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पाक को झटका
पाक को झटका|Neha Shrivastava - RE
राज ख़ास

पाक को झटका, भारत चौकन्ना

अमेरिका के अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत नहीं करने के फैसले को पाकिस्तान के लिए एक और मोर्चे पर बड़ा झटका माना जा रहा है।

राज एक्सप्रेस

राज एक्सप्रेस

राज एक्सप्रेस। अमेरिका के अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत नहीं करने के फैसले को पाकिस्तान के लिए एक और मोर्चे पर बड़ा झटका माना जा रहा है। भारत समेत इस क्षेत्र के अन्य देशों के लिए यह राहत भरी खबर है। भारत का मानना है कि इस बातचीत के टूटने के बाद इस क्षेत्र में शांति व स्थायित्व आएगा। इस बातचीत के खत्म होने के बाद पाकिस्तान के जिहादी मंसूबे पर भी पानी फिर गया है। भारत और अफगानिस्तान समेत इस क्षेत्र के कई देशों का मानना था कि तालिबान संग बातचीत सही नहीं है।

हालांकि रूस तालिबान से बातचीत का पक्षधर रहा है और उसने फरवरी और मई में 2 बैठकें भी की थीं। रूस का मानना था कि, ISIS को अफगानिस्तान से बाहर रखने के लिए यह वार्ता बेहद जरूरी है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान संग वार्ता से पीछे हटने की वजह गुरुवार को काबुल में हुए एक तालिबान हमले को बताई है जिसमें एक अमेरिकी सैनिक समेत 12 लोग मारे गए। इस बातचीत में इस सप्ताहांत मैरीलैंड के कैंप डेविड में तालिबान के साथ होने वाली गुप्त बैठक भी शामिल थी। हालांकि, तालिबान ने अपने बयान में ट्रंप द्वारा बताई गई वजह को खारिज कर दिया और कहा कि उसमें न तो अनुभव और न ही धैर्य झलकता है।

भारत को अंदेशा था कि, पाकिस्तान, तालिबान और अमेरिका के बीच डील के कारण इस क्षेत्र में अशांति आ सकती है। अगर अमेरिका तालिबान से बात करके इस क्षेत्र से निकलता तो दो बातें हो सकती थीं। पहला, अफगानिस्तान में एक बार फिर से गृह युद्ध हो सकता था और दूसरा, पाकिस्तान अपने जिहादियों को भारत खासकर कश्मीर भेजने की कोशिश करता। भारत को यह भी डर था कि अफगानिस्तान में सोवियत संघ के बाद वाली स्थिति पैदा हो सकती है और कश्मीर में भी इसका असर हो सकता है। अफगान सरकार ने यह कहा था कि यह समझौता जल्दबाजी में हो रहा है। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने एक बयान में कहा, बेगुनाह लोगों की हत्या करने वाले समूह से शांति समझौता करना निरर्थक है।

अमेरिका और तालिबान के बीच सैद्धांतिक रूप से इस बात पर सहमति बन गई थी कि अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी फौज वापस बुला लेगा। इसके बावजूद काबुल में घातक हमलों की संख्या बढ़ गई है। इससे अमेरिका के राष्ट्रपति चिढ़ गए हैं और उन्होंने तालिबान के साथ फिलहाल अपनी बातचीत बंद कर दी है। पिछले 18 साल में भारत के किसी भी सरकार ने तालिबान के साथ कोई बातचीत नहीं की। ट्रंप ने तालिबान से वार्ता रद्द करने की घोषणा उस दिन की जब पाक, चीन व अफगानिस्तान के विदेश मंत्री इस्लामाबाद में अमेरिका-तालिबान शांति समझौते के बाद की स्थिति पर विचार कर रहे थे। अमेरिका के इस फैसले से पाक और चीन को झटका लगा है।

पिछले कुछ महीनों से पाक इस बातचीत को लेकर काफी उत्साहित था। पश्चिम के देशों का मानना था कि पाक ही तालिबान को बातचीत की टेबल पर लाया है। इधर, इस्लामाबाद ने तालिबान के को-फाउंडर मुल्ला बारादर को जेल से रिहा कर दिया था ताकि वह दोहा में बातचीत में शामिल हो सके। पाकिस्तान इस बात पर जोर देता रहा था कि काबुल की सहसमीकरण में तालिबान का होना जरूरी है और इससे शांति आएगी। इससे पहले पाकिस्तान के समर्थन से उपजे तालिबान ने अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार से बातचीत को इनकार कर चुका था। पाक का अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर भाग लेने को उसके कश्मीर पर दबाव की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा था।

हाल के दिनों में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ परमाणु युद्ध का हौवा खड़ाकर कहा कि इससे अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया में खलल पड़ सकती है। लेकिन अब ट्रंप की घोषणा के बाद पाकिस्तान के झूठ का पर्दाफाश हो गया है।ट्रंप की बातचीत रद्द करने की घोषणा के बाद पाक ना केवल अपने जिहादी मोर्चे पर मात खाया है बल्कि वॉशिंगटन से उसे मिल रहा तरजीह भी खत्म हो गया है। इससे कश्मीर में भारत के खिलाफ उसकी नापाक कोशिशों पर भी बेहद बुरा असर पड़ा है। गत सोमवार को 8वें दौर की बातचीत के बाद अफगानिस्तान में अमेरिका के विशेष दूत जैलमे खलीलजाद ने कहा था कि बातचीत में समझौते के तकनीकी डिटेल पर बातचीत हुई है। बाद में दिए गए अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि समझौते के बाद अमेरिका 135 दिनों में अफगानिस्तान से अपने 5,400 से ज्यादा सैनिकों को हटा लेगा।

हालांकि दोनों पक्षों में यह कोई भी यकीन के साथ यह नहीं कह सका था कि यह कैसे होगा। ट्रंप की पीछे हटने की घोषणा के बाद तालिबान ने कहा कि, इससे सबसे ज्यादा नुकसान वॉशिंगटन को होगा लेकिन वह भावी वार्ता के लिए द्वार खुला छोड़ता है। तालिबान की ओर से ट्विटर पर जारी बयान में उसके प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा, हम अब भी..विश्वास करते हैं कि अमेरिकी पक्ष को यह समझ में आएगा। पिछले 18 सालों से हमारी लड़ाई ने अमेरिकियों के लिए साबित कर दिया है कि जबतक हम उनके कब्जे का पूर्ण समापन नहीं देख लेते तब तक हम संतुष्ट नहीं बैठेंगे। तालिबान की तरफ से अमेरिका को सीधी चेतावनी भी दी गई है, जो उसकी हताशा को ही दिखाता है।

तालिबान का कहना है कि इससे अमेरिका को बड़ा नुकसान होगा और अब ज्यादा अमेरिकियों की जान जाएगी। तालिबान का कहना है कि अमेरिका के लिए ये भारी पड़ने वाला है, इससे अमेरिका की छवि पर असर होगा, लोगों की जान जाएगी और शांति भंग होगी,अफगानिस्तान के दक्षिणी और पूर्वी राज्यों के ग्रामीण इलाके तालिबान के कब्जे में हैं। इन राज्यों में अफगानिस्तान प्रशासन शहरों तक ही सीमित है। इसी मजबूरी में अमेरिका ने तालिबान से शांति वार्ता शुरू की। तालिबान को शांति वार्ता की मेज पर लाने के लिए रूस और चीन पहले से ही सक्रिय थे।बता दें कि कई महीनों से कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते को लेकर बातचीत चल रही है।

हालांकि तालिबान अफगान सरकार से भी बातचीत करने पर अड़ा था जिसे वह अमेरिका की कठपुतली समझता है। हालांकि, वार्ता रद्द होने के बाद भारत कुछ ज्यादा ही चौकन्ना हो गया है। वह इसलिए क्योंकि तालिबान का झुकाव पाक की ओर ज्यादा रहता है और वह उसके इशारे पर तालिबान, भारत-अफगान व्यापार को प्रभावित कर सकता है। अफगानिस्तान में भारत ने बड़ा निवेश कर रखा है। अफगानिस्तान की संसद को भी भारत के सहयोग से बनाया गया है जिसमें राजस्थान का पत्थर लगा है। भारत को अंदेशा है कि पाकिस्तान अफगान आतंकियों का इस्तेमाल कश्मीर में कर सकता है और आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है। भारत को लगता है कि अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाता है तो तालिबान मजबूत होगा ।