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जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर अलग-थलग पड़े इमरान
जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर अलग-थलग पड़े इमरान |Pankaj Baraiya - RE
राज ख़ास

दुनिया को भड़काना बंद करे इमरान

इमरान खान ने सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय समुदाय का साथ पाने की कोशिश की। अब जम्मू-कश्मीर के मामले पर पिछले कुछ दिनों से वह इस्लाम के नाम पर मदद की गुहार लगा रहे हैं।

राज एक्सप्रेस

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"जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर अलग-थलग पड़े इमरान अब इस्लामिक कार्ड खेल रहे हैं। उधर, मुस्लिम देशों से पीएम मोदी के दोस्ताना ताल्लुकात काम आए। यही वजह है कि, मुस्लिम देश भारत के साथ रिश्ते खराब नहीं करना चाहते। ऐसे में इमरान खान बिल्कुल अलग-थलग पड़ते दिख रहे हैं। मुस्लिम देश तक भारत से संबंध खराब होने की सेाचकर पाकिस्तान का साथ देने से कतरा रहे हैं।"

राज एक्सप्रेस। जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर अलग-थलग पड़े इमरान अब इस्लामिक कार्ड खेल रहे हैं। उधर, मुस्लिम देशों से पीएम मोदी के दोस्ताना ताल्लुकात काम आए। यही वजह है कि मुस्लिम देश भारत के साथ रिश्ते खराब नहीं करना चाहते। ऐसे में इमरान खान बिल्कुल अलग-थलग पड़ते दिख रहे हैं। 370 के फैसले पर इमरान खान ने सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय समुदाय का साथ पाने की कोशिश की। अब जम्मू-कश्मीर के मामले पर पिछले कुछ दिनों से वह इस्लाम के नाम पर मदद की गुहार लगा रहे हैं। उन्हें ट्रंप से मध्यस्थता के प्रस्ताव की उम्मीद जगी थी, उनके पल्ला झाड़ने पर बौखलाहट बढ़ गई है।

अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान क्यों लगातार इस्लामिक दुनिया को भारत के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं? क्यों अब उनकी एकमात्र उम्मीद धार्मिक कट्टरवाद पर टिक कर रह गई है? क्या इमरान खान ऐसा करने में सफल हो पाएंगे? क्यों इस्लामिक देश भी इमरान खान के साथ दिखने से परहेज कर रहे हैं? ये तमाम सवाल तब उठे हैं जब पाकिस्तान के पीएम जम्मू-कश्मीर के मामले पर पिछले कुछ दिनों से लगातार इस्लाम के नाम पर मदद की गुहार लगा रहे हैं। हालांकि अब तक के संकेत यही बता रहे हैं कि निराशा में इमरान खान की हताशा भरा हथकंडा काम नहीं आ रहा है।

जब जम्मू-कश्मीर से केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधानों को हटाने का फैसला लिया, इमरान खान ने सबसे पहले इस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का साथ पाने की कोशिश की। उन्हें इस फैसले से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से दोनों देशों के बीच मध्यस्थता के प्रस्ताव से उम्मीद भी जगी थी। लेकिन धीरे-धीरे सभी देशों ने कश्मीर पर भारत सरकार के फैसले को आंतरिक मामला बताकर इससे पल्ला झाड़ लिया। यहीं से इमरान खाने की बौखलाहट बढ़ी और उन्होंने इसे इस्लामिक रंग देना शुरू कर दिया। उन्होंने ट्रोल की तरह ट्वीट कर भड़काऊ बयान देना शुरू कर दिया।

सबसे पहले इमरान खान ने स्रेब्रेनिका नरसंहार का जिक्र कर कश्मीर से उसकी तुलना की जहां मुस्लिमों पर अत्याचार हुआ था। उन्होंने ग्लोबल समुदाय को चेतावनी दी कि, कश्मीर में ऐसा ही हो सकता है और ऐसा हुआ तो मुस्लिम देशों में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे। लेकिन तब भी कोई रिस्पांस नहीं मिला। फिर इमरान खान ने कश्मीर पर भारत के फैसले को आरएसएस और हिंदूवादी सरकार के फैसले के रूप में पेश करके भड़काने की कोशिश की कि भारत कश्मीर की डेमोग्रफी बदलने की कोशिश में है। उन्होंने इस बार भारत की तुलना हिटलरराज से की। फिर उन्होंने चेताया कि कश्मीर मुद्दे पर अनदेखी से मुस्लिम देशों में कट्टरता बढ़ेगी और मुस्लिम चुपचाप नहीं बैठेंगे। हिंसा बढ़ेगी।

सोशल मीडिया पर लगातार कई पाकिस्तानी पत्रकार इस अपील का मज़ाक उड़ा रहे हैं, या फिर आलोचना कर रहे हैं। अक्सर ट्विटर पर इन मुद्दों पर लिखने वालीं नायला इनायत ने भी तंज कसते लिखा, ‘ब्रेकिंग!! भारत से आ रहे हवा और पानी को पाकिस्तान 12 से 12.30 के बीच रोकेगा।’ इतना ही नहीं, लगातार पाक नेताओं के द्वारा ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के नारे को दोहराने पर भी उन्होंने तंज कसा और लिखा कि पाक हमेशा ऐसा नहीं था, हमने अच्छे दिन भी देखे हैं। 1962 में भी हम तब कश्मीर जीतने की ही कोशिश कर रहे थे। आइमा खोसा ने लिखा कि इमरान खान को लगता है कि वह इस तरह की अपील करके लोगों को साथ जोड़ रहे हैं और अपनी ही सत्ता में चल रहे फासीवादी उत्पीड़न को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं।

पाकिस्तान की युद्ध उन्माद फैलाने और इस्लामिक कार्ड चलने की यह कोई पहली मिसाल नहीं है। दरअसल, पाकिस्तान का पुराना दस्तूर रहा है। पाक ने तो परमाणु बम का निर्माण भी इस्लाम के नाम पर कर लिया था। 70 के दशक में तत्कालीन पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो ने तो इस्लामिक भावना भड़काते हुए कहा था कि हम भूखे रहकर भी बम बनाएंगे। तब उन्होंने परमाणु बम बनाने के लिए जिन तमाम हथकंडों को इस्तेमाल किया उसे उन्होंने इस्लाम से ही जोड़ा था। 1971 की हार ऐसा सदमा था, जिसके बाद भुट्टो ने बौखलाहट में इस तरह की बातें उठाई थीं। उसके बाद परवेज मुशर्रफ से लेकर नवाज शरीफ तक ने भारत के खिलाफ इस्लामिक भावना भड़काने की असफल कोशिश की। आज लगभग पांच दशक बाद ठीक उसी तरह की बौखलाहट इमरान खान दिखा रहे हैं। इसके लिए वह हर हद पार कर जाने की जिद दिखा रहे हैं।

जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली उन्होंने पाकिस्तान की मंशा को भांप लिया। उन्होंने विश्व के बाकी मुस्लिम देशों से अपने बेहतर रिश्ते किए। इसी क्रम में पड़ोस में मुस्लिम बहुल देश-बांग्लादेश, अफगानिस्तान और मालदीव तो भारत के सबसे करीबी मित्र हो गए और पब्लिक मंच पर उन्होंने बहुत ही मजबूती से हमारा साथ दिया। अभी पीएम मोदी का यूएई और बहरीन का दौरा भी बेहद अहम माना गया। दोनों मुस्लिम देशों ने भी भारत का साथ दिया। दरअसल मोदी डिप्लोमैसी में भारत ने मुस्लिम देशों से रिश्ते बेहतर करने के साथ इनका विश्वास भी जीता। इन दोनों देशों के अलावा सऊदी अरब सहित तमाम मुस्लिम बहुल देशों ने भारत के पक्ष में बयान तक दिए।

जम्मू-कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान का साथ नहीं देने के पीछे मुस्लिम देशों की अपनी समझ है। पहली बात कि, इस इलाके से मुस्लिमों को धर्म के आधार पर टारगेट करने के मामले नहीं रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान के खुद आतंक के दलदल में घुसे रहने के रिकॉर्ड को देखते हुए मुस्लिम देश इस विवाद में घुसने से परहेज करते रहे हैं। इमरान खान ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस को फोन कर बार-बार मदद और दखल की गुहार लगाई लेकिन सऊदी अरब ने साफ इनकार कर दिया। इस्लामिक देशों के संगठन तक ने इससे दूरी बनाए रखी। पाकिस्तान की मंशा पर संदेह के अलावा अब भारत के दूसरे मुस्लिम देशों से व्यापारिक रिश्ते भी आज की तारीख में इतने बढ़ गए हैं कि वे भारत से बिना वजह रिश्ते खराब करने का जोखिम नहीं ले सकते हैं।