हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के बीच "गंगा नदी" का जल पीने और नहाने योग्य नहीं
हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के बीच "गंगा नदी" का जल पीने और नहाने योग्य नहीं|Social Media
राज ख़ास

हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के बीच "गंगा नदी" का जल पीने और नहाने योग्य नहीं

एनजीटी ने गंगा नदी की स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के उन्नाव शहर के बीच गंगा का जल पीने और नहाने योग्य नहीं है।

राज एक्सप्रेस

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गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए करीब तीस साल पहले गंगा कार्य योजना तैयार की गई थी। इस योजना के तहत अब तक अरबों रुपए खर्च किए जा चुके हैं पर स्थिति यह है कि गंगा दिन पर दिन गंदी ही होती गई है। मौजूदा सरकार ने गंगा नदी की सफाई के लिए एक अलग से मंत्रालय तक गठित किया। गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिया गया है, पर इसकी सफाई को लेकर सरकारें कितनी संजीदा हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एनजीटी के जवाब तलब करने पर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन यानी एनएमसीजी ने हलफनामा दायर करके बताया कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सरकारों ने समुचित जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई हैं, जिससे दूसरे और तीसरे चरण यानी कानपुर से बक्सर और फिर बक्सर से गंगासागर तक की कार्ययोजना की रूपरेखा तैयार करने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने इसके लिए एनएमसीजी को फटकार लगाई है। इसके साथ ही उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वे प्रमुख स्थलों पर गंगा जल की गुणवत्ता की जानकारी अब हर महीने सार्वजनिक करें।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण इस तरह की फटकार पहले भी कई मौकों पर लगा चुका है, मगर राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के कार्य-व्यवहार में किसी तरह का खास बदलाव नजर नहीं आया है। हालांकि, हरित अधिकरण ने अपने ताजा निर्देश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि एनएमसीजी का गठन गंगा नदी के कायाकल्प के लिए ही किया गया है और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के साथ समन्वय उसकी जिम्मेदारी है। अब उसे कोई टाल-मटोल नहीं सुननी। अगर अगले माह तीस अप्रैल तक गंगा कार्य योजना की रूपरेखा पेश नहीं की गई तो वह सख्त कदम उठाने को भी बाध्य होगा। इसके लिए संबंधित दोषी राज्य सरकारों को पर्यावरण क्षति का भुगतान करना पड़ सकता है। देखना है, अधिकरण के इस सख्त रुख का राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों पर कितना और कैसा असर पड़ता है।

प्रयाग में कुंभ के दौरान गंगा नदी में मिलने वाली गंदगी को रोकने में बड़ी कामयाबी देखी जा चुकी है। हरित अधिकरण ने कहा है कि प्रयाग में आजमाए गए तकनीकी उपायों का अध्ययन कर इस अभियान में लगे विशेषज्ञों से भी परामर्श लिया जा सकता है। दरअसल, राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नदियों की सफाई को लेकर कभी गंभीर नहीं दिखे। इसमें उनके टाल-मटोल भरे रवैए की कुछ वजहें दूसरी भी हो सकती हैं। गंगा नदी की सफाई के लिए उन्हें न सिर्फ यह बताना होगा कि कहां-कहां किन स्रोतों से कचरा गंगा नदी में आकर मिलता है, बल्कि उन स्रोतों को बंद कराने में भी सक्रिय भागीदारी करनी होगी। छिपी बात नहीं है कि गंगा के प्रदूषित होने का एक बड़ा कारण शहरों के रिहायशी इलाकों से निकलने वाले जल-मल और औद्योगिक इकाइयों के रासायनिक कचरे को बिना शोधित किए गंगा नदी में गिरने देना है। औद्योगिक इकाइयों को कई बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं कि वे बिना शोधन के औद्योगिक कचरा नदियों में न मिलने दें। इसी तरह शहरी जल-मल के शोधन के लिए जगह-जगह जल-मल शोधन संयंत्र लगाए जाने चाहिए। मगर बड़ी औद्योगिक इकाइयों की राजनीतिक और प्रशासनिक नजदीकी की वजह से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आंखें बंद किए रहते हैं। इसी तरह गंगा के तटों पर किए गए अतिक्रमण हटाने को लेकर मुश्किलें हैं। समझना मुश्किल है कि गंगा जैसी नदियों, जो लोगों की आस्था से जुड़ी हैं, उनमें कचरा मिलने से रोकना इतना मुश्किल क्यों बना हुआ है। यह काम काफी पहले हो जाना चाहिए था।

गंगा नदी की सफाई को लेकर राज्य सरकारें किस हद तक उदासीन हैं, इसका पता क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया’ के एक सर्वे से चल जाता है। सर्वे के मुताबिक, देश के 97 में से 66 कस्बों का कम- से-कम एक नाला गंगा नदी में खुलता है। इनमें से 31 पश्चिम बंगाल में ही थे। गंगा की सबसे बुरी हालत पश्चिम बंगाल में है। पश्चिम बंगाल में गंगा से सटे करीब 40 कस्बों के 78 फीसदी नाले सीधे नदी में गिरते हैं। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है, जहां गंगा के किनारे स्थित 21 कस्बों के नाले का पानी गंगा नदी में गिरता है। यह सर्वेक्षण एक दिसंबर 2018 से शुरू किया गया था। इस सर्वे में मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर द्वारा फोकस किए गए चार प्राथमिकता वाली जगहों पर फोकस किया गया। सर्वे में सफाई तथा सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सर्विस, ड्रेनेज सिस्टम और स्थानीय स्तर पर बने सॉलिड वेस्ट प्लांट को शामिल किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, गंगा बेसिन के केवल 19 कस्बों में एक में यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट प्लांट मौजूद था। 33 कस्बों के एक घाट पर ठोस कचरा मौजूद है। इसके अलावा 72 कस्बों में पुराने डंप साइट्स हैं। सर्वे में सामने आए ये सारे तथ्य बताते हैं कि अगर राज्य सरकारों ने गंभीरता दिखाई होती, तो गंगा नदी की यह हालत कतई न होती।

देखा जाए, तो देशभर में लगभग सभी नदियां इस समय गंदगी से प्रभावित हैं। नदियों में हर तरह का कूड़ा और गंदगी अभी भी डाली जा रही है। कहीं धर्म के नाम पर नदियों में रोज कुछ न कुछ डाला जा रहा है तो कहीं मौज में लीन लोग नदी में पिकनिक के दौरान कूड़ा डाल रहे हैं। वहीं राज्यों के सीवर का गंदा पानी भी अभी तक नदियों में जाने से नहीं रोका गया है। हालांकि, केंद्र सरकार नदियों को साफ करने के लिए कई तरह की परियोजना चला रही है। ऐसी ही एक परियोजना है नमामि गंगे जो भारत में पवित्र माने जाने वाली नदी गंगा की सफाई के लिए शुरू की गई। इस परियोजना के लिए सरकार बड़ी धनराशि भी खर्च कर रही है। लेकिन फिर भी गंगा की सेहत सुधरने की बजाय बिगड़ रही है। पिछले साल ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के एनजीओ वर्ल्ड वाइड फंड यानी डल्यूडल्यूएफ ने गंगा को दुनिया की सबसे संकटग्रस्त नदी बता दिया। हालांकि, यह गंगा में बढ़ती गंदगी के कारण नहीं कहा गया है।

एनजीओ ने कहा कि गंगा विश्व की सबसे अधिक संकटग्रस्त नदी इसलिए कही जा रही है क्यूंकि सभी दूसरी भारतीय नदियों की तरह गंगा में भी लगातार पहले बाढ़ और फिर सूखे की स्थिति पैदा हो रही है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा दिया गया गंगा के लिए ऐसा बयान सरकार के लिए बेहद बड़ा झटका है। एक रिपोर्ट के मुताबिक गंगा नदी में सबसे ज्यादा गंदगी ऋषिकेश से जाती है। वहां गंगा किनारे लगातार बस्तियां बसाई जा रही। वहां बसाई गई बस्तियों चन्द्रभागा, मायाकुंड, शीशम झाड़ी में शौचालय भी नहीं हैं। यही कारण है कि वहां की सारी और हर तरह की गंदगी गंगा में मिल रही है। वहीं कानपुर की ओर 400 किमी उलटा जाने पर भी गंगा नदी की दशा बेहद खराब है।

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