अफगानिस्तान में तैनात 2500 अमेरिकी सैनिकों को 11 सितंबर तक वापसी का आदेश
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अफगानिस्तान में तैनात 2500 अमेरिकी सैनिकों को 11 सितंबर तक वापसी का आदेश

अमेरिका ने अफगानिस्तान से सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। अमेरिका अभी अफगानिस्तान में 7 जगहों पर मजबूती से बैठा है। रणनीति के तहत वो केवल सेना को वापस बुला रहा है।

तालिबान के खिलाफ 20 साल तक जंग लडऩे के बाद अब अमेरिकी सैनिक जल्द अफगानिस्तान छोड़ देंगे। अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपने सभी सैनिक वापस बुलाने का ऐलान कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफगानिस्तान में तैनात 2500 अमेरिकी सैनिकों को 11 सितंबर तक वापसी का आदेश दिया है। अमेरिका ने तालिबान को उखाड़ फेंकने के लिए 2001 में अफगानिस्तान के अंदर अपने सैनिक भेजे थे। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी लिंकन और रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन नाटो में शामिल देशों को भी इसकी जानकारी देंगे। अमेरिका अपने सैनिकों को 9/11 हमले की 20वीं बरसी के पहले वापस बुलाना चाहता है। अमेरिका की बाइडेन सरकार ने कई हतों पहले ही इस फैसले के संकेत देने शुरू कर दिए थे। इस समय अफगानिस्तान में 7 हजार से ज्यादा सैनिक तैनात हैं। इनमें से ज्यादातर नाटो (नॉर्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) के हैं। पिछले एक साल में तालिबानियों ने कई अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाया है।

तालिबानी अफगानिस्तान की सेना पर भी आए दिन हमले करते रहते हैं। इससे पहले ट्रंप सरकार ने अफगानिस्तान से एक मई को अमेरिकी सैनिकों के लौटने की डेडलाइन तय की गई थी। अमेरिका चाहता था कि तालिबानियों के साथ शांति का समझौता हो जाए। इसके लिए यूएस, तुर्की में यूएस के दखल से एक बैठक के लिए जोर लगा रहा था। अमेरिका ने भी एक प्रस्ताव तैयार किया था। इसमें तुरंत एक नए लीगल सिस्टम को बनाने का जिक्र था, जिसमें तालिबानियों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। लेकिन गनी ने उसे खारिज कर दिया था। अलकायदा के 9/11 हमले के बाद साल 2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान में सेना उतारी थी। इस युद्ध में अमेरिका ने 2400 सैनिकों को खोया है। साथ ही इस युद्ध पर अमेरिका ने 2 ट्रिलियन डॉलर यानी 150 लाख करोड़ रुपए के करीब खर्च किए हैं। मई 2011 में अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया लेकिन न तो तालिबान को खत्म कर पाया और न ही अफगानिस्तान में शांति स्थापित कर पाया है।

अमेरिका के सेना वापस बुलाने के फैसले से एशिया की शांति पर खासा फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि अब तालिबान पहले की तरह मजबूत नहीं है। ये तो तय है कि पाकिस्तान पूरी तरह से तालिबान को मदद करेगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वापसी के बाद अमेरिका का रोल किस तरह का रहेगा। तालिबान ने हरकत की तो अमेरिका एयर अटैक जैसे कदम उठाएगा। रही बात भारत की तो इससे न नुकसान है और न फायदा। भारत तो अफगानिस्तान की हर तरह से मदद कर रहा है। हम अफगानिस्तान की सेना को ट्रेनिंग भी दे रहे हैं। भारत आगे मदद के लिए अपने सैनिक भी भेज सकता है। भारत के नजरिए से शांति रहे तो बेहतर है, क्योंकि पाक और तालिबान पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

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