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मांझा काट रहा जीवन की डोर
मांझा काट रहा जीवन की डोर|संपादित तस्वीर
राज ख़ास

मांझा काट रहा जीवन की डोर

चीन से आया मांझा लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनता जा रहा है। एक बार फिर अलीगढ़ में एक युवक की जान चली गई है। कारण पतंग का मांझा उसके गले में लिपट गया और बड़ा घाव दे गया।

राज एक्सप्रेस

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राज एक्सप्रेस, भोपाल। चीन से आया मांझा लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनता जा रहा है। एक बार फिर अलीगढ़ में एक युवक की जान चली गई है। कारण पतंग का मांझा उसके गले में लिपट गया और बड़ा घाव दे गया। चीन से आए मांझे पर एनजीटी ने रोक लगा रखी है, बावजूद इसके न तो सरकार और न ही प्रशासन अपनी जिम्मेदारी बेहतर ढंग से निभा रहा है। समाज की संवेदनशीलता भी इस पैमाने पर अब तक परिपक्व नहीं हो पाई है।

पतंगबाजी दुनियाभर में मशहूर है। कई देशों में अलग अलग तरह के पतंगबाजी महोत्सव मनाए जाते हैं, जो वहां के पर्यटन को बढ़ावा देते हैं। एक-दूसरे की पतंग काट कर जीत का जो मजा मिलता है वह पतंगबाजों के लिए अद्भुत होता है। पतंग काटने में हवा का रुख और पतंग की कलाबाजी के साथ पतंग उड़ाने में इस्तेमाल होने वाली डोर यानी मांझा का भी खास महत्व होता है। पतंग में आगे की ओर अलग तरह के मांझे व लोहे के तार तक का प्रयोग होता है। पतंग के साथ लगे मांझे के बाद एक अलग किस्म की डोर लगाई जाती है। पतंग के साथ लगा मांझा ही दूसरी पतंग के मांझे को रगड़ता है और उसे काट देता है। मांझा दूसरी पतंग की डोर को काट सके, इस के लिए मांझे में कांच और लोहे का बुरादा लगाया जाता है। देश में कॉटन के धागे से तैयार पतंग की डोर बनाई जाती है।

हाल के कुछ सालों में चीन से नायलॉन से तैयार की गई डोर बाजार में आने लगी है। नायलॉन की डोर आसानी से टूटती नहीं है। उस के ऊपर जब लोहे और कांच का बुरादा चढ़ाया जाता है तो यह कॉटन वाले मांझे से उड़ रही पतंग की डोर को आसानी से काट देती है। चाइनीज मांझे से पतंग के साथ उड़ाने वाले के हाथ भी कटने लगे हैं। सब से खतरनाक काम तो तब होता है जब कटी हुई पतंग किसी साइकिल या मोटरसाइकिल सवार के गले, मुंह या हाथ में लिपट जाती है। इससे कई बार गले की नसें तक कट जाती हैं। इस तरह की कई घटनाएं देश में घट चुकी हैं। ऐसे ही एक हादसे में एक युवक को जान गंवानी पड़ी है। यूपी के अलीगढ़ इलाके में 30 साल का युवक मोटरसाइकिल से कुछ सामान लाने निकला था, लेकिन बीच में एक कटी पतंग का धागा उसके गले में उलझ गया। तीखे मांझे से लैस धागे से उसकी गर्दन काफी गहराई तक कट गई और ज्यादा खून बहने से आखिरकार उसे नहीं बचाया जा सका।

खेल खेलना या मनोरंजन किसी का भी हक हो सकता है। लेकिन अगर वह किसी दूसरे और उस खेल से अनजान व्यक्ति के लिए जानलेवा बनता है तो इसे किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है? पिछले कुछ सालों के दौरान पतंग के मांझे की वजह से लोगों की जान जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इस मसले पर काफी चिंता भी जताई गई और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात भी कही गई, लेकिन आज भी हालत यह है कि इस तरह के जानलेवा धागों की खुले बाजार में बिक्री में कोई कमी नहीं आई है। प्रशासन की ओर से बरती गई इस लापरवाही और आम लोगों की गैरजिम्मेदारी की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ रही है। देश में चाइनीज मांझे को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने प्रतिबंधित कर रखा है। बावजूद इसके चीन से आए मांझे लोगों की जान का सबब बन रहे हैं। नायलॉन के साथ सिंथैटिक मटेरियल से तैयार दूसरे मांझे खतरनाक होते हैं।

कानून के अनुसार इस तरह के मांझे से केवल पतंग उड़ाना ही गुनाह नहीं, बल्कि इस मांझे को बेचना भी बड़ा अपराध है। ऐनवायरनमैंट प्रोटेक्शन एक्ट 1986 की धारा-5 के अंतर्गत इस के इस्तेमाल पर पांच साल की सजा और एक लाख रुपए तक का जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है। यह निजी फर्म, कंपनी अथवा सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू होता है। भारत में चाइनीज नायलॉन के धागे की खपत शुरू हो गई। अब चाइनीज नायलॉन के धागे पर मांझा तैयार करना सरल हो गया है। कांच और लोहे के बुरादे को जब चावल के मांड के साथ इस पर लगाया जाने लगा तो यह कॉटन के धागे की तरह टूटता नहीं है। जल्दी न टूटने के कारण यह पतंग उड़ाने वालों के लिए भी खास हो गया। इस से अब दूसरी पतंग को काटना आसान हो गया है। इस कारण चाइनीज नायलॉन से तैयार मांझा पतंगबाजी की पहली पसंद बन गया है।

केवल उपयोगिता में ही नहीं, कीमत में यह धागा सस्ता भी पड़ता है। ऐसे में इस का इस्तेमाल बढ़ने लगा और बाजार में चाइनीज मांझे के नाम से यह बिकने लगा। इसने कॉटन के धागे को पछाड़ दिया। पतंग जब कटने लगी और यह धागा लोगों की गरदन में फंसने लगा तो इस धागे की शिकायत होने लगी। पर्यावरण के लिहाज से यह धागा उचित नहीं था। इस कारण इस के इस्तेमाल पर पूर्णरूप से कानूनी प्रतिबंध लग गया है। कानूनी रूप से बंद होने के बाद भी चाइनीज मांझे का इस्तेमाल आज भी हो रहा है। देश में बेईमानी इस कदर हावी है कि यहां पर कानून के विपरीत काम करना सरल है। हर आदमी थोड़े से मुनाफे के लिए सिस्टम को तोड़ लेता है। पतंगबाज अपनी छोटी सी खुशी व थोड़ी सी बचत के आगे देशी कॉटन के मांझे के विपरीत चाइनीज मांझे का प्रयोग कर रहे हैं। प्रतिबंधित चाइनीज मांझा दिल्ली के रास्ते दूसरे राज्यों और फिर शहर और गांव तक पहुंचता है। चाइनीज मांझे का कोई तय मूल्य नहीं होता। डिलिवरी करने वाले को ही मुंहमांगी कीमत मिल जाती है। फुटकर बाजार में यह मांझा ज्यादा डिमांड में है, ऐसे में यह चोरी छिपे भी खूब बिकता है।

बहरहाल, पतंग कटने के बाद धागा समेटने या फिर पतंग के साथ काफी निचले स्तर से गुजरता धागा आमतौर पर दिखाई नहीं देता यह अगर एक झटके से व्यक्ति के शरीर से गुजर भर जाए तो गहरा घाव तक हो सकता है। खासतौर पर मोटरसाइकिल की सवारी करने वाले लोगों की नजर चूंकि सड़क पर होती है, इसलिए धागे को देख पाना उनके लिए आमतौर पर मुश्किल होता है और कई बार वे उस जानलेवा धागे की चपेट में आ जाते हैं। यह कहा जाता है कि ये धागे चीन से भारतीय बाजारों में आ रहे हैं। हो सकता है कि यह तथ्य हो। लेकिन इसके अलावा भी पतंग के शौकीन लोग स्थानीय स्तर पर नायलॉन के धागों पर कांच का चूरा, खतरनाक अधेसिव, एल्यूमीनियम ऑक्साइड, जिरकोनिया ऑक्साइड और मैदा जैसी चीजों से तैयार लेप चढ़ा कर उसे मारक बना देते हैं, ताकि दूसरों की पतंग आसानी से काटी जा सकें। लेकिन सच यह है कि आज ये धागे कुछ लोगों के लिए पतंग काटने या इसके जरिए मनोरंजन करने का जरिया हैं तो इससे किसी का गला भी कट जा रहा है।

अलीगढ़ में मांझे वाले धागे की वजह से युवक की मौत की ताजा घटना इस तरह का कोई नया मामला नहीं है। इसके चलते कई बच्चों और लोगों के मरने की खबरें आ चुकी हैं। कुछ खास मौकों पर खतरनाक मांझे से लैस धागों के जरिए की जाने वाली पतंगबाजी की वजह से बड़ी तादाद में पक्षियों की मौत या फिर घायल होने के मामले भी सामने आते हैं। मगर अफसोस की बात यह है कि पिछले कुछ सालों से तीखे मांझे वाले धागे की वजह से हुई कई मौतों और इस मसले पर दिल्ली हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद न तो सरकार या प्रशासन को इस दिशा में ठोस पहलकदमी की जरूरत महसूस हुई है और न ही लोगों के बीच इस मसले पर संवेदनशीलता का विकास हुआ कि उनके खेल की वजह से अगर किसी जान जा सकती है, तो वे उसके बारे में एक बार ठहर कर सोचें।

अब वक्त है कि खतरनाक मांझे को लेकर हर स्तर पर संवेदनशीलता बरी जाए और इसे रोकने के लिए कानून का पालन भी सुनिश्चित किया जाए। सिर्फ एक मांझे से किसी की जान जाना ठीक नहीं है। अपने मनोरंजन का मतलब यह नहीं कि दूसरे को मुसीबत में डाल दिया जाए।