हमारी 'खुशी' आखिर चली कहां गई, हम खुश नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं?

एक बार फिर दुनिया के पैमाने ने यह बताया है कि भारतीय खुश नहीं हैं और पिछले साल के मुकाबले खुशहाली के पायदान पर भारत और नीचे चला गया है।
हमारी 'खुशी' आखिर चली कहां गई, हम खुश नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं?
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भारत पिछले साल के मुकाबले 4 पायदान नीचे आ गया है और इस बार 144वें स्थान पर है। पिछले साल 140वें स्थान पर था। खुशी का पैमाना नीचे जाना चिंता की बात है। इस संदर्भ में हम सभी को विचार कर उपाय के रास्ते तलाशने होंगे।

भारत में लोग कितने खुश हैं, इसका पता हमें शायद नहीं होगा। अगर पता लगाने निकलें तो ऐसे लोगों की संख्या कम ही मिलेगी जो हर तरह से खुश या संतुष्ट नजर आएं। अधिसंख्य लोग जिनमें गरीब- अमीर दोनों शामिल हैं, कहीं न कहीं परेशान, हताश, पीड़ा में रहते हुए नजर आएंगे। गरीब अपनी वजहों से परेशान है तो अमीरों के अपने रोने हैं। ऐसे में यह सवाल उठना तो लाजिमी है कि हमारी खुशी आखिर चली कहां गई। हम खुश नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं? हाल में एक बार फिर दुनिया के पैमाने ने यह बताया है कि भारतीय खुश नहीं हैं और पिछले साल के मुकाबले खुशहाली के पायदान पर भारत और नीचे चला गया है। इसका मतलब यह है कि पिछले एक साल में ऐसा कुछ तो हुआ है जिससे लोगों की खुशी छिनी या कम हुई है। सयुंक्त राष्ट्र की एक एजेंसी-सस्टेनेबल डवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क ने खुशहाली को लेकर दुनिया के 156 देशों की सूची जारी की है। इस सूची में भारत पिछले साल के मुकाबले 4 पायदान नीचे आ गया है और इस बार 144वें स्थान पर है। पिछले साल 140वें स्थान पर था।

सवाल भारत का है। खुशहाली के पैमाने पर भारत आज दुनिया के सबसे कम खुशहाल देशों जैसे सीरिया, यमन, अफगानिस्तान, तंजानिया, रवांडा और सूडान आदि जैसे देशों के करीब है। हां, अगर भ्रष्टाचार, कुपोषण, शिक्षा-स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की कमी की बात आती है तो हमारी स्थिति ऐसे पायदानों में ऊपर ही होती है। आज भारत में बेरोजगारी का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। नौजवान पीढ़ी का बड़ा हिस्सा तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का शिकार हो रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम के दावे तो बहुत हो रहे हैं, लेकिन इनके नतीजे निराश करने वाले ही आ रहे हैं। बड़ी संख्या में शिशु और महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं। बेघरों की तादाद का कोई आंकड़ा नहीं है। गरीबी दूर करने के नाम पर जो योजनाएं चलाई जाती रही हैं वे भ्रष्टाचार का शिकार हैं और इस कारण गरीबी उन्मूलन एक सपना ही रह गया। देश का अधिसंख्य किसान गंभीर संकट से जूझ रहा है और कर्ज से परेशान होकर जान देने की घटनाएं आम हो गई हैं। नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यति की आजादी को लेकर सवाल उठते रहे हैं। प्रदूषण भारत के लिए बड़ी और गंभीर समस्या बन गया है और इसमें हमारी उपलब्धि यह है कि दुनिया के सबसे बीस प्रदूषित शहरों में भारत के 15 हैं। जाहिर है, ऐसे में आम आदमी कैसे खुश रह सकता है!

देखा जाए तो करीब 3500 बीसी से लोग उम्र बढऩे को धीरे करने और जीवन को आगे बढ़ाने के तरीके तलाश रहे हैं। पोंस डी लियोन और फाउंटेन ऑफ यूथ से लेकर इंडियाना जोन्स और होली ग्रेल तक, प्रत्येक पीढ़ी ने बेसब्री से अमरता के मार्ग की खोज की है। जहां एक ओर लोग उम्र बढऩे को कम करने की अपनी खोज में लगे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ समझदार डॉक्टर्स मरीजों को धूम्रपान छोडऩे, नियमित रूप से व्यायाम व कम वसा वाले आहार का पालन करने की सलाह देते हैं। लेकिन वास्तव में अगर जीने में कोई खास मजा न हो तो, कौन हमेशा के लिए जिंदा रहना चाहेगा? बढ़ते शोध के आधार पर इस तरह के आधार बहुत दूर नहीं है। हैप्पीनेस, जिसे किसी के जीवन के लिए संतोष और प्रशंसा के रूप में परिभाषित किया गया है, विटामिन सी के मनोवैज्ञानिक समकक्ष प्रतीत होता है। जो तरीके अभी तक पूरी तरह से समझे नहीं गए हैं, उनमें से एक है कि जीवन पर एक सकारात्मक दृष्टिकोण तनाव के प्रभावों को कम करता है।

खुश लोगों में न केवल हृदय रोग के लिए योगदान देने वाले कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोनों को कम करने की संभावना कम होती है, बल्कि वे अच्छे सेल्फ- केयर का पालन करने व बेहतर सामाजिक नेटवर्क के साथ अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य के विश्वसनीय संकेतक दोनों हैं। दूसरी ओर, गंभीर दुख, रतचाप में वृद्धि और रोगक्षमता में कमी का कारण बनता है। भावनात्मक समर्थन की कमी वाले दुखी लोग भी खुद की बहुत अच्छी तरह से देखभाल नहीं करते हैं। इसका मतलब है कि पोलीयाना व्यक्तित्व न केवल जीवन को अधिक मनोरंजक बना देता है, बल्कि यह कुछ वर्षों तक जीवन को बढ़ा भी सकता है। शायद सबसे ज्यादा कठिन अध्ययन जो हैप्पीनेस को दीर्घायु से लिंक करता है, वह ननों के एक समूह पर बेस्ड है। इस विशेष अध्ययन में प्रत्येक नन को आत्मकथात्मक स्केच लिखना था। छह दशकों बाद उन कंटेंट आश्चर्यजनक रूप से मजबूत संकेतक साबित हुई कि लेखक अब तक जीवित हैं और कितने स्वस्थ हैं।

फिलहाल, देशों की आंतरिक स्थिति के आधार पर पेश की जानेवाली अन्य महत्वपूर्ण रिपोर्टों पर नजर डालें, तो निराशा और बढ़ जाती है। मानव विकास सूचकांक, प्रसन्नता सूचकांक, सामाजिक प्रगति और आर्थिक प्रतिस्पद्र्धा की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भी हमारा देश नीचे के पायदानों पर खड़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, समानता, मानवाधिकार, पर्यावरण आदि मामलों में हमारी उपलब्धिया उत्साहवद्र्धक नहीं हैं। राष्ट्रीय संपत्ति के आधार पर दुनिया के सबसे धनी देशों में शामिल होकर या सकल घरेलू उत्पादन में तेज वृद्धि के दावे करके हम अपनी पीठ भले थपथपा लें, पर सच यही है कि देश के भीतर समानता, समृद्धि और खुशहाली के मामले में हमारा प्रदर्शन अब भी बहुत पिछड़ा है। गुड कंट्री इंडेस भी इसी कड़वी हकीकत की एक तस्वीर पेश करता है। विभिन्न वैश्विक इंडेक्स के आईने से झांकती हमारी खराब छवि विकास की हमारी आकांक्षाओं को बहुत नुकसान पंहुचा सकती है, क्यूंकि यह छवि विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दखल की क्षमता और पर्यटन आदि को भी प्रभावित करती है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा अन्य महत्वपूर्ण संस्थाएं भी इन निष्कर्षों पर समुचित ध्यान देकर स्थिति में सुधार के लिए गंभीर प्रयास करेंगी। ताकि अगली बार भारत की स्थिति में सुधार हो सके। इसके साथ ही उन कारकों की भी खोज करनी होगी, जिसकी वजह से भारत के लोगों की खुशी गायब होती जा रही है। सयुंक्त राष्ट्र की एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट के बहाने जो संकेत देने की कोशिश की है, उसे नजरंदाज करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

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