम नृत्य- केरल और तमिल नाडु

गरुड़न थुकम नृत्य कला का एक रूप है जो दक्षिण भारत में मध्य तमिलनाडु और केरल के भद्रकाली यानी माता काली के मंदिरों में लोकप्रिय रूप से किया जाता है। मलयालम महीने मीनम यानी मार्च-अप्रैल के महीने में "मीना भरणी उत्सव" के दौरान अनुष्ठान किया जाता है। कोट्टायम में वडयार में एलामकावु देवी मंदिर, पल्लीक्कलकावु भगवती मंदिर, कोट्टायम, अलप्पुझा में पझावेदु मंदिर और एर्नाकुलम में अरयनकावु देवी मंदिर में यह उत्सव मनाया जाता हैं।

नृत्य के दौरान नृतक जिन्हे "गरुड़" कहा जाता है वह चील के रूप में जीवंत वेशभूषा और शानदार श्रृंगार के साथ शानदार हेडगेयर पहनकर तैयार होते हैं। पट्टुवाल, नजोरी, कचा, मुंडी, अस्थिमाला यानी आम के पेड़ की लकड़ी से बनी माला, चमारम यानी झूठे बाल, चिराकू यानी पंख, उत्तरीयम यानी ऊपरी वस्त्र, किरीदम यानी मुकुट, आदि का उपयोग पोशाक को पूरा करने के लिए किया जाता है। चेहरे के श्रृंगार के लिए केवल वेल्लमनायोला, चुवाप्पू, पच और माशिया जैसे प्राकृतिक रंजकों का उपयोग किया जाता है।

अपने ड्रेस-अप के साथ किए जाने के बाद, वे पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे चेंडा, एलाथलम, कोम्बु, आदि के साथ नृत्य करते हैं। प्रदर्शन में 18 थलवट्टम लयबद्ध पैटर्न शामिल हैं। बैलगाड़ियों या नावों या हाथ से खींची जाने वाली गाड़ियों पर जुलूस में ले जाए गए इन गरुड़ों के साथ पूरे अनुष्ठान को रंगीन ढंग से किया जाता है। आजकल इन्हें वैन या कारों में भी ले जाया जाता है।

पहले के दिनों में, कलाकारों की त्वचा पर लोहे के हुक लगाकर ठुक्कम आयोजित किया जाता था। उनके द्वारा बहाए गए रक्त को भक्तों द्वारा काली मंदिर के चारों ओर तीन बार ले जाया जाता था, जिसके बारे में उनका मानना था कि इससे देवी काली प्रसन्न होंगी। अब, त्वचा पर हुक लगाने की प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और ठुक्कम को 'कच्चा ठुक्कम' कहा जाता है।

ऐसा माना जाता है कि इस उत्सव और नृत्य की शुरुआत तब हुई थी जब मां काली ने राक्षस राजा दारिका को एक भयंकर युद्ध में मारा था। युद्ध के बाद भी मां काली असंतुष्ट, नाराज और प्यासी थी। उनके क्रोध से श्रृष्टि के विनाश का डर था। उस समय भगवान विष्णु ने मां काली की प्यास बुझाने के लिए अपने वाहन गरुड़ को काली के पास भेजा। गरुड़ ने मां काली को अपना रक्त पिलाकर उनकी की प्यास बुझाई और उसके बाद ही वह संतुष्ट हुई थी।

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