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सभी के आराध्य हैं 'भगवान गणेश'
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राज ख़ास

सभी के आराध्य हैं 'भगवान गणेश'

गणेश उत्सव का पर्व आज यानि 2 सितंबर 2019 से शुरू हो गया है। 10 दिनों तक चलने वाला यह पर्व हमारे लिए श्रद्धा-भक्ति से कहीं ज्यादा गणेशजी के चरित्र से प्रेरणा लेने वाला है।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस। गणेश उत्सव का पर्व आज से शुरू हो गया है। 10 दिनों तक चलने वाला यह पर्व हमारे लिए श्रद्धा-भक्ति से कहीं ज्यादा गणेशजी के चरित्र से प्रेरणा लेने वाला है। हम गणेशजी से आशीर्वाद स्वरूप जीवन जीने के बेहतर मंत्र ले सकते हैं और देश की भलाई कर सकते हैं। दैनिक कार्यो में सफलता की कामना, बुद्धि एवं मंगल कार्य को निर्विघ्न संपन्न करने गणेशजी को ही सर्वप्रथम पूजा जाता है।

आज से गणेश उत्सव प्रारंभ होगा, 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव की धूम पूरे देश में रहेगी। गणेशजी सारे देश के आराध्य हैं, लेकिन उन्हें विदेशों में भी पूजा जाता है। जिन देशों में उन्हें पूजा जाता है, वे हैं- बर्मा, स्याम (थाईलैंड), कंबोडिया, वियतनाम, मलय द्वीप समूह, जावा, बाली, बोर्नियो (इंडोनेशिया), चीन और जापान आदि तथा उत्तर में नेपाल, तिब्बत, मध्य एशिया, ईरान और दक्षिण में श्रीलंका। इन देशों में प्राप्त गणेशजी की प्रतिमाओं, चित्रों, ग्रंथों व अन्य पुरातात्विक सामग्रियों से प्रतीत होता है कि गणेश का नाम, प्रभाव एवं पूजन इन देशों में प्राचीन काल से प्रचलित है।

गणेशजी जिन देशों में भी पूजे जाते हैं, उन देशों में भक्तों की रुचि के अनुरूप उनके भेष में हुए परिवर्तनों को देखा जा सकता है। हमारे देश में सामान्यत: पीतांबर और व्याघ्र चर्म धारण करने वाले गणेशजी कुछ देशों में लंबा चोंगा तो कहीं सलवार और कहीं पर पायजामा जैसे अधोवस्त्र धारण किए दिखाई देते हैं। वस्त्र तथा अन्य सामग्रियों में भले ही कई परिवर्तन दिखते हों, लेकिन विदेशों में भी गणेशजी सदैव विघ्नहर्ता एवं सिद्धिदाता के रूप में ही पूजित हैं।

गणेशजी की आस्था का प्रसार बर्मा (म्यांमार) में शायद समुद्री रास्ते से पहुंचने वाले भारतीयों द्वारा हुआ होगा। दक्षिणी बर्मा के हीनयान बौद्ध संप्रदाय के कट्टर विरोध के बावजूद वहां 6वीं एवं 7वीं शताब्दी की गणोश प्रतिमाएं मिलती हैं। बर्मा के उत्तरी क्षेत्र में प्रचलित महायान बौद्ध अनुयायियों ने भी गणेशजी को स्वीकार कर लिया है। पागन स्थित श्वेसंदा बौद्ध विहार में हिंदुओं के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं में गणेशजी भी देखे जा सकते हैं। स्याम (थाईलैंड) में गणेशजी के भक्त शायद बर्मा की ओर से पहुंचे। थाईलैंड में अधिकांश बौद्ध धर्मावलंबी हैं, पर वहां गणेशजी बौद्धों में भी हिंदुओं के जैसे ही प्रिय देवता के रूप में लोकप्रिय हैं।

कई मंदिरों के प्रांगणों में गणेशजी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। प्राचीनकाल की धातु निर्मित अनेक गणोश प्रतिमाएं यहां प्राप्त होने से स्पष्ट होता है कि गणेशजी प्राचीन काल में भी इस देश में एक प्रिय देवता थे। स्याम के उत्तर में स्थित हनोई के एक ग्रंथालय में उपलब्ध एक प्राचीन स्यामी ग्रंथ में गणेशजी के छह रेखा चित्र हैं, जिनमें से तीन चित्र विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें गणेशजी के शरीर पर बहुत सारे आभूषण दिखाए गए हैं तथा घुटने मुड़े हुए होकर एक-दूसरे की विपरीत दिशा में हैं, पर पैरों की एड़ियां एक-दूसरे को स्पर्श करती हैं। इनमें से दो के नाम विघ्नेश्वर हैं। एक चित्र में गणेशजी मूषक पर हैं और दूसरे में कछुए पर खड़े हैं।

इंडो-चाइना, जिसमें आजकल कंबोडिया, लाओस एवं उत्तरी तथा दक्षिणी वियतनाम शामिल हैं, में पहले शैव संप्रदाय फला-फूला, पर बाद में बौद्ध धर्म की महायान शाखा स्थापित हुई। कंबोडिया मूर्ति संपदा की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। वहां गणेशजी को प्रहकनेस या केनेस कहा जाता है तथा वहां कहीं भी गणेशजी तोंदिल नहीं दिखाए गए हैं। वे दाहिना पांव, बाएं पर रखे पालथी मारे दिखाए गए हैं। वहां की मूर्तियों की दो भुजाएं हैं तथा वे घुटनों पर टिकी हैं। सूंड सीधी लटकी हुई दिखाई देती है, जो अंत में मुड़ती है।

गणेशजी की आराधना का विस्तार मलय द्वीप होते हुए दक्षिण पूर्व में भी हुआ है। यहां भारतीय संस्कृति का प्रभाव यहां प्राप्त हुई दुर्गा, गणोश एवं नंदी आदि की मूर्तियों से होता है। पांचवीं-छठवीं सदी में मलय में हिंदू धर्म का अच्छा प्रभाव था। मलय द्वीप में गणेशजी की जो प्रतिमाएं मिली हैं, उन पर जावा का प्रभाव देखा जा सकता है। गणेशजी पालथी मारकर बैठे हैं तथा पैरों के दोनों तलवे एक-दूसरे को स्पर्श करते हैं। सूंड सीधी लटकती है। यहां की कतिपय मूर्तियों के गले में नरमुंड माला एवं सिंहासन में भी नरमुंड बने हैं, जो तांत्रिक प्रतीत होते हैं।

आजकल यह भूभाग तीन भागों में विभाजित है। बड़ा हिस्सा कालीमंतन इंडोनेशिया का एक प्रांत है। उत्तर के साराबाक और साबा मलेशिया के भाग हैं और ब्रुनेई एक छोटा तथा स्वतंत्र देश है। बोर्नियो में भी जावा जैसे स्वरूप की बैठी हुई गणेशजी की मूर्तियां मिलती हैं। पूर्वी और सुदूरपूर्वी देशों एवं द्वीपों के अतिरिक्त भारत के उत्तर में समीपस्थ नेपाल, तिब्बत एवं मध्य एशिया में गणेशजी के देवत्व के विस्तार की यात्रा का प्रारंभ कब से हुआ, यह निश्चित रूप से कहना संभव नहीं है, पर एक किंवदंती है कि सम्राट अशोक की सुपुत्री चारुमति ने नेपाल में गणेश मंदिर की स्थापना कराई थी।

यहां झिंपी ताउदु नामक ग्राम के पास एक गणेशजी है, जिसमें कई शिलालेख हैं, जो आठवीं और दसवीं शताब्दी के हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि उस समय तक गणोश वहां अग्रण्य देवता के रूप में स्थापित हो गए थे। अफगानिस्तान में प्राप्त कई मूर्तियों में गणोश की एक विशिष्ट व दुर्लभ मूर्ति गारदेज नामक स्थान पर मिली है, जो बाद में काबुल लाई गई। यह मूर्ति महाविनायक के नाम से प्रसिद्ध हुई है। काबुल के दरगाहपीर रतननाथ में यह मूर्ति स्थापित की गई। मूर्ति की आधार पीठिका पर संस्कृत में एक वाक्य खुदा हुआ है- महासुंदर विनायक की प्रतिष्ठापना सुप्रसिद्ध परम भट्टारक महाराजाधिराज राजा खिंगला ने अपनी आयु के 80वें वर्ष में जेठ मास की त्रयोदशी को विशाखा-सिंह लग्न के शुभ मुहूर्त में की।

इधर, ईरान के पश्चिमी क्षेत्र में उत्खनन के दौरान एक खंडित कलाकृति मिली है, जो गणेशजी की मूर्ति मानी जाती है। चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ ही संभवत: गणेशजी लोकप्रिय हुए होंगे। जापान में गणेशजी की एकल एवं युगल मूर्तियां पाई जाती हैं। एकल मूर्ति को वजविनायक कहते हैं, जो कि खड़ी अवस्था में छह हाथों वाली होती है। गणेशजी भारत के सीमावर्ती देशों के अलावा दूसरे महाद्वीपों में भी पूजे जाते रहे हैं। मेक्सिको के कोपान के मंदिर में गणेशजी की आकृति के सदृश्य एक मूर्ति प्राप्त हुई है।

ब्राजील में भी एक स्थान की खुदाई में गणेशजी की एक मूर्ति मिली है। इसे पुराविदों ने 4-5 हजार वर्ष प्राचीन माना है। यह सारी जानकारी पूर्व आईपीएस अधिकारी डॉ. सुभाष अत्रे और डॉ. जेएसबी नायडू द्वारा लिखित एक ग्रंथ ‘दुखहर्ता: सुखकर्ता:’ से ली गई है। डॉ. अत्रे के निवास पर गणोशजी की एक हजार से ज्यादा मूर्तियां संग्रहित हैं, जो बताती हैं कि उनका इस क्षेत्र में विस्तृत अध्ययन है। अगर राज्यों की बात करें, तो मुंबई में लालबाग के राजा प्रसिद्ध हैं। वहां की मूर्ति भारत की सभी गणेशजी मूर्तियों से सबसे बड़ी होती है। कर्नाटक में गणेश चतुर्थी को विनायका चतुर्थी कहते हैं।

चेन्नई में गणोश चतुर्थी बड़े पर्वो में से एक है। मध्यप्रदेश में कई शहरों में ईको फ्रेंडली गणोश भगवान की मूर्ति की पूजा होती है। गोवा में तो गणोश चतुर्थी का उत्सव कदंब युग के पहले से चला आ रहा है। गोवा में न्यायिक जांच आयोग ने हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस प्रतिबंध के बावजूद गोवा के हिंदू इस त्यौहार को मानते रहे। गणोशजी भारतीय संस्कृति एवं जीवनशैली के कण-कण में व्याप्त हैं, विदेशों में भी घर-कारों-कार्यालयों में विद्यमान हैं। मनुष्य के दैनिक कार्यो में सफलता, सुख-समृद्धि की कामना, बुद्धि एवं ज्ञान के विकास एवं किसी भी मंगल कार्य को निर्विघ्न संपन्न करने हेतु गणोशजी को ही सर्वप्रथम पूजा जाता है और याद किया जाता है।