क्या चिराग पासवान बनने की राह पर है उद्धव ठाकरे !
क्या चिराग पासवान बनने की राह पर है उद्धव ठाकरे !Social Media

क्या चिराग पासवान बनने की राह पर है उद्धव ठाकरे !

महाराष्ट्र के वर्तमान हालात को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा की उद्धव ठाकरे को उनके ही चिराग एकनाथ शिंदे से आग लग गई और गुजरात नीति की शिकार एक और सरकार हो गई।

राज एक्सप्रेस। महाराष्ट्र के वर्तमान हालात को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा की उद्धव ठाकरे को उनके ही चिराग एकनाथ शिंदे से आग लग गई। वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा लग रहा है कि शिवसेना उद्धव ठाकरे से निकल के कहीं एकनाथ शिंदे के हाथ में ना चली जाए, क्योंकि कानून कहता है कि कोई भी व्यक्ति अगर पार्टी तोड़ता है और उसके पास उस पार्टी के वर्तमान विधायकों की संख्या के दो तिहाई संख्या है तो फिर पार्टी पर उसका कब्जा होगा और वह उस पार्टी का प्रमुख भी बन सकता है, या अपनी अलग पार्टी बना सकता है और उसके ऊपर दल बदल कानून भी लागू नहीं होगा। इस तरह एकनाथ शिंदे के पास वर्तमान में कुल प्राप्त सूचना के अनुसार शिवसेना के 42 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, इस तरह वह शिवसेना के संसदीय दल के नेता बन सकते हैं।

साथ ही एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के द्वारा की गई कार्रवाई का विरोध करते हुए अपनी मंशा जाहिर कर दी है कि उन्हें कोई विधायकों के दल के नेता से नहीं हटा सकता क्योंकि संख्या उनके पास है और पार्टी के द्वारा विहिप कर बुलाए गए मीटिंग को भी उन्होंने असंवैधानिक करार दिया है क्योंकि उनका कहना है कि उद्धव ठाकरे के पास यह करने के लिए संख्या बल नहीं बचा है।

महाराष्ट्र की राजनीति पर सभी पार्टियों की निगाह बनी रहती है ,क्योंकि महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा सभी पार्टियों को चंदा प्राप्त होता है और वह देश की आर्थिक राजधानी है, इसलिए यहां की सत्ता पर काबिज होना सभी दलों के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण और फलदायक होता है। जिस तरीके से शिवसेना ने बीजेपी किनारा करते हुए अपने विचारधारा से समझौता कर कांग्रेसी और शरद पवार के साथ मिलकर सरकार सरकार बनाई थी, तभी से बीजेपी की निगाह महाराष्ट्र की सत्ता पर बनी हुई थी और अंततः भारतीय जनता पार्टी अपने प्रयास में सफल होती दिख रही है और उसकी गुजरात नीति सफल हो रही है।

अपने साथ उद्धव का नहीं आने का बदला वह उनकी ही पार्टी से उनको बाहर कर लेने में लगी है। वर्तमान हालात को देखते हुए यह कहना मुश्किल है ऊंट किस करवट बैठेगा, क्योंकि उधर ठाकरे ने भी बागी विधायकों से वापस आने की साथ ही उनसे बात करने और अपना मुख्यमंत्री पद और अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की बात कही है। परंतु एकनाथ शिंदे ने इस पहल को ठुकराते हुए मांग की है कि पहले वह कांग्रेसी और शरद पवार की पार्टी से अलग हो फिर इन सब पर विचार किया जाएगा।

जिस तरीके से इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया गया है उसमें सबसे निकटवर्ती शहरों में से एक सूरत मे पहले महाराष्ट्र से एक-एक कर विधायकों को यहां लाया जाता है, वहां पर इनको रखकर पूरी प्लानिंग करने का प्लान था, परंतु कुछ गड़बड़ ना हो इसलिए उनको यथाशीघ्र वहां से असम भेजा जाता है और महाराष्ट्र की राजनीति अब असम से चल रही है और महाराष्ट्र का भविष्य भी अब असम में लिखा जाएगा।

इन सभी परिस्थितियों में भारतीय जनता पार्टी के किसी बड़े नेता की किसी प्रकार की कोई भी प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है, वह लोग इसे शिवसेना का आंतरिक मामला बता रहे हैं और यह सारा घटनाक्रम मध्य प्रदेश में हुए सियासी उठापटक की याद दिलाता है। साथ ही जिस तरीके से इस पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया गया है और उद्धव ठाकरे को उनकी पार्टी से बाहर करने की कोशिश चल रही है, उसमें चिराग पासवान के साथ हुए घटनाक्रम की भी याद ताजा हो रही है।

इन सभी घटनाक्रमों से यह पता चलता है इस सियासत में कोई किसी का सगा नहीं होता। साथ ही महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए इन बागी विधायकों के साथ बीजेपी पहल कर सकती है और एकनाथ शिंदे को महत्वपूर्ण पद प्राप्त हो सकता है, परंतु क्या इस तरह सत्ता को पाना इस तरीके से अपने पार्टी को धोखा देना और इस तरीके से एक चुनी हुई सरकार को सत्ता से बाहर करना भारत के संविधान और भारत के लोकतंत्र को शोभा देता है। परिणाम जो भी हो परंतु इस घटनाक्रम से साबित यह होता है कि जिस तरीके से बीजेपी अपनी ताकत की आंधी पूरे देश में चला कर साम, दाम,दंड ,भेद के साथ हर जगह सत्ता पर कब्जा करना चाहती है यह अटल जी की वह भारतीय जनता पार्टी नहीं है, क्योंकि याद हो तो अटल जी की सरकार सिर्फ एक वोट से गिर गई थी और आज बीजेपी उस स्थिति में है या उस स्थिति तक पहुंच गई है कि उसे कितने भी विधायक व सांसदों की जरूरत हो तो वह जोड़ सकती है और किसी भी चुनी सरकार को गिरा कर अपनी सरकार बना सकती है। इस पूरे प्रकरण में किसका दिमाग है कौन मास्टरमाइंड है यह सब जानते हैं या इसकी जानकारी कुछ दिनों में आएगी, परंतु यह कहा जा सकता है कि आज किसी को भी अगर सत्ता में रहना है और शासन करना है तो आपको भारतीय जनता पार्टी के साथ रहना पड़ेगा, आप कोई दूसरा रास्ता नहीं चुन सकते और अगर चुन सकते हैं या चुनते हैं तो आप को हाशिए पर लाने का पूरा प्रयास किया जाएगा और लाया भी जा सकता है।

महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ जो हुआ उसकी कल्पना कभी किसी ने नहीं की होगी और अगर इसके संस्थापक बालासाहेब होते तो शायद उनको यह दिन नहीं देखना पड़ता और उद्धव को यह मानना पड़ेगा की यह नतीजा उनके कमजोर नेतृत्व का प्रतिबिंब है और वह दिन दूर नहीं जब उद्धव ठाकरे भी चिराग पासवान की श्रेणी में खड़े हो जाएं और सबसे मजेदार बात यह है यह दोनों भी कभी भाजपा के सबसे विश्वसनीय लोगों में से एक थे।

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