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भारत में कुपोषण का सामाजिक-आर्थिक और विकासात्मक प्रभाव

पूरी दुनिया में प्रत्येक बच्चा अपनी विकास क्षमता को हासिल कर सकता है, यदि उनका पालन सक्षम वातावरण में किया जाए और उनकी मां एवं देखभाल करने वाले लोग अनुशंसित स्वास्थ्य, भोजन का ठीक से पालन करें।

Kavita Singh Rathore

Kavita Singh Rathore

राज एक्सप्रेस। पूरी दुनिया में प्रत्येक बच्चा अपनी विकास क्षमता को हासिल कर सकता है, यदि उनका पालन-पोषण सक्षम वातावरण में किया जाए और उनकी मां एवं देखभाल करने वाले लोग अनुशंसित स्वास्थ्य, भोजन और देखभाल प्रथाओं का ठीक से पालन करें। अगर उन्हें ये सक्षम वातावरण उपलब्ध न कराया जाए और उचित प्रथाओं का पालन न किया जाए तो बच्चा कुपोषित हो जाता है। बाल कुपोषण मोटे तौर पर उस स्थिति को संदर्भित करता है, जिसमें ग्रहण किया जाने वाला भोजन शारीरिक क्रियाओं, विकास और बीमारियों की प्रतिरोधक क्षमता की जरूरतों को पूरा नहीं करता है।

कुपोषण एक सार्वजनिक समस्या :

पिछले तीन दशकों से बाल कुपोषण को रोकने और इलाज में पर्याप्त प्रगति हासिल करने के बावजूद, यह आज भी एक प्रमुख सार्वजनिक समस्या बनी हुई है। कुपोषण में कम वजन, अवरुद्ध विकास (जीर्ण कुपोषण), अपक्षय (गंभीर कुपोषण) और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी (आवश्यक विटामिन और खनिज) शामिल हैं। दुनियाभर में हर साल पांच साल से कम उम्र के लगभग 50 लाख बच्चों की मौत होती है, जिसमें से लगभग आधी मौत की वजह कुपोषण है।

कुपोषण के सभी प्रकार भारत में मौजूद :

महत्वपूर्ण आर्थिक विकास के बावजूद, भारत में कुपोषण के सभी प्रकार आमतौर पर पाए जाते हैं और दुनियाभर में कुपोषित बच्चों की सबसे बड़ी आबादी हमारे देश अर्थात भारत में है। यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित ‘दि स्टेट ऑफ दि वर्ल्ड चिल्ड्रन 2016’ रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में कम वजन वाले बच्चों की संख्या के मामले में भारत 10वें स्थान पर और अवरुद्ध विकास के मामले में 17वें स्थान पर है। किसी भी समय, भारत में 2.2 करोड़ अपक्षय बच्चे और 80 लाख से अधिक गंभीर अपक्षय बच्चे रहते हैं।

भारत में पांच साल से कम उम्र वाले बच्‍चों में कम वजन, अवरुद्ध विकास और अपक्षय की व्‍यापकता
भारत में पांच साल से कम उम्र वाले बच्‍चों में कम वजन, अवरुद्ध विकास और अपक्षय की व्‍यापकता

एक बच्‍चे के जीवन के पहले 1000 दिन :

गर्भाधान से लेकर दो साल की उम्र तक बच्‍चे के जीवित रहने, इष्‍टतम विकास, ज्ञानात्मक वृद्धि और आजीवन स्‍वास्‍थ्‍य को सुनिश्चित करने के लिए अवसरों की एक महत्‍वपूर्ण अवधि होती है। भ्रूण जीवन और जन्‍म के बाद पहले दो वर्ष के दौरान शारीरिक और मानसिक दोनों विकास बहुत तेजी से होता है। इस समय पोषण संबंधी आवश्‍यकताएं बहुत अधिक उच्‍च होती हैं और यदि बच्‍चा पोषक तत्‍वों की कमी का सामना करता है तो इसका उसके शारीरिक और मानसिक विकास पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है।

जन्‍म के समय अपक्षय की संभावना सबसे ज्‍यादा होती है, जिसमें मातृत्‍व कुपोषण, एनीमिया, घर के भीतर उच्‍च वायु प्रदूषण और अन्‍य सामाजिक कारकों का अधिक योगदान होता है। स्तनपान शुरू करने में देरी के रूप में निकृष्‍ट स्‍तनपान प्रथा, पहले छह माह के दौरान अपर्याप्‍त स्‍तनपान, पूरक भोजन शुरू करने में देरी, पूरक भोजन की खराब गुणवत्‍ता, भोजन में विविधता की कमी, बड़ा परिवार, खराब साफ-सफाई और बच्‍चे की अनुचित देखभाल जन्‍म के बाद कुपोषण के लिए जिम्‍मेदार कुछ महत्‍वपूर्ण कारक हैं।

सामान्य बच्चों की तुलना में मृत्यु दर अधिक :

कुपोषण से प्रभावित बच्चा एक महत्वपूर्ण नुकसान के साथ अपने जीवन की शुरुआत करता है। जो बच्चे गंभीर अपक्षय से ग्रसित हैं, उनमें डायरिया और निमोनिया जैसे सामान्य बाल्यावस्था संक्रमण के प्रति संवेदनशीलता अधिक होती है और सामान्य बच्चों की तुलना में इनके मामले में मृत्यु दर अधिक होती है। ये कुपोषित बच्चे बार-बार बीमार पड़ते हैं और स्वस्थ होने में अधिक समय लेते हैं। रुग्णता और मृत्यु दर के बढ़ते जोखिम के अलावा, कुपोषण विकास को अवरुद्ध करने, मनोसामाजिक वृद्धि और ज्ञानात्मक विकास को रोकने का काम करता है। ज्ञानात्मक हानि की तीव्रता का संबंध सीधे तौर पर गंभीर अवरुद्ध विकास और आयरन की कमी वाले एनीमिया से है। यह आगे चलकर शिक्षा हासिल करने और अपने परिवार और समाज के लिए आर्थिक योगदान करने की उनकी अंतिम क्षमता को प्रभावित करता है।

पांच निम्न-आय और मध्यम आय वाले देशों (ब्राजील, ग्वाटेमाला, भारत, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका) के समूह अध्ययन की समीक्षा में विक्टोरिया एट अल ने निष्कर्ष निकाला है कि, जन्म के समय छोटा आकार और बच्चे के अवरुद्ध विकास का संबंध छोटे कद के व्यस्क, दुबले-पतले शरीर, कम शिक्षा, बौद्धिक कामकाज में कमी, घटती आय और उस महिला से पैदा होने वाले नवजात के जन्म के समय कम वजन, जो स्वयं बच्चे की तरह अवरुद्ध विकास से पीड़ित है।

मार्टोरेल एट अल ने बताया :

मार्टोरेल एट अल ने बताया कि '24 महीने में अवरुद्ध विकास की समस्या स्कूली शिक्षा में 0.9 वर्ष की कमी के साथ जुड़ी है, इससे स्कूल की शुरुआत बड़ी उम्र से होती है और परिवर्ती कारक जैसे सेक्स, सामाजिक आर्थिक स्थिति और मातृत्व शिक्षा को नियंत्रित करने के बाद स्कूल में कम से कम एक कक्षा में फेल होने का जोखिम 16 प्रतिशत बढ़ जाता है। छोटा कद भी निम्न आर्थिक उत्पादकता से जुड़ा है। ब्राजील के एक अध्ययन से पता चला है कि, लंबे कद के पुरुष और महिला शिक्षा और अन्य कारकों पर नियंत्रण के बावजूद अधिक कमाते हैं।'

अध्ययन के अनुसार :

अध्ययन में कहा गया है कि लंबाई में 1 प्रतिशत की वृद्धि के परिणामस्वरूप वेतन में 2.4 प्रतिशत का इजाफा होता है। उपरोक्त अध्ययन से इस बात का पक्का सबूत मिलता है कि कुपोषण से मृत्यु दर बढ़ने का खतरा बढ़ता है और अनुपचार आर्थिक उत्पादकता को प्रभावित करता है।

बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है माँ का असर :

महिलाओं में यदि कुपोषण को रोका और उपचार नहीं किया गया तो इसका असर उनके बच्चे के स्वास्थ्य और जीवन पर पड़ता है। वैज्ञानिक प्रमाणों से पता चला है कि यदि पहले 2-3 वर्षों में कुपोषण का उपचार नहीं किया जाता है, तो बाद में सुधार अधूरा रहता है। इसका मतलब है कि गरीबी और कुपोषण के अंतरपीढ़ीगत संचरण को तोड़ने के लिए, जोखिम वाले बच्चों का उनके जीवन के पहले दो वर्षों के दौरान उपचार किया जाना चाहिए।

पोषण अभियान कार्यक्रम :

माननीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने पोषण अभियान नाम का एक नया कार्यक्रम लॉन्च किया है, जो बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण संबंधी परिणामों में सुधार करने के लिए भारत का एक प्रमुख कार्यक्रम है। पोषण अभियान एक लक्षित दृष्टिकोण और सम्मिलन के उपयोग के माध्यम से बच्चों में अवरुद्ध विकास, कुपोषण, एनीमिया और कम जन्म वजन के स्तर को कम करने का प्रयास है और यह किशोर लड़कियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं पर भी ध्यान केंद्रित करता है। इस प्रकार यह समग्र रूप से कुपोषण की समस्या से निपटता है।

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