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कामकाजी महिलाओं की राह जटिल
कामकाजी महिलाओं की राह जटिल|संपादित तस्वीर
राज ख़ास

कामकाजी महिलाओं की राह जटिल

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वे परिवार जो आर्थिक सुदृढ़ता को बनाए रखने के लिए महिला सदस्यों से नौकरी करने की अपेक्षा रखते हैं, वे उनके घरेलू दायित्वों को बांटना नहीं चाहते।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस, भोपाल। हाल ही में यह खबर आई है कि जापान में 28 फीसद महिलाओं ने बच्चों के लिए नौकरी छोड़ी और 50 हजार बच्चे दिनभर के लिए देखभाल वाले गृहों (डे-केयर) की प्रतीक्षा सूची में हैं। जापान में छोटे बच्चों की देखभाल के लिए इस तरह के गृहों को सरकार ही चलाती है, इसलिए सभी को सुविधा नहीं मिल पाती। ऐसे में कामकाजी माताओं के पास नौकरी छोड़ने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचता। यह स्थिति सिर्फ जापान की नहीं, लगभग सभी देशों की है। किसी भी संगठन में महिलाओं के नौकरी छोड़ने की घटना या संख्या में कमी आने को सामान्य तौर पर ‘लीकिंग पाइपलाइन’ कहा जाता है। इस विचार को सबसे पहले अमेरिका में कामकाजी महिलाओं की स्थिति की अर्थशास्त्री एन हुलिट ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएटिंग ए लाइफ: प्रोफेशनल वुमन एंड द क्वेस्ट फॉर चिल्ड्रन’ में चर्चा करते हुए कहा कि 40 की उम्र के पड़ाव पर पहुंचीं पेशेवर अमेरिकी महिलाओं में से 42 फीसद संतानहीन थीं लेकिन उनमें से 14 फीसद ने ही यह फैसला लिया था। कारण स्पष्ट था कि पारिवारिक दायित्व कैरियर में रुकावट न बने।

भारत में तो स्थितियां ज्यादा गंभीर हैं। एक और तथ्य सामने आया है कि जो महिलाएं नियमित तौर काम कर रही हैं उनके बच्चों की संख्या भी कम है। ऐसी महिलाओं की प्रजनन दर 10 साल पहले 3.3 फीसद थी, जो अब घट कर 2.9 फीसद तक आ गई है। वहीं गैर कामकाजी महिलाओं की प्रजनन दर 3.1 फीसद के स्तर पर बनी हुई है। ये आंकड़े बता रहे हैं कि कामकाजी महिलाएं दबाव में हैं। पर क्या यह किसी भी समाज के लिए अच्छी स्थिति कही जा सकती है? अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ ने 1919 में अपनी स्थापना के बाद से संस्थागत नौकरियों में महिलाओं की सहभागिता को अपनी प्रस्तावना में शामिल किया था। इसके सौ साल बाद अप्रैल-2019 में आईएलओ ने दुनिया भर में कामकाजी महिलाओं के बारे में जारी विस्तृत रिपोर्ट में हैरान करने वाले तथ्य सामने रखे हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2005-2015 के बीच ‘मदरहुड एंप्लॉयमेंट पेनल्टी’ यानी मां बनने की वजह से नौकरी नहीं कर पाने की संभावना में 38.4 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

इस तथ्य की पुष्टि हाल में एक शोध से हुई है। ब्रिटेन में एक शोध में पाया गया है कि कार्यस्थल पर हर पांचवीं गर्भवती और नई बनी मां से काम के दौरान भेदभाव किया जाता है। अमेरिका की फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि कामकाजी माता के साथ भेदभाव की खबरों के चलते गर्भवती महिलाएं भयभीत हैं और उन्हें अपनी नौकरी जाने का डर सताता है। इन स्थितियों में अमूमन यह तर्क दिया जा सकता है कि जब दुनिया के सभी देशों में मातृत्व अवकाश मिलता है तो यह डर क्यों? यह सच है कि लगभग सभी देश कामकाजी महिलाओं को मातृत्व अवकाश देते हैं, मगर हकीकत यह है कि अधिकतर निजी संस्थान अपने यहां गर्भवती महिलाओं के सामने ऐसे हालात पैदा कर देते हैं जिससे उन्हें नौकरी छोड़ने को मजबूर किया जा सके। पेशेवर एवं प्रबंधकीय पदों पर काम करने वाली महिलाओं से मां बनने के बाद भी उम्मीद की जाती है कि वे सुबह जल्दी दफ्तर पहुंचें और देर तक रुकें। जहां तक मातृत्व अवकाश का प्रश्न है, उसके साथ भी अनेक जटिलताएं देखने में आती हैं। साल 2017 में मातृत्व प्रसूति लाभ अधिनियम (संशोधित) लागू होने के बाद से ही कंपनियां महिलाओं को रखने में कतराने लगी हैं।