चमोली जल प्रलय : देवभूमि उत्तराखंड में साढ़े सात साल बाद फिर कुदरती कहर
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चमोली जल प्रलय : देवभूमि उत्तराखंड में साढ़े सात साल बाद फिर कुदरती कहर

देवभूमि उत्तराखंड में साढ़े सात साल बाद फिर कुदरती कहर दिखा। सात साल पहले केदारनाथ की तबाही से हम लोगों ने कुछ सबक सीखा होता, तो आज यह दिन न देखना पड़ता।

देवभूमि उाराखंड में साढ़े सात साल बाद फिर से कुदरती कहर दिखा। आपदा सुबह के करीब दस बजे आई। तपोवन के रैणी गांव के पास सप्तऋषि और चंबा पहाड़ हैं। इन दोनों पहाड़ों के बीच के सबसे निचले हिस्से से ग्लेशियर टूटकर ऋषिगंगा नदी में गिरा। इससे नदी का पानी उफान पर आ गया। देखते ही देखते नदी के पास का मुरिंडा जंगल इसकी चपेट में आकर साफ हो गया। करीब 15 से 20 हेक्टेयर जंगल को नुकसान हुआ। ये वही जंगल है जहां से 1970 में गौरा देवी ने चिपको मूवमेंट शुरू किया था। इसके बाद ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट भी सैलाब की आगोश में समा गया। प्रोजेक्ट में काम कर रहे करीब दो सौ लोग फंस गए। इनमें मजदूर से लेकर प्रोजेक्ट के ऑफिसर हैं। इस प्रोजेक्ट के दूसरे छोर पर रैणी गांव है। इस गांव के आस-पास संभई, जुगजु, जुवाग्वार, रिंगि, तपोवन, भंगुले और धाक गांव हैं। शुक्र है पानी का बहाव इन गांवों की तरफ नहीं आया। नहीं तो हालात हद से ज्यादा बदतर हो जाते। इन गांवों में करीब दो हजार की आबादी रहती है।

चमोली जिले में जान-माल का भारी नुकसान हुआ है, जिसका आंकलन बाकी है। यह त्रासदी या कहें हादसा भले ही प्रकृति निर्मित क्यों न हो, मगर कारण हम ही बने हैं। सात साल पहले केदारनाथ की तबाही से कुछ सबक सीखा होता, तो आज यह दिन न देखना पड़ता। 21वीं सदी यानी मौजूदा समय में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ़्तार पिछली सदी के आखिरी 25 साल के मुकाबले दोगुनी हो चुकी है। यानी, ग्लेशियरों से बर्फ की परत लगातार पिघलती जा रही है। तापमान बढऩे से ग्लेशियरों के निचले हिस्से को नुकसान हो रहा है। ऐसे में पानी की कमी के साथ ही हादसे भी बढ़ेंगे। चमोली जैसी घटना इसकी गवाही है। करीब 80 करोड़ लोग सिंचाई, बिजली और पीने के पानी के लिए हिमालय के ग्लेशियरों पर निर्भर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगले कुछ दशकों में यह बंद हो जाएगा, क्यूँकि हम बड़े पैमाने पर ग्लेशियर खो रहे हैं।

एशियाई देशों में जीवाश्म ईंधन और बायोमास का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। इनसे निकलने वाली कालिख का ज्यादातर हिस्सा ग्लेशियर की सतह पर आ जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि वे तेजी से पिघलने लगते हैं। 1975 से 2000 तक यहां के ग्लेशियरों ने मामूली गर्मी के कारण हर साल लगभग 0.25 मीटर बर्फ खो दी। 1990 के दशक की शुरुआत में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या मुंह उठाने लगी। 2000 की शुरुआत में ग्लेशियरों के पिघलने में सालाना लगभग आधा मीटर की तेजी आई। ग्लेशियरों के पिघलने की चेतावनी पर्यावरणविद दे चुके हैं। मगर हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में चेतावनियों को अनदेखा कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि केदारनाथ हादसे के बाद विशेषज्ञों ने जो गाइडलाइन बनाई थी, वह कहां गायब हो गई। अगर उस पर काम किया गया होता, तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।

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