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महात्मा गांधीजीे की 150वीं जन्मतिथि पर विशेष
महात्मा गांधीजीे की 150वीं जन्मतिथि पर विशेष|Syed Dabeer Hussain - RE
राज ख़ास

देश के लिए ही जीते थे 'गांधी'

आज देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी की 150वीं जन्मतिथि पर उनके आदर्शो को याद किया जा रहा है , लेकिन क्या गांधी जी के सत्य,अहिंसा जैसे विचारों को युवा अपनाएंगे?

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस। महात्मा गांधी अंग्रेजों से लड़ने के अपने अनोखे तरीकों के लिए जाने जाते थे। उनकी विचारधारा दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों से अलग थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया था, जबकि वे विदेशों में रहे थे। उच्च शिक्षा भी उनकी विदेशों में हुई थी और वे देश के जाने-माने वकील भी थे। गांधीजी के काम करने व कराने के तरीके अहिंसावादी थे। वे हमेशा व्यक्ति, समाज एवं देश के लिए ही जीते थे।

उनके विचारों में सत्य, अहिंसा, सादगी और नैतिकता आदि अंतर्निहित थे। वे चाहते थे कि स्वावलम्बन, सहअस्तित्व, सहयोग, सहभाव और समभाव आदि पर आधारित समाज का निर्माण किया जाए। गांधीजी सत्याग्रह के हिमायती थे, जिसके तहत वे हमेशा अन्याय, अत्याचार, भ्रष्ट एवं शोषणयुक्त व्यवस्था से असहयोग सुनिश्चित करने की ही कोशिश करते थे। गांधीजी की विचारधारा पर अमल करके व्यक्ति, समाज एवं देश की दशा व दिशा में परिवर्तन लाया जा सकता है। गांधीजी का कथन ‘प्रकृति हमारी जरूरतों को तो पूरा कर सकती है, लेकिन हमारे लालच को नहीं’ को जीवन में उतारकर समस्याओं का समाधान स्वत: स्फूर्त तरीके से किया जा सकता है।

कार्य और विचारों में ईमानदारी लाकर, सत्य पर अडिग रहकर, भ्रष्टाचार से बचकर, लोकहित में कार्य करके, निरंकुश राजसत्ता पर अंकुश लगाकर, नए समाज का निर्माण करके और स्वयं को बेहतर बनाने आदि के माध्यम से मौजूदा स्थिति में निश्चित रूप से बदलाव लाया जा सकता है, लेकिन आज केवल महापुरुषों के जन्मदिन और पुण्यतिथियों पर बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं। सभी उनके आदर्शो पर चलने की बात करते हैं, पर दूसरे दिन उसे बिसार देते हैं। देखा जाए तो बीते सालों में आर्थिक संदर्भ में भारत की महत्ता में काफी इजाफा हुआ है, जिसके कारण फायदे के लिए सभी देश भारत के साथ कारोबारी रिश्ते रखना चाहते हैं। भारत का बाजार बहुत ही बड़ा है। कारोबार व लाभ की यहां जबर्दस्त गुंजाइश है। आज की तारीख में कोई भी देश अपने आर्थिक हितों की अनदेखी नहीं कर सकता है। गांधीजी की लड़ाई उपनिवेशवाद से थी, पर आज उपनिवेशवाद का स्वरूप बदल गया है। आर्थिक उपनिवेशवाद गुलामी की ही नवीनतम तकनीक है, जिसके जरिए अब विकसित देश विकासशील अथवा अल्पविकसित देशों की व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले रहे हैं।

इस कार्य को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद से किया जा रहा है। विकसित देशों के निर्देशों पर ही विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष एवं विश्व व्यापार संगठन भारत जैसे देशों को आर्थिक रूप से गुलाम बनाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। गांधीजी ने आत्मनिर्भरता पर जोर दिया था। वे चाहते थे कि देश के युवा आत्मनिर्भर बनें और अपनी जरूरतों को आंतरिक संसाधनों से पूरा करें। इसके लिए चरखे की मदद से गांव-गांव में कपड़े बुनने के लिए गांधीजी ने आंदोलन चलाया था। युवाओं को आंदोलन में शामिल करने के लिए गांधीजी ने उन्हें प्रेरित किया था, ताकि दूसरों पर निर्भरता कम हो। विदेशी वस्तुओं का उपयोग कम से कम किया जाए। महात्मा गांधी चाहते थे कि सभी राष्ट्रों का स्वतंत्र अस्तित्व हो और एक देश दूसरे देश पर किसी चीज के लिए मोहताज नहीं रहे। गांधीजी चाहते थे कि सभी लोग स्वदेशी सामानों का उपयोग करें। हालांकि, महात्मा गांधी यह नहीं चाहते थे कि लोग अपनी आंख व कान बंद रखें। उनके मुताबिक, आवाम को मस्तिष्क के दरवाजे तो हमेशा खुले ही रखने चाहिए। भारत में सभी देशों की संस्कृतियों का मुक्त प्रवाह हो, लेकिन हम अपनी संस्कृति को नहीं भूलें। हमारा देश नदी की तरह होना चाहिए, जिसमें दूसरी नदियां भले ही समाहित हों, लेकिन उसका मूल स्वभाव बरकरार रहे। बीते सालों में गांधी दर्शन या गांधी जी के विचारों के कुछ हिस्से जरूर अप्रासंगिक हुए हैं, मगर उनके दर्शन को खारिज नहीं किया जा सकता है। गांधीजी चाहते थे कि देश आत्मनिर्भर हो। भारत विकासशील देश है और वह बहुत से मामलों में दूसरों पर निर्भर है। उदाहरण के तौर पर कच्चे तेल के लिए भारत दूसरे देशों पर ही निर्भर है। बुनियादी क्षेत्रों को विकसित करने और लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए भी भारत दूसरे देशों पर निर्भर है। हम अपनी जरूरत को पूरा करने लायक अनाजों का उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं। तकनीक एवं प्रौद्योगिकी में भी हम बहुत पीछे हैं।

विश्व के कुछ देशों में आज भी गांधीवादी तकनीकों का आंशिक रूप से प्रयोग किया जा रहा है। सांप्रदायिक कट्टरता और आतंकवाद के संदर्भ में गांधीजी के विचार आज भी सार्थक हैं। गांधी जी की नजरों में सभी धर्म एक समान हैं। सभी को सभी धर्मों का समान रूप से आदर करना चाहिए। सच कहा जाए तो गांधीजी का दर्शन अनुशासन, सत्य, प्रेम एवं न्याय पर आधारित है, जिनकी उपयोगिता वर्तमान दौर में भी कमोबेश बनी है, जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र संघ गांधीजी के जन्मदिन को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाता है। कहा जा सकता है कि हर साल गांधी जयंती दो अक्टूबर को धूमधाम से मनाई जाती है। उनके विचारों एवं दर्शनों की सार्थकता पर बहस-मुसाहिब किए जाते हैं। देश में उनके विचारों को अमल में लाने की बात कही जाती है, हकीकत में गांधीजी के दर्शनों को अमलीजामा पहनाने के लिए लोग क्रियाशील नहीं होते हैं। अत: हमें गांधीजी के विचारों को आत्मसात करना ही होगा। गांधीजी द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलकर पूरा विश्व अपना कल्याण कर सकता है और शांति के साथ रह सकता है। महात्मा गांधी को दुनिया भर में अहिंसा के पुजारी के तौर पर देखा जाता है। यों अहिंसा का मूल्य गांधी के बहुत पहले से चला आ रहा था, पर गांधी की विशेषता यह थी कि उन्होंने अहिंसा को केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे प्रतिकार के साधन के तौर पर विकसित किया। दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई जीतने के बाद वे भारत आए और यहां अहिंसा या सत्याग्रह के प्रयोग का फलक और बड़ा हो गया।

महात्मा गांधी अंग्रेजों से लड़ने के अपने अनोखे तरीकों के लिए जाने जाते थे। उनकी विचारधारा दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों से अलग थी। अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ क्रूर व्यवहार किया। आहत और क्रोध की भावना से भरे, उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को बाहर निकालने के लिए आक्रामक साधनों का सहारा लिया। हालांकि, महात्मा गांधी ने पूरी तरह से अलग तरीका चुना जिससे दूसरों को आश्चर्य हुआ। एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में, महात्मा गांधी ने आक्रामक तरीके से लड़ने के बजाय शांति और अहिंसा का मार्ग अपनाया। विभिन्न आंदोलनों और विरोधों का आयोजन किया, लेकिन सभी शांतिपूर्ण तरीके से। उसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति आपको एक गाल पर थप्पड़ मारे तो उसे थप्पड़ मारने के बजाय आपको उसे दूसरा गाल भी भेंट करना चाहिए। गांधीजी के अंग्रेजों से लड़ने के तरीके वास्तव में प्रभावी थे। कई अन्य स्वतंत्रता सेनानी उनकी विचारधाराओं से प्रेरित थे और उनका अनुसरण करते थे। उसकी हरकतों का समर्थन करने के लिए लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई भारतीय नेताओं ने भाग लिया और उनमें से प्रत्येक के लिए हमारे मन में बहुत सम्मान है। यह उनके संयुक्त प्रयासों के कारण था कि हमने स्वतंत्रता प्राप्त की। हालांकि, किसी ने भी महात्मा गांधी जैसे भारतीय नागरिकों के दिमाग पर कोई असर नहीं डाला। इसीलिए गांधीजी को सही मायने में राष्ट्रपिता कहा जाता है।