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रैगिंग के रोग का इलाज जरूरी
रैगिंग के रोग का इलाज जरूरी|Sudha Choubey - RE
राज ख़ास

रैगिंग के रोग का इलाज जरूरी

रैगिंग एक मानसिक विकृति है। यह सिर्फ कानून से नियंत्रित नहीं हो सकेगी। रैगिंग से पीड़ित छात्रों को इसकी जानकारी अभिभावक, विश्वविद्यालय, प्रशासन और संबंधितों को देने की हिम्मत दिखानी चाहिए।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस, भोपाल। सीनियर छात्रों के लिए रैगिंग भले ही मौज-मस्ती हो सकती है, लेकिन रैगिंग से गुजरे छात्र के जहन से रैगिंग की भयावहता मिटती नहीं है। इसी भयावहता का उदाहरण ओडिशा में सामने आया है। रैगिंग एक मानसिक विकृति है। यह सिर्फ कानून से नियंत्रित नहीं हो सकेगी। रैगिंग से पीड़ित छात्रों को इसकी जानकारी अभिभावक, विश्वविद्यालय, प्रशासन और संबंधितों को देने की हिम्मत दिखानी चाहिए।

रैगिंग! यह शब्द पढ़ने में सामान्य लगता है। इसके पीछे छिपी भयावहता को वे ही छात्र समझ सकते हैं, जो इसके शिकार हुए हैं। आधुनिकता के साथ रैगिंग के तरीके भी बदलते जा रहे हैं। रैगिंग आमतौर पर सीनियर विद्यार्थी द्वारा कॉलेज में आए नए विद्यार्थी से परिचय लेने की प्रक्रिया। लेकिन अगर किसी छात्र को रैगिंग के नाम पर अपनी जान गंवाना पड़े तो उसे क्या कहेंगे। रैगिंग के नाम पर समय-समय पर अमानवीयता का चेहरा भी सामने आया है। गलत व्यवहार, अपमानजनक छेड़छाड़, मारपीट ऐसे कितने वीभत्स रूप रैगिंग में सामने आए हैं। सीनियर छात्रों के लिए रैगिंग भले ही मौज-मस्ती हो सकती है, लेकिन रैगिंग से गुजरे छात्र के जहन से रैगिंग की भयावहता मिटती नहीं है। इसी भयावहता का उदाहरण ओडिशा में सामने आया है। देश के अलग-अलग राज्यों ने रैगिंग पर बैन लगा रखा है और सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानवाधिकारों का हनन तक करार दिया है, लेकिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। जहां संबलपुर की एक टेक्निकल यूनिवर्सिटी में सीनियर्स के जूनियर्स की रैगिंग करने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं।