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मॉब लिंचिंग की घटना पर संघ प्रमुख मोहन भागवत
मॉब लिंचिंग की घटना पर संघ प्रमुख मोहन भागवत|Pankaj Baraiya - RE
राज ख़ास

मॉब लिंचिंग पर सख्ती जरूरी

मॉब लिंचिंग की घटना पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सवाल उठाते हुए पूरे समाज से इसे रोकने को कहा है।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस। संघ प्रमुख की तरफ से इस तरह की प्रतिक्रिया पहली बार नहीं आई है। प्रधानमंत्री भी इस पर नाराजगी जता चुके हैं। अत: अब इसका निवारण करना ही होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि मॉब लिंचिंग एक पश्चिमी निर्मिति है, देश को बदनाम करने के लिए भारत के संदर्भ में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। विजयादशमी के मौके पर नागपुर में संघ मुख्यालय में स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘लिंचिंग’ शब्द की उत्पत्ति भारतीय लोकाचार से नहीं हुई। इस तरह की घटनाओं से संघ का कोई लेना-देना नहीं है और इन्हें रोकना हर किसी की जिम्मेदारी है। कानून-व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन कर हिंसा की प्रवृत्ति समाज में परस्पर संबंधों को नष्ट कर अपना प्रताप दिखाती है। यह प्रवृत्ति हमारे देश की परंपरा नहीं है, न ही हमारे संविधान में यह है। कितना भी मतभेद हो, कानून और संविधान की मर्यादा में रहें। संघ प्रमुख ने जो कहा है वह अपनी जगह सही है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में ऐसे कृत्यों के लिए स्थान नहीं है, न ही वह इनको किसी तरह से जायज ठहराती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि, भारतीय समाज इधर इस बीमारी से ग्रस्त हो गया है। मॉब लिंचिंग की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। लोग जिस तरह की क्रूरता दिखा रहे हैं, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता की बात होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई बार मॉब लिंचिंग की कड़ी निंदा कर चुके हैं और राज्य सरकारों से ऐसी घटनाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने को कह चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर कड़ी टिप्पणी की है। लेकिन इन सबके बावजूद ऐसी घटनाएं होती जा रही हैं तो इससे यही पता चलता है कि हमारी कानूनी एजेंसियां ऐसी घटनाओं को लेकर पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखा पाई हैं। जनता के एक हिस्से के साथ ही कानून-व्यवस्था से जुड़े लोगों में भी कहीं न कहीं यह बात घर कर गई है कि लिचिंग कुछ हद तक जायज है। हाल ही में पुलिस के बीच कराए गए एक सर्वे से पता चला कि पुलिसकर्मी भी गोहत्या के आरोपियों की मॉब लिंचिंग को कोई गलत बात नहीं मानते। सवाल यह भी है कि समाज में इस सोच ने आखिर कैसे जड़ जमा ली? बीमारी के इस हिस्से का इलाज सरकार ही कर सकती है।