चुनाव के बाद नेपाल और भारत के रिश्ते पटरी पर आ जाएंगे
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चुनाव के बाद नेपाल और भारत के रिश्ते पटरी पर आ जाएंगे

नेपाल के ताजा हालात पर भारत की नजर है। भारत को लगता है कि चुनाव बाद चाहे जिसकी सरकार बने, मगर दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट की वापसी नहीं होगी। भारत की मंशा नेपाल में जल्द से जल्द चुनाव कराने की।

भारत पर नेपाल की सीमा को लेकर कब्जे का आरोप लगाने वाले पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का उनकी ही पार्टी के साथ चल रहा विवाद और बढ़ गया है। नेपाल की संसद को भंग करने की सिफारिश पर राष्ट्रपति से मुहर लगवाने के दूसरे दिन उनके विरोधियों ने इस फैसले को सांवैधानिक चोट बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इस बीच देश में प्रदर्शन भी शुरू हो गए हैं। ओली के विरोधियों ने संसद को भंग करने और समय पूर्व चुनाव के आह्वान को सांवैधानिक चोट करार दिया। इसके बाद कोरोना वायरस से जूझ रहे हिमालयी देश में सियासी उथल-पुथल की आशंका और बढ़ गई है। ओली द्वारा संसद भंग कराने के फैसले के बाद इस्तीफा देने वाले सात मंत्रियों ने कहा कि पीएम का कदम 2017 में जनता द्वारा दिए गए लोकप्रिय जनादेश का उल्लंघन है। केपी शर्मा ओली ने जिस तरह संसद को भंग किया, वह पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला द्वारा 1994 में संसद भंग करने की पुनरावृति नजर आ रही है। खास बात है कि कोइराला का उठाया कदम उन्हीं पर भारी पड़ा था। अगर सुप्रीम कोर्ट पुराने रुख पर कायम रहा, तो ओली को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

नया संविधान बनने के बाद 1991 में नेपाल में चुनाव हुए और कोइराला सरकार बनी। इसी तरह ओली सरकार भी नया संविधान बनने के बाद 2018 में बनी। समानता यहीं खत्म नहीं होती, कोइराला की अपनी पार्टी के बाकी नेताओं जैसे गनेश मानसिंह और कृष्ण प्रसाद भट्टाराई से नहीं बनी, उन्होंने संसद में अपनी नीतियां रखीं तो इन्हीं नेताओं ने विरोध किया। इस पर उन्होंने संसद भंग करवा दी। ओली का भी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्पकमल दहल प्रचंड के गुट से मनमुटाव चलता रहा है, जो संसद भंग करने का मुख्य कारण बना। वहीं नेपाल में चीन की रणनीति को धराशाई करने के बाद वहां के राजनीतिक घटनाक्रमों पर भारत की पैनी नजर है। भारत की पहली कोशिश वहां चुनाव कराने पर है। भारत को उम्मीद है कि चुनाव के बाद नेपाल और भारत के रिश्ते पटरी पर आ जाएंगे। दरअसल भारत को चार महीने पहले ही ओली के इस्तीफे की उम्मीद थी। हालांकि चीन के खुले हस्तक्षेप के बाद ओली का कार्यकाल लंबा खिंच गया।

अब पार्टी में फूट के बाद जिन परिस्थितियों में मध्यावधि चुनाव होने हैं, उनमें पीएम के रूप में ओली की वापसी की संभावना नहीं के बराबर है। इसकी संभावना ज्यादा है कि वामपंथी दल सीपीएन और सीपीएन माओवादी अलग राह अपना लें। भारत खासतौर पर चीन की भावी भूमिका को लेकर आशंकित हैं। इस मामले में पटखनी खाने के बाद चीन ओली को पार्टी में स्थापित करना चाहेगा। भारत से तकरार के बाद नेपाल में चीन की राजदूत ने कई मौकों पर ओली की रक्षा की थी। भारत को लगता है कि ओली को पार्टी में स्थापित करने के लिए चीन फिर से अपनी सारी ताकत झोंकेगा। हालांकि पार्टी में अलग- थलग पड़े ओली का बचाव अब चीन के लिए मुश्किल होगा।

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