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लद्दाख की मुक्ति का रास्ता खुला
लद्दाख की मुक्ति का रास्ता खुला|संपादित तस्वीर
राज ख़ास

लद्दाख की मुक्ति का रास्ता खुला

नरेंद्र मोदी से पहले की केंद्र सरकारें अलगाववादियों की ही पक्षधर बनी रहकर उनकी हित-साधक बनी रहीं, नतीजतन अलगाववादियों के हौसले बुलंद होते रहे, जो कश्मीर की बदहाली का कारण बने। अब ऐसा हो पाना असंभव हो

Kavita Singh Rathore

Kavita Singh Rathore

राज एक्सप्रेस, भोपाल। नरेंद्र मोदी से पहले की केंद्र सरकारें अलगाववादियों की ही पक्षधर बनी रहकर उनकी हित-साधक बनी रहीं, नतीजतन अलगाववादियों के हौसले बुलंद होते रहे, जो कश्मीर की बदहाली का कारण बने। मगर अब ऐसा हो पाना असंभव हो गया है। धारा 370 एक ऐसा फैसला है, जिसे खत्म करने की मांग पूरा देश कर रहा था, मगर देश की कोई भी सरकार या पार्टी ऐसा कर पाने का साहस नहीं कर पा रही थी।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक-2019 के लागू होने के बाद राज्य की भूमि का ही नहीं राजनीति का भी भूगोल बदलेगा। विधानसभा सीटों के परिसीमन के जरिए राजनीतिक भूगोल बदलने की कोशिश भी होगी। नए सिरे से परिसीमन और आबादी के अनुपात में जम्मू-कश्मीर की नई विधानसभा का जो आकार सामने आएगा, उसमें सीटें घट अथवा बढ़ सकती हैं। बंटवारे के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख कंेद्र शासित राज्य होंगे। दोनों जगह दिल्ली की तरह मजबूत उपराज्यपाल सत्ता-शक्ति का प्रमुख केंद्र होंगे। लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। परिसीमन के लिए आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग राजनीतिक भूगोल का अध्ययन कर रिपोर्ट देगा। आयोग राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूदा आबादी और उसका विधान और लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का भी आकलन करेगा। साथ ही राज्य में अनुसूचित व अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों को सुरक्षित करने का भी अहम् निर्णय लेगा। परिसीमन के नए परिणामों से जो भौगोलिक, सांप्रदायिक व जातिगत असमानताएं हैं वे दूर होंगी। जम्मू-कश्मीर नए उज्जवल चेहरे के रूप में दिखेगा।